रेडियो अब कौन सुनता है? डिजिटल युग में बदलता रेडियो और इसका भविष्य
Zindagi With Richa
लेखक- प्रभांशु शुक्ला
रेडियो अब कौन सुनता है? क्या अब भी कोई रेडियो सुनता है?
मुझसे अक्सर ऐसे ही कई सवाल पूछे जाते हैं, ख़ासकर तब, जब मैं किसी को बताता हूँ कि मैं पहले एक प्राइवेट रेडियो स्टेशन में काम करता था. एक वक़्त था जब भारत में 1980 के दशक तक घरों में रेडियो रखने के लिए भारत सरकार से लाइसेंस लेना पड़ता था, और उसे साल-दर-साल रिन्यू किया जाता था.
इस बात में कोई दो राय नहीं है कि पिछले कुछ सालों में रेडियो का श्रोताओं के साथ ताल्लुक़ थोड़ा कम हुआ है. टेक्नोलॉजी ने इतना विकास कर लिया है कि हर तरफ़ सही से ज़्यादा, कई बार ग़लत जानकारी भी तेज़ी से पहुँच जाती है. इंफ़ॉर्मेशन और एंटरटेनमेंट के कई सारे नए साधन आ चुके हैं. ख़ासकर सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने कई सारे ओल्ड स्कूल माध्यमों को प्रभावित किया है. ऐसे में रेडियो अब सिर्फ़ पुरानी शक्ल तक सीमित नहीं रह गया है; बदलते वक़्त के साथ उसे भी, चाहते न चाहते हुए, एक अलग तरह से अपना विकास करना पड़ा है.
आज का रेडियो जॉकी सिर्फ़ एक आवाज़ नहीं है
अब रेडियो जॉकी होने के लिए सिर्फ़ अच्छी आवाज़ का होना काफ़ी नहीं है. आपके इंस्टाग्राम फ़ॉलोअर्स कितने हैं, आप कैमरे पर कितने प्रेज़ेंटेबल हैं और आपकी डिजिटल प्रेज़ेंस कैसी है, ये सब बातें अब बहुत मायने रखती हैं. ये बदलाव मैंने ख़ुद क़रीब से देखा है. आपने भी ग़ौर किया होगा कि पिछले कुछ सालों में कई मशहूर रेडियो जॉकी अब सफ़ल सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर और इन्फ़्लुएंसर बन चुके हैं.
आज भी कहां सबसे ज़्यादा सुना जाता है रेडियो?
अगर आपको लगता है कि रेडियो कोई नहीं सुनता, तो विविध भारती पर आने वाले कॉलर्स को सुन लीजिएगा. भारत के ग्रामीण इलाक़ों और छोटे शहरों में रेडियो आज भी लोगों की दिनचर्या का अहम हिस्सा है. लोग आज भी एक्सपर्ट्स से अपनी समस्याओं पर राय मांगते हैं और अपने पसंदीदा गानों की फ़रमाइश करते हैं.
अगर बड़े शहरों की बात करूँ, तो वहां रेडियो सुनने वालों की तादाद उन जगहों पर ज़्यादा है, जहाँ ड्राइव टाइम थोड़ा ज़्यादा होता है. आसान भाषा में समझें तो, जिन शहरों में लोग कार या किसी भी गाड़ी से रोज़ ऑफ़िस आने-जाने में लंबा वक़्त बिताते हैं, उस समय को ड्राइव टाइम कहते हैं. ट्रैफ़िक में फंसे लोगों के लिए रेडियो आज भी एक बेहतरीन साथी है. यही वजह है कि प्राइवेट रेडियो चैनल्स अपने सबसे ख़ास शोज़ इसी ड्राइव टाइम में चलाते हैं.
रेडियो एक पैसिव मीडियम क्यों है?
ज़्यादातर लोगों के लिए रेडियो कभी भी एक एक्टिव मीडियम नहीं रहा, यह हमेशा से एक पैसिव मीडियम रहा है. इसका मतलब है कि लोग अपना काम करते हुए बैकग्राउंड में रेडियो चलाते हैं. कभी गाना सुनाई देता है, तो कभी रेडियो जॉकी की एकतरफ़ा बातचीत. सुनने वाले को लगता है कि कोई उससे बात कर रहा है, जबकि उसे जवाब देने की कोई मजबूरी नहीं होती.
दोपहर में कई महिलाएं रसोई में खाना बनाते समय रेडियो सुनती हैं, कई लोग अपनी दुकानों या पेट्रोल पंप पर काम करते हुए पीछे रेडियो पर गाने चलाते हैं. यह सिर्फ़ एक ऑब्ज़र्वेशन नहीं है, बल्कि रेडियो की वह ताक़त है जो बिना आपका फ़ोकस तोड़े आपके साथ बनी रहती है.
तो क्या रेडियो ख़त्म हो जाएगा?
इस सवाल पर मैंने कई बार सोचा. और अंदर से एक ही जवाब आया, नहीं. रेडियो ख़त्म नहीं होगा, बस समय के साथ इसका रूप बदलेगा और ऐसा करना उसके अस्तित्व के लिए ज़रूरी भी है.
