• Zindagi With Richa
  • 25 January, 2026
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Ashlesha Thakur

सर्वाइकल कैंसर एक ऐसी बीमारी है जो शरीर में दस्तक तो देती है, लेकिन बिना किसी शोर के. कल्पना कीजिए एक ऐसी समस्या की जो सालों तक आपके भीतर पनपती रहती है, लेकिन आपको अहसास तक नहीं होने देती कि कुछ गलत है. और जब तक दर्द या तकलीफ़ का अहसास होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर यानी सर्वाइकल कैंसर वही बीमारी है जिसे डॉक्टर ‘साइलेंट किलर’ कहते हैं. अच्छी बात ये है कि सही जानकारी से यह बीमारी पूरी तरह से रोकी जा सकती है.

भारत में हर साल हज़ारों महिलाएं सर्वाइकल कैंसर का शिकार होती हैं, और इसकी सबसे बड़ी वजह ‘इलाज की कमी’ नहीं, बल्कि ‘जागरूकता की कमी’ और ‘शर्म’ है.

इस सर्वाइकल कैंसर जागरूकता माह में, हमने दो अनुभवी स्त्री रोग विशेषज्ञों से लंबी बातचीत की. इस आर्टिकल में, हम जानेंगे कि क्यों स्वस्थ महसूस करना काफ़ी नहीं है, HPV वायरस आपके शरीर में क्या खेल खेलता है, और कैसे सिर्फ़ 5 मिनट की एक जांच आपकी ज़िंदगी को सुरक्षित कर सकती है.

साइलेंट किलर: जब ख़तरा ख़ामोशी से आए

अक्सर हम मानते हैं कि अगर शरीर में दर्द नहीं है, बुखार नहीं है, तो हम स्वस्थ हैं. लेकिन सर्वाइकल कैंसर इस भरोसे को तोड़ देता है.

डॉ. तृप्ति रहेजा बताती हैं कि इस बीमारी का सबसे खतरनाक पहलू ही इसकी ‘चुप्पी’ है. “इसे साइलेंट बीमारी इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके शुरुआती चरणों में अक्सर कोई लक्षण दिखाई नहीं देते. बीमारी गर्भाशय की ग्रीवा में धीरे-धीरे जड़ें जमाती रहती है, कोशिकाओं में बदलाव होते रहते हैं, लेकिन महिला को न कोई दर्द महसूस होता है, न डिस्चार्ज होता है और न ही कोई ब्लीडिंग. वह अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पूरी ऊर्जा के साथ जीती है, यह अनजान रहते हुए कि अंदर एक तूफ़ान पनप रहा है.”

वहीं डॉ. अरुणा कालरा कहती हैं: “यही खामोशी इसे जानलेवा बनाती है. जब तक लक्षण सामने आते हैं जैसे पेल्विक दर्द, संबंध बनाते समय दर्द, या पीरियड्स के बीच में असामान्य रक्तस्राव. तब तक बीमारी अक्सर शुरुआती स्टेज को पार कर चुकी होती है. कई बार यह आसपास के टिशूज़ या दूसरे अंगों तक फैल चुकी होती है. इसलिए, लक्षणों का इंतज़ार करना किसी खतरे से खाली नहीं है.”

यह समझना ज़रूरी है कि सर्वाइकल कैंसर रातों-रात नहीं होता. यह एक लंबी प्रक्रिया है जो कई सालों तक चलती है, और यही वो समय है जब इसे पकड़ा जा सकता है.

HPV वायरस: दुश्मन या एक आम मेहमान?

सर्वाइकल कैंसर की चर्चा ‘ह्यूमन पेपिलोमा वायरस’ (HPV) के बिना अधूरी है. यह नाम सुनते ही अक्सर महिलाओं में डर बैठ जाता है. क्या HPV इन्फेक्शन का मतलब कैंसर?

विशेषज्ञों का जवाब है—बिलकुल नहीं.

डॉ. रहेजा समझाती हैं कि HPV इन्फ़ेक्शन होना उतना ही सामान्य है जितना कि मौसम बदलने पर वायरल बुखार होना. “ज़्यादातर मामलों में, खासकर युवाओं और स्वस्थ लोगों में, शरीर का इम्यून सिस्टम 1 से 2 साल के भीतर इस वायरस को खुद ही खत्म कर देता है. वायरस आता है, शरीर में रहता है और चला जाता है. बिना कोई नुकसान पहुंचाए.”

तो फिर डर किस बात का है? समस्या तब होती है जब वायरस ‘ज़िद्दी’ हो जाए. डॉ. कालरा बताती हैं: “कुछ खास प्रकार के HPV, जिन्हें हम ‘हाई-रिस्क HPV’ जैसे HPV-16 और HPV-18 कहते हैं, अगर शरीर में लंबे समय तक टिक जाएं और इम्यून सिस्टम उन्हें खत्म न कर पाए, तो खतरा बढ़ता है. यह वायरस सर्विक्स की कोशिकाओं में जाकर चुपचाप बैठ जाता है. यह वहां ‘सोया हुआ’ रह सकता है या बहुत धीरे-धीरे कोशिकाओं के डीएनए में बदलाव कर सकता है. अगर समय पर जांच न हो, तो यही बदलाव आगे चलकर कैंसर बन जाते हैं.”

