सर्वाइकल कैंसर: सर्जरी और कीमो का डर छोड़ें, जानें कैसे आसान हो गई है रिकवरी
Ashlesha Thakur
जब किसी महिला के हाथ में सर्वाइकल कैंसर की पॉज़िटिव रिपोर्ट आती है, तो अक्सर पहला ख्याल यही आता है “क्या अब सब ख़त्म हो गया?”
हमारे समाज में कैंसर शब्द का डर बीमारी से भी बड़ा है. लोग इसे सीधे मौत से जोड़कर देखते हैं. लेकिन क्या यह सच है? क्या 2026 में भी सर्वाइकल कैंसर का मतलब ज़िंदगी का अंत है?
मेडिकल साइंस ने पिछले एक दशक में जो तरक़्क़ी की है, उसने इस बीमारी की तस्वीर पूरी तरह बदल दी है. आज रोबोटिक सर्जरी, इम्यूनोथेरेपी और टार्गेटेड मेडिसिन ने इसे एक क्यूरेबल बीमारी बना दिया है.
इस विशेष रिपोर्ट में, हमने दिल्ली के सीके बिरला हॉस्पिटल®️में सर्जिकल ऑन्कोलॉजी के डायरेक्टर डॉ. मनदीप सिंह मल्होत्रा से बात की. उनसे हमने जाना कि डायग्नोसिस के बाद मरीज को क्या करना चाहिए, एडवांस स्टेज में क्या विकल्प मौजूद हैं, और क्यों अब कीमोथेरेपी से डरने की ज़रूरत नहीं है.
डायग्नोसिस के बाद: डरें नहीं, ये हैं आपके पहले कदम
कैंसर की ख़बर किसी भी परिवार को अंदर से हिला सकती है. लेकिन डॉ. मल्होत्रा कहते हैं कि घबराहट में ग़लत फ़ैसले लेने से बचना चाहिए. याद रखें सही इलाज की शुरुआत सही जांच से होती है.
कन्फ़र्मेशन है ज़रूरी : सिर्फ़ एक टेस्ट रिपोर्ट पर भरोसा करने की बजाय, बीमारी की तह तक जाना ज़रूरी है. डॉ. मल्होत्रा समझाते हैं, “जब किसी महिला में सर्वाइकल कैंसर की पुष्टि होती है, तो सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम होता है डायग्नोसिस को पूरी तरह कन्फ़र्म करना. कई बार हम मरीज़ को सेकंड ओपिनियन के लिए दोबारा पैथोलॉजी रिव्यू या थोड़ी गहरी बायोप्सी की सलाह देते हैं. इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि हम किस तरह के कैंसर से लड़ रहे हैं.“
स्टेजिंग का महत्व : कैंसर का इलाज वन साइज़ फ़िट्स ऑल यानी एक ही इलाज सबके लिए नहीं होता. यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि कैंसर किस स्टेज में है. डॉ. मल्होत्रा कहते हैं, “इलाज शुरू करने से पहले हमें यह जानना होता है कि बीमारी सिर्फ़ गर्भाशय ग्रीवा यानी सर्विक्स तक सीमित है या आगे फैल चुकी है. इसके लिए हम पेल्विक एग्ज़ामिनेशन के साथ-साथ MRI, CT स्कैन या PET-CT स्कैन जैसे एडवांस टेस्ट करते हैं. ख़ून और किडनी की जांच भी की जाती है. ये टेस्ट हमें एक रोडमैप देते हैं कि हमें सर्जरी की तरफ़ जाना है, रेडिएशन देना है या कीमोथेरेपी.”
कैंसर का शुरुआती स्टेज: जब ‘पूरी तरह ठीक’ होना संभव है
अगर आप नियमित जांच जैसे पैप स्मीयर कराती हैं, तो बीमारी अक्सर शुरुआती स्टेज में पकड़ में आ जाती है. और यहाँ डॉ. मल्होत्रा एक बहुत ही सकारात्मक तस्वीर पेश करते हैं.
क्या है अर्ली स्टेज? शुरुआती स्टेज का मतलब है कि कैंसर ने अभी अपनी हदें नहीं तोड़ी हैं. वह सिर्फ़ सर्विक्स तक ही सीमित है और उसने आसपास के अंगों जैसे मूत्राशय, आंतों या लिम्फ नोड्स को प्रभावित नहीं किया है.
इलाज और रिकवरी: डॉ. मल्होत्रा कहते हैं: “अगर सर्वाइकल कैंसर स्टेज 1A या 1B में पकड़ में आ जाए, तो इसे मेडिकल भाषा में अक्सर क्यूरेबल माना जाता है. ऐसे मामलों में ज़्यादातर सर्जरी ही काफ़ी होती है. हम सर्जरी के ज़रिए कैंसर प्रभावित हिस्से को पूरी तरह हटा देते हैं. कई बार इसके बाद किसी अतिरिक्त कीमो या रेडिएशन की ज़रूरत भी नहीं पड़ती.”
