• Zindagi With Richa
  • 06 January, 2026
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Zindagi With Richa

लेखक: अश्लेषा ठाकुर

ताज़ा अपडेट (6 जनवरी, 2026)

वेनेजुएला संकट पर अंतरराष्ट्रीय तनाव और गहरा गया है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में अमेरिका ने उस प्रस्ताव पर वीटो कर दिया है, जिसमें वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व’ की निंदा की गई थी. रूस और चीन सहित कई देशों ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून और किसी संप्रभु देश की क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन बताया है.

इसी बीच, पेंटागन ने पुष्टि की है कि अमेरिकी मरीन ने “मानवीय सहायता और रसद” के उद्देश्य से कराकस के सिमोन बोलिवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया है. यह कदम ज़मीन पर अमेरिकी मौजूदगी के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है.

भारत ने भी स्थिति की गंभीरता को देखते हुए वेनेजुएला में रह रहे भारतीय नागरिकों के लिए तत्काल एडवाइजरी जारी की है. विदेश मंत्रालय (MEA) ने नागरिकों को कोलंबिया के रास्ते देश छोड़ने की सलाह दी है और कराकस स्थित भारतीय दूतावास ने 24×7 हेल्पलाइन शुरू की है.

कराकस / वॉशिंगटन: एक रात जिसने सत्ता संतुलन बदल दिया

3 जनवरी की रात वेनेजुएला के इतिहास में एक नाटकीय मोड़ लेकर आई. अमेरिकी सेना के एक विशेष और गुप्त ‘स्नैच-एंड-ग्रैब’ ऑपरेशन में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को हिरासत में ले लिया गया. अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई लंबे समय से लंबित आपराधिक आरोपों के तहत की गई, जबकि कराकस और उसके समर्थक इसे प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप मान रहे हैं.

व्हाइट हाउस से राष्ट्र के नाम विशेष संबोधन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस कार्रवाई की पुष्टि करते हुए इसे ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व’ नाम दिया. ट्रंप ने कहा कि अमेरिका का उद्देश्य “नार्को-आतंकवाद” से निपटना और क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना है. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वेनेजुएला के संसाधनों, खासकर तेल उद्योग, को “जवाबदेह और पारदर्शी ढंग से” संचालित किया जाएगा.

हालांकि, अमेरिकी प्रशासन ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि उसका इरादा वेनेजुएला पर स्थायी शासन स्थापित करने का नहीं है, लेकिन कराकस एयरपोर्ट पर अमेरिकी नियंत्रण और सैन्य मौजूदगी ने इन दावों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

अमेरिकी अदालत में मादुरो और उनकी पत्नी की पेशी

सोमवार, 5 जनवरी को निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को न्यूयॉर्क की अमेरिकी फेडरल अदालत में पेश किया गया, जहां दोनों ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया. मादुरो ने अदालत में खुद को वेनेजुएला का वैध राष्ट्रपति बताते हुए अपनी गिरफ्तारी को “अवैध” करार दिया. इस पेशी के साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि मामला अब केवल सैन्य या कूटनीतिक नहीं, बल्कि औपचारिक कानूनी प्रक्रिया के दायरे में भी प्रवेश कर चुका है. 

दूसरी ओर, वेनेजुएला के सुप्रीम कोर्ट ने डेल्सी रोड्रिग्ज को अंतरिम (कार्यवाहक) राष्ट्रपति नियुक्त किया है ताकि देश का कामकाज जारी रहे और संवैधानिक व्यवस्था बनी रहे. डेल्सी रोड्रिग्ज ने संविधान के अनुच्छेद 233 का हवाला देते हुए यह जिम्मेदारी संभाली है.

इस विशेष एक्सप्लेनर में हमविदेश मामलों की वरिष्ठ पत्रकार स्मिता शर्मा के विश्लेषण के आधार पर यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि यह संकट किस दिशा में जा सकता है.

उस रात क्या हुआ?

3 जनवरी, 2026 की रात कराकस में अमेरिकी वायुसेना ने इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और रडार जैमिंग तकनीक का इस्तेमाल कर वेनेजुएला की हवाई सुरक्षा प्रणाली को निष्क्रिय किया. इसके बाद अमेरिकी विशेष बलों ने राष्ट्रपति भवन ‘मिराफ्लोरेस’ पर कार्रवाई की और मादुरो को हिरासत में ले लिया गया.

अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) के अनुसार, मादुरो पर ‘नार्को-टेररिज़्म’, मादक पदार्थों की तस्करी और उससे जुड़ी आपराधिक साज़िशों के आरोप लगाए गए हैं. अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि यह कार्रवाई उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय ड्रग नेटवर्क को कमजोर करने के लिए आवश्यक थी. वहीं, मादुरो बार-बार इन आरोपों का खंडन कर चुके हैं और इसे देश में तेल के विशाल भंडार पर क़ब्ज़े का बहाना बताते रहे हैं.

क्या यह कार्रवाई अचानक थी?

स्मिता शर्मा के अनुसार, यह कार्रवाई अचानक नहीं थी.
उनके शब्दों में,

“पिछले साल सितंबर से ही कैरिबियन क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना और खुफिया गतिविधियां बढ़ रही थीं. यह एक लंबे समय से तैयार किया जा रहा सैन्य-कानूनी अभियान था.”

अंतरराष्ट्रीय कानून और वैधता का सवाल

संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता और राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल प्रयोग पर रोक लगाता है.

स्मिता शर्मा इस कार्रवाई की तुलना 1989 में पनामा में हुए अमेरिकी हस्तक्षेप से करती हैं, जब अमेरिका ने मैनुअल नॉरिएगा को गिरफ्तार किया था.

अमेरिकी कार्यवाई से दुनिया सकते में

वेनेज़ुएला पर हुई इस कार्रवाई ने पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया है. अमेरिका के इस क़दम को दुनिया के कई देशों ने ‘एकतरफ़ा और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के ख़िलाफ़ की गई कार्रवाई’ बताया. 

इस मामले में भारत ने काफ़ी सतर्कता के साथ प्रतिक्रिया दी जिसकी काफ़ी आलोचना हो रही है. कई विश्लेषक नई दिल्ली की रणनीतिक दुविधा के रूप में देखते हैं. अमेरिकी कार्रवाई के लगभग 24 घंटे बाद रविवार को भारतीय विदेश मंत्रालय ने बयान जारी किया.

बयान में कहा गया, “भारत वेनेज़ुएला के लोगों की सुरक्षा और उनकी भलाई के लिए अपने समर्थन को फिर से दोहराता है. हम सभी संबंधित पक्षों से अपील करते हैं कि मुद्दों का समाधान बातचीत के ज़रिए और शांतिपूर्ण तरीक़े से किया जाए, ताकि क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनी रहे.”

मलेशिया ने अमेरिकी कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताई है. 

चीन ने मादुरो को तत्काल रिहा किए जाने की मांग करते हुए कहा था कि अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन किया है और दक्षिण अमेरिका क्षेत्र में ख़तरा पैदा किया है.

जबकि भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान ने कहा कि सभी मुद्दों का समाधान संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय क़ानून के सिद्धांतों के तहत किया जाना चाहिए.

ईसाई धर्मगुरु पोप लिओ ने वेनेज़ुएला की संप्रभुता की गारंटी देने की अपील की.

‘डोनरो सिद्धांत’ और अमेरिकी विदेश नीति की दिशा

राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने संबोधन में जिस ‘डोनरो डॉक्ट्रिन’ का ज़िक्र किया, उसे ऐतिहासिक रूप से 1823 के मनरो सिद्धांत से जोड़ा जाता है. मनरो सिद्धांत के तहत अमेरिका ने पश्चिमी गोलार्ध में बाहरी शक्तियों के हस्तक्षेप का विरोध किया था.

विडंबना यह है कि अब उसी ऐतिहासिक सोच का हवाला देते हुए अमेरिका खुद एक लैटिन अमेरिकी देश में प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई कर रहा है.

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
  • 2002: ह्यूगो शावेज़ के खिलाफ तख्तापलट का प्रयास, जिसमें अमेरिकी भूमिका पर सवाल उठे.
  • 2019: अमेरिका ने मादुरो सरकार पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए और विपक्षी नेता जुआन गुएदो को अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में मान्यता दी.