सर्वाइकल कैंसर के लक्षण: कब बजनी चाहिए ख़तरे की घंटी?

हालांकि शुरुआती स्टेज में लक्षण नहीं होते, लेकिन शरीर बाद में कुछ संकेत ज़रूर देता है जिन्हें कभी भी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए. दोनों विशेषज्ञों ने इन लक्षणों पर विशेष ध्यान देने को कहा है:

  • असामान्य रक्तस्राव : रजोनिवृत्ति यानी मेनोपॉज़ के बाद एक बूंद भी खून दिखे, तो यह सामान्य नहीं है.
  • संबंध बनाने के बाद दर्द या ब्लीडिंग: यह एक बड़ा रेड फ़्लैग हो सकता है.
  • असामान्य डिस्चार्ज: अगर डिस्चार्ज में बदबू हो या रंग बदला हुआ हो.
  • पेल्विक दर्द: पेट के निचले हिस्से में लगातार दर्द रहना.

डॉ. रहेजा की महत्वपूर्ण सलाह: “ज़रूरी नहीं कि दर्द या ब्लीडिंग का मतलब हमेशा कैंसर ही हो, या बीमारी बहुत एडवांस स्टेज में हो. कई बार ये शुरुआती संकेत भी हो सकते हैं. लेकिन खुद डॉक्टर बनकर अनुमान लगाने की बजाय जांच कराना समझदारी है. अगर बीमारी पकड़ में आती है, तो शुरुआती इलाज बहुत आसान और कम जटिल होता है.”

वो ‘गोल्डन विंडो’ जो बचाती है जान: पैप स्मीयर और HPV टेस्ट

सर्वाइकल कैंसर दुनिया का एकमात्र ऐसा कैंसर है, जिसे होने से पहले ही रोका जा सकता है. यह संभव होता है ‘प्री-कैंसरस स्टेज’ में ही बीमारी का पता लगाने से.

डॉ. अरुणा कालरा इसे ‘गोल्डन विंडो’ कहती हैं. “पैप स्मीयर और HPV टेस्ट का मकसद कैंसर ढूंढना नहीं, बल्कि कैंसर के खतरे को ढूंढना है. पैप स्मीयर टेस्ट सर्विक्स की कोशिकाओं की जांच करता है ताकि यह देखा जा सके कि कहीं उनमें कोई असामान्य बदलाव तो नहीं हो रहे. ये बदलाव कैंसर नहीं होते, लेकिन अगर इन्हें यूं ही छोड़ दिया जाए, तो 5 से 10 साल में ये कैंसर बन सकते हैं.”

ये टेस्ट कैसे काम करते हैं?

  1. पैप स्मीयर: यह कोशिकाओं के स्तर पर हो रहे बदलावों को पकड़ता है.
  2. HPV टेस्ट: यह उस वायरस की मौजूदगी बताता है जो भविष्य में कैंसर का कारण बन सकता है.

डॉ. रहेजा कहती हैं: “इन टेस्ट की सबसे बड़ी खूबी यह है कि ये बीमारी शुरू होने से पहले ही आपको आगाह कर देते हैं. अगर बदलाव पकड़ में आ जाएं, तो एक छोटी सी प्रक्रिया से उन्हें ठीक किया जा सकता है और कैंसर की नौबत ही नहीं आती. इसलिए हम 25 से 65 वर्ष की हर महिला को नियमित स्क्रीनिंग की सलाह देते हैं.”

लाइफ़स्टाइल का रोल: तनाव, नींद और कमज़ोर इम्यूनिटी

क्या आपकी खराब लाइफ़स्टाइल आपको कैंसर के करीब ले जा रही है? इसका जवाब है, हाँ. भले ही प्रत्यक्ष रूप से नहीं, पर इससे HPV वायरस का काम आसान ज़रूर हो जाता है.

डॉ. तृप्ति रहेजा बताती हैं कि सर्वाइकल कैंसर का सीधा कारण तो HPV वायरस है, लेकिन वायरस को शरीर में पनाह देने का काम आपकी कमज़ोर इम्यूनिटी करती है. “तनाव या नींद की कमी सीधे कैंसर नहीं पैदा करती, लेकिन ये आपके शरीर के रक्षक यानी इम्यून सिस्टम को कमज़ोर कर देती हैं. जब आप लगातार स्ट्रेस में रहती हैं, पूरी नींद नहीं लेतीं या सही पोषण नहीं ले रहीं, तो आपका शरीर HPV वायरस से लड़ नहीं पाता. जो वायरस खुद खत्म हो जाना चाहिए था, वह शरीर में घर कर लेता है.”

स्मोकिंग: डॉ. कालरा स्मोकिंग को एक बड़ा रिस्क फ़ैक्टर मानती हैं. “स्मोकिंग करने वाली महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर का खतरा कई गुना ज़्यादा होता है क्योंकि तंबाकू के तत्व सर्विक्स की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं और इम्यूनिटी को भी कमज़ोर देते हैं.”