रोबोटिक सर्जरी का दौर: एक समय था जब कैंसर सर्जरी का मतलब था बड़े चीरे और हफ्तों-महीनों तक चलने वाली रिकवरी लेकिन अब ऐसा नहीं है. डॉ. मल्होत्रा बताते हैं कि आजकल रोबोटिक और मिनिमली इनवेसिव सर्जरी ने इलाज को बहुत आसान बना दिया है. इसमें बहुत छोटे चीरे लगते हैं, खून कम बहता है और मरीज़ की रिकवरी बहुत तेज़ होती है. एक महिला सर्जरी के कुछ ही दिनों बाद अपनी सामान्य ज़िंदगी में लौट सकती है. इसलिए, जल्दी पहचान सबसे बड़ी ताकत है.
एडवांस स्टेज: नई तकनीकों ने जगाई उम्मीद की किरण
सबसे बड़ा डर तब होता है जब पता चलता है कि कैंसर फैल चुका है. बहुत से मरीज़ और परिजन यहाँ उम्मीद छोड़ देते हैं. लेकिन डॉ. मल्होत्रा का कहना है कि विज्ञान ने यहाँ भी हार नहीं मानी है.
टार्गेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी: पारंपरिक कीमोथेरेपी पूरे शरीर पर असर करती थी, लेकिन अब दवाइयां स्मार्ट हो गई हैं. डॉ. मल्होत्रा बताते हैं: “अब हमारे पास ‘टार्गेटेड ट्रीटमेंट’ उपलब्ध हैं. उदाहरण के लिए, बेवेसिज़ुमैब जैसी दवाइयां सीधे कैंसर कोशिकाओं की ब्लड सप्लाई को रोकती हैं. इसके अलावा, इम्यूनोथेरेपी एक क्रांतिकारी बदलाव है. यह दवाइयां कैंसर को सीधे नहीं मारतीं, बल्कि मरीज़ के अपने इम्यून सिस्टम को कैंसर से लड़ने के लिए ट्रेन करती हैं. कुछ मामलों में कीमोथेरेपी के साथ इम्यूनोथेरेपी देने से ट्यूमर पूरी तरह खत्म होते देखे गए हैं.”
सटीक रेडिएशन: रेडिएशन के साइड-इफ़ेक्ट्स का डर अब पुराना हो चुका है. डॉ. मल्होत्रा ने कहा, “आज हमारे पास IMRT और IGRT जैसी आधुनिक तकनीकें हैं. ये मशीनें इतनी सटीक हैं कि ये सिर्फ़ ट्यूमर पर रेडिएशन डालती हैं, जिससे आसपास के स्वस्थ अंगों जैसे पेशाब की थैली या आंत को कम से कम नुकसान होता है. प्रोटॉन बीम थेरेपी ने इसे और भी सुरक्षित बना दिया है.”
इसका मतलब साफ़ है, एडवांस स्टेज में भी बीमारी को लंबे समय तक कंट्रोल किया जा सकता है और मरीज़ एक अच्छी क्वालिटी ऑफ़ लाइफ़ जी सकती हैं.
कीमो और रेडिएशन: डर बनाम हकीकत
‘बाल झड़ जाएंगे’, ‘उल्टियां होंगी’, ‘शरीर काला पड़ जाएगा’ कीमोथेरेपी को लेकर ये डर बीमारी से ज़्यादा मरीज़ को तोड़ देते हैं. डॉ. मल्होत्रा इस डर को तथ्यों से दूर करते हैं.
साइड-इफेक्ट्स का मैनेजमेंट: यह सच है कि कीमोथेरेपी और रेडिएशन के नाम से लोग डर जाते हैं, लेकिन आज के समय में इनके साइड-इफ़ेक्ट्स को काफ़ी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है. अब उल्टी, मतली या कमज़ोरी के लिए हमारे पास पहले से बहुत बेहतर सपोर्टिव दवाइयां मौजूद हैं.
बाल झड़ने का डर: महिलाओं के लिए बाल झड़ना भावनात्मक रूप से बहुत कठिन होता है. इसपर डॉ. मल्होत्रा कहते हैं, “अब ‘कूल कैप’ जैसी तकनीक आ गई है. कीमो के दौरान इसे पहनने से सिर की नसों में ब्लड फ्लो कम हो जाता है, जिससे दवा बालों की जड़ों तक कम पहुंचती है और बाल झड़ने की समस्या काफ़ी कम हो जाती है.”
