Women’s Day: लखनऊ का पारुल्स ग्रामोफ़ोन जहां पारुल शर्मा महिलाओं को दे रही हैं सपनों की उड़ान
Zindagi With Richa
लेखिका- प्रकृति त्रिपाठी
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर, हम अक्सर महिला सशक्तिकरण और सपनों की उड़ान की बात करते हैं. नवाबों के शहर लखनऊ के गोमती नगर में एक ऐसा अड्डा है, जो इन बातों को ज़मीन पर सच साबित कर रहा है.
यह वह जगह है, जहां हर पल यह एहसास कराया जाता है कि महिलाओं के सपनों और सीखने की कोई बॉर्डर लाइन यानी उम्र की सीमा नहीं होती. गाना आता हो या न आता हो, लिखना आता हो या न आता हो, यहां हर किसी को अपने अंदर छुपे टैलेंट को बाहर लाने का मंच मिलता है. कई विवाहित महिलाएं इस अड्डे को अपना ‘मायका’ कहती हैं, तो कुछ इसे अपनी रोज़मर्रा की भागदौड़ के बीच ‘सुकून का कोना’ मानती हैं.
तो चलिए, महिला दिवस के इस ख़ास मौके पर आज आपको लखनऊ के पारुल्स ग्रामोफ़ोन लेकर चलते हैं.
एक महिला के हौसले की कहानी: क्या है पारुल्स ग्रामोफ़ोन?
पारुल्स ग्रामोफ़ोन का नाम सुनकर आपके मन में कई तरह के सवाल आ सकते हैं:
- क्या यहां ग्रामोफ़ोन मिलता है?
- क्या आज भी यहां ग्रामोफ़ोन पर गाने सुनाए जाते हैं?
आपके सवालों की सूची और लंबी हो, उससे पहले आइए एक महिला के दृढ़ निश्चय की यह कहानी जानते हैं.
पारुल्स ग्रामोफ़ोन असल में एक कैफ़े और म्यूज़िक एकेडमी है, जिसकी शुरुआत 2017 में हुई थी. इस यूनिक कॉन्सेप्ट के पीछे एक खूबसूरत और ज़िंदादिल चेहरा है, पारुल शर्मा. उन्होंने अपने जीवन की दूसरी पारी में संगीत सीखने के लिए एक मंच तलाशा था. मंच तो मिला, लेकिन वहां कभी लोगों के जजमेंट का सामना करना पड़ा, तो कभी “अब इस उम्र में क्या सीखना” जैसे ताने सुनने पड़े.
पारुल ने इन तानों से हार मानने के बजाय, खुद एक ऐसा मंच बनाने की ठानी जहां किसी भी उम्र की महिला या पुरुष बिना किसी झिझक के अपना हुनर निखार सकें. इसी सोच से इस अनोखे कैफ़े की नींव पड़ी.
स्वाद और सेहत का बेहतरीन मिश्रण
वैसे इन सब ख़ास बातों के बीच एक विशेष बात यह भी है कि इस कैफ़े में एक से बढ़कर एक स्वादिष्ट व्यंजन मिलते हैं, जिनमें स्वाद और सेहत दोनों का बेहतरीन मिश्रण है.
मैंने यहां ‘आलू झोल’ की सब्ज़ी खाई थी, जिसका स्वाद आज भी याद करते ही मुंह में पानी आ जाता है. अगर आप एक बार यहां की कोई भी डिश खा लेंगे, तो बार-बार यहां आने का मन करेगा, क्योंकि यहां के खाने में आज भी वह देसी स्वाद मिलता है, जो घर की याद दिलाता है. पारुल्स ग्रामोफ़ोन, लखनऊ में ही नहीं आस-पास के शहरों में भी जाना-पहचाना जाता है.
मुश्किलों से सफलता तक का सफ़र
इस अड्डे को और विस्तार से जानने के लिए जब हमने यहां की संचालिका पारुल शर्मा से बातचीत की, तब उन्होंने बताया कि शुरुआती दिनों में जब पारुल्स ग्रामोफ़ोन की नींव रखी गई, तब लोगों को यह कॉन्सेप्ट आसानी से समझ नहीं आ रहा था.
इसी दौरान कोविड काल भी आ गया. एक महिला उद्यमी के तौर पर यह एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन पारुल ने तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए इसे पूरी मज़बूती से संभाले रखा. उनका कहना है कि किसी भी व्यवसाय को चलाने के लिए निरंतरता और संयम बेहद ज़रूरी होते हैं. वक़्त लगता है, लेकिन मेहनत का फल ज़रूर मिलता है.
महिलाओं और बुज़ुर्गों के लिए एक जीवनदान
इसके बाद मैंने पारुल्स ग्रामोफ़ोन से जुड़ी कुछ अन्य महिलाओं और सदस्यों से बातचीत की. उन्होंने बताया कि यहां से जुड़ने के बाद उनका अकेलापन और डिप्रेशन काफ़ी कम हुआ है. परफ़ॉर्मिंग आर्ट्स और म्यूज़िक ने उन्हें अपनी एक नई पहचान और जीवन जीने की नई ऊर्जा दी है. कुछ महिलाओं ने यह भी साझा किया कि घर-परिवार की ज़िम्मेदारियों के बीच, यहां आकर उनका समय कैसे गुज़र जाता है, इसका पता ही नहीं चलता.
पारुल शर्मा ने केवल एक कैफ़े ही नहीं खोला, बल्कि उन्होंने समाज के उन लोगों के बारे में भी सोचा, जिनके बारे में समय के साथ लोग सोचना बंद कर देते हैं. घर में अकेले पड़े कई बुज़ुर्ग अवसाद का शिकार हो जाते हैं. ऐसे में यह अड्डा उनके लिए एक जीवनदान की तरह साबित होता है.
जब आप यहां आएंगे, तो आपका मन अपने बड़े-बुज़ुर्गों को भी यहां लाने का करेगा, क्योंकि आप उन्हें अपने सपने पूरे करते हुए देख पाएंगे.
महिला दिवस पर एक प्रेरणा
अगर आप लखनऊ के निवासी हैं, तो संभव है कि आप पारुल्स ग्रामोफ़ोन के बारे में पहले से जानते हों. और अगर नहीं जानते, तो जब भी आप लखनऊ आएं, यहां ज़रूर जाइएगा. महिला दिवस के अवसर पर पारुल शर्मा की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि जब एक महिला ठान ले, तो वह न सिर्फ़ अपनी, बल्कि समाज के कई लोगों की ज़िंदगी में सुकून और संगीत भर सकती है.