इसलिए, एक हेल्दी लाइफ़स्टाइल जिसमें अच्छा खाना, स्ट्रेस मैनेजमेंट और पर्याप्त नींद शामिल हो वो सिर्फ़ आपको अच्छा महसूस कराने के लिए नहीं, बल्कि कैंसर से लड़ने की ताकत देने के लिए भी ज़रूरी है.

शर्म छोड़ें: 5 मिनट की झिझक या लंबी ज़िंदगी?

तकनीक और इलाज मौजूद है, फिर भी महिलाएं जांच के लिए आगे क्यों नहीं आतीं? इसके पीछे मेडिकल नहीं, सामाजिक कारण हैं, शर्म और डर.

भारत में कई महिलाएं पेल्विक जांच के नाम से ही असहज हो जाती हैं. उन्हें लगता है कि यह प्रक्रिया दर्दनाक होगी या शर्मनाक होगी.

डॉ. अरुणा कालरा इस भ्रम को तोड़ते हुए कहती हैं: “डर जांच से नहीं, बीमारी से होना चाहिए. पैप स्मीयर और HPV टेस्ट बहुत ही सरल प्रक्रियाएं हैं. इसमें मुश्किल से 5 से 10 मिनट का समय लगता है. यह ओपीडी में ही हो जाता है, इसके लिए भर्ती होने की ज़रूरत नहीं पड़ती.”

क्या यह दर्दनाक है? “बिलकुल नहीं,” डॉ. कालरा स्पष्ट करती हैं. “यह थोड़ा असहज लग सकता है, लेकिन इसमें दर्द नहीं होता. जांच पूरी गोपनीयता के साथ की जाती है. एक प्रशिक्षित डॉक्टर और नर्स आपकी गरिमा का पूरा ख्याल रखते हैं.”

झिझक का परिणाम: जांच टालने का परिणाम बहुत भारी हो सकता है. डॉ. रहेजा कहती हैं: “अक्सर महिलाएं सोचती हैं कि ‘अगले महीने जाएंगे’ या ‘अभी तो सब ठीक है’. इसी टालमटोल में वो 5-10 साल का समय निकल जाता है जब बीमारी को आसानी से रोका जा सकता था. शर्म की वजह से अपनी जान जोखिम में डालना समझदारी नहीं है.”

विशेषज्ञों की सलाह: अब आपको क्या करना चाहिए?

इस जागरूकता माह में, सिर्फ़ जानकारी लेना काफ़ी नहीं है, उस पर अमल करना ज़रूरी है. दोनों विशेषज्ञों ने महिलाओं के लिए एक ‘एक्शन प्लान’ साझा किया है: 

  1. स्क्रीनिंग शुरू करें: अगर आपकी उम्र 25 वर्ष से अधिक है, तो अपनी गायनेकोलॉजिस्ट से पैप स्मीयर टेस्ट के बारे में बात करें. आमतौर पर, 30 के बाद HPV और पैप स्मीयर दोनों की सलाह दी जाती है.
  2. नियमितता बनाए रखें: एक बार टेस्ट नेगेटिव आने का मतलब यह नहीं कि आप हमेशा के लिए सुरक्षित हैं. डॉक्टर की सलाह अनुसार हर 3 या 5 साल में इसे दोहराएं.
  3. वैक्सीन लगवाएं: सर्वाइकल कैंसर की वैक्सीन मौजूद है. यह 9 से 14 साल की बच्चियों के लिए सबसे असरदार है, लेकिन 26 साल और डॉक्टर की सलाह पर 45 साल तक की महिलाएं भी इसे लगवा सकती हैं. यह एक ‘एंटी-कैंसर वैक्सीन’ की तरह काम करती है.
  4. लक्षणों को सुनें: अपने शरीर के संकेतों को नज़रअंदाज़ न करें. दर्द या ब्लीडिंग होने पर घरेलू नुस्खों में वक्त बर्बाद न करें, सीधे विशेषज्ञ के पास जाएं.
  5. बात करें: अपनी मां, बहन या सहेली से इस बारे में बात करें. हो सकता है आपकी एक बातचीत किसी की झिझक तोड़ दे और उसकी जान बच जाए.

सर्वाइकल कैंसर एक ऐसी जंग है,
जिसे हम बिना लड़े जीत सकते हैं और वो भी सिर्फ़ जागरूकता और सतर्कता से. यह बीमारी हमें संभलने का पूरा मौका देती है. अब यह हम पर है कि हम उस मौके का फ़ायदा उठाते हैं या ‘शर्म’ और ‘लापरवाही’ के अंधेरे में उसे खो देते हैं. याद रखें, अस्पताल के उस कमरे में 5 मिनट की असहजता, कैंसर से जूझने की ज़िंदगी भर की तकलीफ़ से कहीं बेहतर है.

शर्म छोड़ें, जांच कराएं और जीवन को चुनें.