पोषण और देखभाल: ब्लड काउंट गिरने से बचाने के लिए अब ख़ास इंजेक्शन दिए जाते हैं. यहां तक कि मरीज़ की भूख और सहनशक्ति बढ़ाने के लिए मेडिकल कैनाबिस एक्सट्रैक्ट्स और न्यूट्रिशन सपोर्ट का भी इस्तेमाल हो रहा है. डॉ. मल्होत्रा का कहना है कि कुल मिलाकर, आज का इलाज 10 साल पहले के मुकाबले कहीं ज़्यादा सहने लायक हो गया है.
क्या कैंसर दोबारा हो सकता है?
इलाज पूरा होने के बाद सबसे बड़ा सवाल होता है, “क्या यह वापस आएगा?”
डॉ. मल्होत्रा कहते हैं कि यह डर स्वाभाविक है, लेकिन सतर्कता से इसे कम किया जा सकता है. इलाज के बाद कैंसर दोबारा होने का ख़तरा कई बातों पर निर्भर करता है, सबसे अहम है कैंसर की स्टेज. शुरुआती स्टेज में इलाज के बाद दोबारा होने की आशंका काफ़ी कम होती है. लेकिन एडवांस स्टेज में यह रिस्क थोड़ा ज़्यादा हो सकता है.
सावधानियां:
- रेगुलर फ़ॉलो-अप: डॉक्टर द्वारा तय किए गए समय पर चेकअप और स्कैन कराना कभी न छोड़ें. अगर बीमारी वापस आती है, तो उसे शुरुआती दौर में ही पकड़ना ज़रूरी है.
- लाइफ़स्टाइल में बदलाव: स्मोकिंग और शराब से पूरी तरह दूरी बना लें.
- वज़न और डाइट: अपना वज़न कंट्रोल में रखें और ताज़े फल-सब्जियों वाला आहार लें.
- तनाव प्रबंधन: तनाव कम करना ज़रूरी है क्योंकि इसका सीधा रिश्ता आपकी इम्यूनिटी से है.
कैंसर के बाद ज़िंदगी: उम्मीद की नई सुबह
क्या कैंसर होने के बाद ज़िंदगी सामान्य हो सकती है? इस सवाल के जवाब में डॉ. मल्होत्रा अपने सालों के अनुभव से कहते हैं, हाँ, बिल्कुल. वो आगे कहते हैं, “बहुत सी महिलाएं ये सोचती हैं कि कैंसर मतलब ‘सब ख़त्म’ लेकिन आज के समय में सर्वाइकल कैंसर को एक पूरी तरह इलाज योग्य और कंट्रोल होने वाली बीमारी माना जा सकता है. कई महिलाएं इलाज के बाद सालों तक सामान्य, स्वस्थ और खुशहाल जीवन जी रही हैं. वे अपने परिवार के साथ हैं, अपनी नौकरी कर रही हैं, और अपने सपने पूरे कर रही हैं.”
मरीज़ों और परिवारों के लिए संदेश: अंत में, डॉ. मल्होत्रा एक बहुत ही भावुक और मज़बूत संदेश देते हैं: वो कहते हैं, “सबसे ज़रूरी बात यह है कि आप अकेले नहीं हैं. इलाज के दौरान डर, थकान और निराशा आना स्वाभाविक है, लेकिन उम्मीद बनाए रखना बहुत ज़रूरी है. परिवार का सपोर्ट, डॉक्टर पर भरोसा और इलाज को पूरी ईमानदारी से फ़ॉलो करने से बहुत फ़र्क पड़ता है. हर छोटा कदम मायने रखता है. सवाल पूछें, जानकारी लें और अपने शरीर की बात सुनें. हिम्मत, धैर्य और सही इलाज से इस बीमारी को हराया जा सकता है. ‘कैंसर मतलब अंत’ वाली सोच अब बदलने की ज़रूरत है.”
फ़ैसला आपके हाथ में है
सर्वाइकल कैंसर अब वो अंधेरी गुफ़ा नहीं है जिससे बाहर निकलने का रास्ता न हो. साइंस ने हमारे हाथ में वो मशाल थमा दी है जिससे हम इस बीमारी को हरा सकते हैं. ज़रूरत है तो बस समय पर लक्षण पहचानने की, सही डॉक्टर तक पहुंचने की और इलाज पर भरोसा रखने की.
अगर आपके या आपके किसी परिचित की रिपोर्ट पॉज़िटिव आई है, तो याद रखें यह रिपोर्ट आपकी ज़िंदगी का आखिरी पन्ना नहीं, बल्कि एक नए संघर्ष की शुरुआत है, जिसे जीता जा सकता है. उम्मीद है यह आर्टिकल आपको बीमारी के अंधेरे से इलाज की रोशनी तक का रास्ता दिखाएगा.