आँकड़े भी इसी बात की गवाही देते हैं. TRAI के 2023-24 के आँकड़ों के अनुसार, भारत के 113 शहरों में 388 प्राइवेट रेडियो स्टेशन चल रहे हैं. अगर हम इनके रेवेन्यू के आँकड़ों को देखें तो सुकून मिलता है. साल 2022-23 में इन सभी प्राइवेट रेडियो स्टेशनों का कुल रेवेन्यू ₹1,547.13 करोड़ था, जो साल 2023-24 में बढ़कर ₹1,775.79 करोड़ हो गया.
यानी रेडियो का रेवेन्यू बढ़ा है. इस ग्रोथ में मैं सबसे बड़ा हाथ सोशल मीडिया का मानता हूँ. क्योंकि अब रेडियो जॉकी सिर्फ़ रेडियो के स्टूडियो तक सीमित नहीं हैं, वे सोशल मीडिया पर भी अपनी ऑडियंस से जुड़ते हैं. डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स के माध्यम से भी प्राइवेट रेडियो स्टेशनों के लिए रेवेन्यू जनरेट हो रहा है.
रेडियो आज भी क्यों महत्वपूर्ण है?
UNESCO के अनुसार, रेडियो आज भी दुनिया के सबसे ज़्यादा सुने और इस्तेमाल किए जाने वाले संचार माध्यमों में से एक है. चाहे चुनाव हों, प्राकृतिक आपदा हो या कोई गंभीर ख़बर, रेडियो ने हमेशा एक अहम भूमिका निभाई है.
1947 में भारत में ऑल इंडिया रेडियो के केवल 6 स्टेशन थे. आज AIR के 223 स्टेशन पूरे देश को कवर करते हैं. अमेरिकन वेबसाइट इनसाइड रेडियो की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में कार ख़रीदने वाले 96% लोग आज भी चाहते हैं कि उनकी कार में बिल्ट-इन रेडियो हो. हालांकि कई मोबाइल फ़ोन कंपनियों ने स्मार्टफ़ोन्स से इन-बिल्ट रेडियो फ़ीचर हटा दिया है, लेकिन ऐसे आँकड़े पढ़कर तसल्ली होती है कि लोग आज भी रेडियो सुनना पसंद करते हैं.
रेडियो का सामाजिक असर: मेरा निजी अनुभव
रेडियो में काम करने से पहले मैं अक्सर सोचता था कि इसका समाज पर असल में क्या इम्पैक्ट पड़ता होगा. पर वहाँ काम करने के दौरान कई ऐसे अनुभव हुए, जो ज़िंदगी भर भुलाए नहीं जा सकते.
मुझे याद है, एक दिन वर्षा नाम की 12वीं क्लास की एक छात्रा का हमारे रेडियो स्टेशन पर कॉल आया. उसने बताया कि उसके छोटे भाई को स्कूल बदलना है, लेकिन स्कूल का प्रिंसिपल ट्रांसफ़र सर्टिफ़िकेट देने के लिए 10,000 रुपये की रिश्वत मांग रहा है. हमने तुरंत इस मुद्दे को उठाया और ज़िला शिक्षा अधिकारी तक बात पहुँचाई.
आप यक़ीन नहीं मानेंगे, हमारे सिर्फ़ एक कॉल और रेडियो पर इस मुद्दे को प्रसारित करने भर से, उस बच्ची के भाई को बिना एक पैसा दिए उसका ट्रांसफ़र सर्टिफ़िकेट मिल गया. उस दिन रेडियो स्टेशन पर काम करने वाले हर व्यक्ति को लगा कि यह सिर्फ़ रेडियो की नहीं, हमारी अपनी जीत है.
इतिहास के पन्नों में रेडियो की अहम भूमिका
रेडियो तब भी संकटमोचक साबित हुआ था, जब 1912 में टाइटैनिक दुर्घटना के दौरान इसी तकनीक से मदद के संदेश भेजे गए थे. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दुनिया भर में युद्ध के अपडेट लोगों तक रेडियो के ज़रिए ही पहुँचते थे.
UNESCO के अनुसार, COVID-19 महामारी के दौरान भी रेडियो सबसे सस्ता, आसान और दूरदराज़ के इलाक़ों तक पहुँचने वाला माध्यम साबित हुआ. रेडियो ने करोड़ों लोगों तक स्वास्थ्य सलाह और सरकारी निर्देश पहुँचाए. वहीं, 2013 में भारत में आई केदारनाथ त्रासदी के दौरान कम्युनिटी रेडियो चैनलों ने ही भटके हुए लोगों को राहत केंद्रों की सटीक जानकारी दी थी, जिससे न जाने कितनों की जान बची.
आख़िर में…
भले ही रेडियो को हम एक पैसिव मीडियम मानते हों, पर रेडियो फिल्मों के इमोशनल सीन में पीछे बजने वाले संगीत की तरह है, जिसके बिना वो सीन अधूरा है. मैं उम्मीद करता हूँ कि ये आर्टिकल पढ़ने के बाद आज आप अपनी कार के रेडियो का वॉल्यूम थोड़ा सा बढ़ा देंगे.