अगर धरती से गायब हो जाए गौरैया, तो इंसानों का क्या होगा?
Zindagi With Richa
लेखक- प्रभांशु शुक्ला
हर साल वर्ल्ड स्पैरो डे हमें एक साधारण-सी चिड़िया की याद दिलाता है – गौरैया, वह चिड़िया जो कभी हमारे घरों के आंगन, छतों और खिड़कियों के रोशनदानों में सबसे ज़्यादा दिखाई देती थी, सुबह की शुरुआत उसकी चहचहाहट से होती थी और शाम को वह फिर लौट आती थी, जैसे वो भी उसी घर का हिस्सा हो. लेकिन आज एक अजीब-सा सन्नाटा है, शहरों में रहने वाले कई बच्चे तो गौरैया को पहचानते तक नहीं हैं, सवाल यह है कि अगर सचमुच गौरैया धरती से गायब हो जाए तो क्या होगा? क्या ये सिर्फ़ एक चिड़िया के कम होने की कहानी है, या इसके पीछे प्रकृति का कोई बड़ा संतुलन छिपा हुआ है?
इंसानों के साथ 10,000 साल पुराना रिश्ता
गौरैया का इतिहास सिर्फ़ पक्षियों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह मानव सभ्यता के साथ जुड़ी हुई कहानी भी है, वैज्ञानिकों का मानना है कि हाउस स्पैरो करीब 10,000 साल पहले से इंसानों के साथ रहने लगी थी. उसी समय से जब इंसानों ने खेती करना शुरू किया, जब मनुष्य शिकारी जीवन से निकलकर स्थायी बस्तियों में रहने लगा, खेतों में गेहूं और अनाज उगाने लगा, तब गौरैया भी उसके साथ बस गई. ये उन कुछ पक्षियों में से एक है जो इंसानों के बिल्कुल करीब रहना पसंद करती हैं, हमारे घरों के आंगन में धूप में सूखते गेहूं के दाने, छतों पर रखे चावल, रोशनदानों के कोने, और कच्ची दीवारों की दरारें, ये सब गौरैया के लिए निमंत्रण की तरह थे. किसी समय भारत के गांवों और शहरों में ऐसा शायद ही कोई घर होता था जहां गौरैया ने घोंसला न बनाया हो.
वैज्ञानिकों की दिलचस्पी अक्सर दुर्लभ प्रजातियों में होती है
प्रकृति का एक दिलचस्प मनोविज्ञान है, वैज्ञानिक और आम लोग अक्सर उन जानवरों और पक्षियों में ज़्यादा रुचि लेते हैं जो दुर्लभ या विलुप्त होने के कगार पर होते हैं – जैसे बाघ, पांडा या गैंडा.
लेकिन गौरैया जैसी साधारण प्रजातियां, जो हर जगह दिखती थीं, अक्सर हमारे ध्यान से बाहर रह जाती हैं. शायद इसी कारण जब तक हम समझ पाते कि गौरैया कम हो रही है, तब तक कई शहरों में उसकी संख्या बहुत कम हो चुकी थी, ये प्रकृति का एक विडंबनापूर्ण सच है – जब कोई प्रजाति बहुत आम होती है, तब हम उसकी कीमत नहीं समझते, लेकिन जैसे ही वह दुर्लभ होने लगती है, हमें उसकी अहमियत दिखाई देने लगती है.
शहर बदले, तो गायब होने लगी हमारी ‘घरेलू चिड़िया’
पिछले कुछ दशकों में शहरों का चेहरा तेजी से बदल गया है, पहले के घरों में रोशनदान होते थे, खुली छतें होती थीं और दीवारों में छोटे-छोटे कोने होते थे जहाँ गौरैया आसानी से घोंसला बना सकती थी, लेकिन आज कंक्रीट की ऊंची-ऊंची इमारतें हैं, चिकनी दीवारें हैं, कांच की खिड़कियाँ हैं और हर घर के बाहर एयर कंडीशनर के बड़े-बड़े बॉक्स लगे हैं, इन आधुनिक इमारतों में गौरैया के लिए जगह ही नहीं बची, सिर्फ़ घरों की बनावट ही नहीं बदली, बल्कि हमारी जीवनशैली भी बदल गई, पहले घरों में अनाज खुले में रखा जाता था, दाने गिरते थे, जिन्हें गौरैया खा लेती थी, अब सब कुछ पैकेट में बंद है और दूसरी तरफ किसानों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कीटनाशक भी एक बड़ी वजह हैं, जिन्होंने कीड़े-मकोड़ों को गायब करना शुरू कर दिया, जिसकी वजह से भी गौरैया परेशान हुई क्योंकि गौरैया के बच्चे मुख्य रूप से कीड़े-मकोड़े खाते हैं, जब खेतों और शहरों में कीड़ों की संख्या कम हो गई, तो उनके बच्चों के लिए खाना भी कम होता गया.