स्मिता शर्मा मानती हैं कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में सैन्य ताकत अमेरिकी विदेश नीति का केंद्रीय औज़ार बनती जा रही है. उन्होंने कहा,

“ ‘बूट्स ऑन द ग्राउंड’ अब एक असाधारण कदम नहीं, बल्कि नीति का हिस्सा बनता दिख रहा है.”

चीन, रूस और बदलता वैश्विक संतुलन

चीन वेनेजुएला के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है और वहां उसका भारी निवेश है. रूस भी लंबे समय से वेनेजुएला का प्रमुख सैन्य सहयोगी रहा है.

दोनों देशों ने UNSC में अमेरिकी वीटो की तीखी आलोचना की है और इसे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए खतरनाक मिसाल बताया है.

स्मिता शर्मा का आकलन
  • चीन सीधे सैन्य टकराव से बचेगा, लेकिन कूटनीतिक और आर्थिक दबाव बनाए रखेगा.
  • रूस इस घटना को अन्य क्षेत्रों, विशेषकर पूर्वी यूरोप, में अपनी कार्रवाइयों के औचित्य के रूप में इस्तेमाल कर सकता है.

उनका मानना है कि यह संकट केवल वेनेजुएला तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करेगा.

तेल की राजनीति और भारत पर संभावित असर

ऐसे में ये माना जा रहा है कि हाल के दिनों में वेनेज़ुएला में हुआ घटनाक्रम सत्ता परिवर्तन से अधिक वहां के तेल भंडार को लेकर है. वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है—300 अरब बैरल से अधिक. इसके बावजूद, सरकारी तेल कंपनी PDVSA का उत्पादन पिछले एक दशक में लगातार गिरता रहा है.

वहीं, भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और अपनी ज़रूरत के 88% तेल के लिए आयात पर निर्भर है. भारत ने हाल के सालों में रूस के कच्चे तेल पर निर्भरता बढ़ाई है हालांकि, इसे लेकर अमेरिका का ऐतराज है और भारत ने अमेरिका से कहा है कि वह रूस से कच्चा तेल ख़रीदना कम कर रहा है.

अमेरिका ने रूस से कच्चे तेल की ख़रीदारी की वजह से भारत पर अतिरिक्त टैरिफ़ लगाया है. रविवार को ही राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने भारत को चेतावनी दी है कि यदि रूस से कच्चे तेल की ख़रीद कम नहीं की तो अमेरिका और अधिक टैरिफ़ लगा सकता है.

ऐसे में, विश्लेषक ये भी मान रहे हैं कि वेनेज़ुएला का तेल भारत के लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है.

क्या अमेरिका तेल से लागत निकालेगा?

ट्रंप प्रशासन के इस दावे पर कि तेल राजस्व से ऑपरेशन की लागत निकाली जा सकती है, कई विशेषज्ञ संदेह जताते हैं.
स्मिता शर्मा के अनुसार:

  • तेल का बुनियादी ढांचा बेहद जर्जर है.
  • किसी भी आंतरिक संघर्ष या सबोटाज की स्थिति में उत्पादन पूरी तरह ठप हो सकता है.
भारत पर इसका कैसा प्रभाव पड़ेगा?

भारत ने 2019 के बाद से वेनेजुएला से तेल आयात बंद कर रखा है, लेकिन वैश्विक तेल कीमतों में उछाल का असर सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से:

  • आयात बिल बढ़ सकता है
  • महंगाई पर दबाव आ सकता है
  • रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है

MEA की एडवाइजरी इस संकट की गंभीरता को रेखांकित करती है.

वेनेजुएला संकट अब एक ऐसे मोड़ पर है. जहां अमेरिका इसे कानून प्रवर्तन और सुरक्षा का मामला बता रहा है, वहीं कई वैश्विक शक्तियां और विशेषज्ञ इसे संप्रभुता के उल्लंघन और शासन परिवर्तन की कोशिश मानते हैं.

आने वाले दिन यह तय करेंगे कि वेनेजुएला एक नई राजनीतिक व्यवस्था की ओर बढ़ेगा या इराक और लीबिया की तरह लंबे समय तक अस्थिरता में फंसा रहेगा.

(डिस्क्लेमर: यह एक स्टोरी इन प्रोग्रेस है. वेनेजुएला संकट से जुड़े घटनाक्रम तेज़ी से बदल रहे हैं. जैसे-जैसे नई और पुष्ट जानकारी सामने आएगी, इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.)