चीन की एक ऐतिहासिक गलती
गौरैया की अहमियत को समझने के लिए दुनिया का एक बड़ा उदाहरण चीन में देखने को मिलता है. 1958 में चीन के नेता माओ ज़ेडॉन्ग ने एक अभियान शुरू किया जिसे ‘4 पेस्ट कैंपेन’ कहा जाता था, इस अभियान में चार जीवों को “पेस्ट” यानी हानिकारक घोषित किया गया चूहे, मच्छर, मक्खियाँ और गौरैया. तर्क ये था कि गौरैया खेतों से अनाज खा जाती हैं, इसलिए उन्हें खत्म कर देना चाहिए, इसके बाद पूरे चीन में एक अजीब अभियान शुरू हुआ, लोगों को घरों से बाहर निकलकर बर्तन बजाने को कहा गया ताकि गौरैया लगातार उड़ती रहें और थककर गिर जाएं, लाखों लोग सड़कों पर उतर आए, पेड़ों पर जाल लगाए गए, घोंसले नष्ट किए गए और गौरैयाओं को हर तरह से मार दिया गया. कुछ अनुमानों के अनुसार करीब एक अरब से ज़्यादा गौरैयाएं मारी गई थीं, शुरुआत में लगा कि फसलें बच जाएंगी, क्योंकि गौरैया अब अनाज नहीं खा रही थीं, लेकिन कुछ समय बाद एक बड़ा इकोलॉजिकल संकट सामने आया. गौरैया सिर्फ़ अनाज ही नहीं खाती, उनके बच्चों को पालने के लिए वो बड़ी मात्रा में कीड़े-मकोड़े भी पकड़ती हैं, जब चीन में गौरैयाओं की संख्या अचानक खत्म हो गई, तो कीड़ों की आबादी तेजी से बढ़ गई, टिड्डियां और अन्य कीट फसलों पर टूट पड़े, फसलें नष्ट होने लगीं. ये वही समय था जब चीन में भयंकर अकाल पड़ा, जिसे इतिहास में ‘चीन का महान अकाल’ के नाम से जाना जाता है – इतिहासकारों के अनुसार इस अकाल में लगभग 3 से 4 करोड़ लोगों की मौत हुई.
हालांकि अकाल के पीछे कई कारण थे, लेकिन इकोलॉजिकल संतुलन बिगड़ना भी उनमें से एक महत्वपूर्ण कारण माना जाता है, आख़िरकार 1960 में चीन सरकार को अपनी गलती का एहसास हुआ और गौरैया को फिर से संरक्षण देने का आदेश दिया गया.
प्रकृति का अदृश्य संतुलन और हमारा भावनात्मक रिश्ता
गौरैया की कहानी हमें ये समझाती है कि प्रकृति का संतुलन कितना नाजुक होता है. हर प्रजाति, चाहे वह कितनी भी साधारण क्यों न लगे, किसी न किसी रूप में इकोलॉजिकल तंत्र का हिस्सा होती है, गौरैया कीड़े खाती है, कीड़े पौधों को प्रभावित करते हैं, पौधे इंसानों के भोजन का हिस्सा हैं. ये एक लंबी श्रृंखला है, जब इस श्रृंखला की एक कड़ी टूटती है, तो उसका असर बहुत दूर तक जाता है. गौरैया सिर्फ़ इकोलॉजी का हिस्सा नहीं थी, वो हमारे सांस्कृतिक जीवन का भी हिस्सा रही है, पुरानी हिंदी कविताओं, कहानियों और लोकगीतों में गौरैया का जिक्र मिलता है.