थैलेसीमिया साइलेंट कैरियर: वो ख़ामोश बीमारी जो ले सकती है बच्चे की जान
Ashlesha Thakur
भारत में जब शादियाँ तय होती हैं, तो हम सबसे पहले 36 गुण मिलाते हैं, मांगलिक दोष चेक करते हैं लेकिन हम जो सबसे ज़रूरी चीज़ मिलाना भूल जाते हैं, वह है ‘मेडिकल कुंडली’.
क्या आपको पता है कि भारत को दुनिया का ‘थैलेसीमिया कैपिटल’ (Thalassemia Capital) कहा जाता है? यहां हर साल हज़ारों बच्चे ‘थैलेसीमिया मेजर’ जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारी के साथ पैदा होते हैं. सबसे डरावनी बात यह है कि इस बीमारी को जन्म देने वाले माता-पिता अक्सर ख़ुद को पूरी तरह स्वस्थ मानते हैं. उन्हें पता ही नहीं होता कि वे थैलेसीमिया के ‘साइलेंट कैरियर’ हैं.
इस गंभीर विषय और इसके बचाव पर हमने आर्टेमिस हॉस्पिटल्स, गुरुग्राम के दो शीर्ष विशेषज्ञों—डॉ. गौरव दीक्षित (हेड – हेमेटोलॉजी ऑन्कोलॉजी एंड बोन मैरो ट्रांसप्लांट) और डॉ. रेनू रैना सहगल (चेयरपर्सन – डिपार्टमेंट ऑफ़ ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी) से विस्तार से बात की. आइए जानते हैं कि यह ‘साइलेंट’ दुश्मन कैसे काम करता है और क्यों शादी से पहले एक छोटा सा ब्लड टेस्ट आपके बच्चे की जान बचा सकता है.
साइलेंट कैरियर होने का क्या मतलब है?
अक्सर लोगों को ‘थैलेसीमिया’ शब्द सुनते ही घबराहट होने लगती है. लेकिन इसके दो मुख्य प्रकार होते हैं, माइनर और मेजर.
डॉ. गौरव दीक्षित इसे बेहद आसान शब्दों में समझाते हैं, “थैलेसीमिया खून से जुड़ी एक जेनेटिक बीमारी है, जिसमें शरीर सही तरह से हीमोग्लोबिन (खून) नहीं बना पाता. जब हम किसी को थैलेसीमिया ‘माइनर’ या ‘साइलेंट कैरियर‘ कहते हैं, तो इसका मतलब है कि उस व्यक्ति के अंदर इस बीमारी का जीन तो मौजूद है, लेकिन उसे खुद कोई बीमारी नहीं है. ऐसे लोग बिलकुल सामान्य ज़िंदगी जीते हैं और उनमें कोई बाहरी लक्षण नहीं दिखते. उनमें बस हल्का-फुल्का खून कम (एनीमिया) रहता है.”
माइनर और मेजर में असली फ़र्क: डॉ. दीक्षित बताते हैं कि माइनर वाले लोग स्वस्थ रहते हैं, लेकिन ‘थैलेसीमिया मेजर’ (Thalassemia Major) बहुत गंभीर स्थिति है. मेजर वाले बच्चों का शरीर ख़ुद ख़ून नहीं बना पाता, इसलिए उन्हें ज़िंदा रहने के लिए हर 15-20 दिन में बाहर से खून (Blood Transfusion) चढ़ाना पड़ता है.
वह बड़ी ग़लती: जब महिलाएँ खाती रहती हैं आयरन की गोलियां
थैलेसीमिया के साइलेंट कैरियर होने का सबसे बड़ा ख़तरा ग़लत इलाज है, ख़ासकर महिलाओं में.
डॉ. दीक्षित एक बहुत ही आम और ख़तरनाक धारणा की ओर ध्यान दिलाते हैं: “आजकल कई महिलाओं में माइनर वाली दिक्कत होती है. उनके शरीर में हीमोग्लोबिन थोड़ा कम रहता है. चूंकि महिलाओं को पीरियड्स भी होते हैं, इसलिए अक्सर डॉक्टर भी इसे सामान्य ‘एनीमिया’ (आयरन की कमी) समझ लेते हैं और उन्हें महीनों तक आयरन की गोलियां खाने की सलाह दे देते हैं. यह बिलकुल ग़लत और ख़तरनाक है.”
क्यों ख़तरनाक है? थैलेसीमिया माइनर में खून की कमी आयरन की कमी से नहीं होती. ऐसे में बिना ज़रूरत लंबे समय तक आयरन की गोलियां खाने से आयरन शरीर के अंगों जैसे लिवर, दिल और किडनी में जमा होने लगता है, जो ज़हर का काम कर सकता है. इसलिए, अगर हीमोग्लोबिन कम है, तो सही जाँच कराएं.
आनुवंशिक गणित: बच्चा ‘मेजर’ कैसे बन जाता है?
अगर थैलेसीमिया माइनर वाला व्यक्ति पूरी तरह स्वस्थ है, तो ख़तरा कहाँ है? ख़तरा तब पैदा होता है जब दो ‘माइनर’ (कैरियर) आपस में शादी कर लें.
डॉ. रेनू रैना सहगल इस जेनेटिक गणित को समझाती हैं, “थैलेसीमिया एक जेनेटिक बीमारी है, जो माता-पिता से बच्चों में आती है. अगर माता और पिता दोनों ही ‘माइनर’ (कैरियर) हैं, तो हर प्रेगनेंसी में यह ख़तरा रहता है:
- 25 फ़ीसदी आशंका: बच्चा थैलेसीमिया ‘मेजर’ (गंभीर रूप से बीमार) पैदा होगा.
- 50 फ़ीसदी आशंका: बच्चा माता-पिता की तरह ‘कैरियर’ (माइनर) बनेगा और स्वस्थ रहेगा.
- 25 फ़ीसदी संभावना: बच्चा एकदम सामान्य होगा, उसमें जीन भी नहीं होगा.”
डॉ. सहगल स्पष्ट करती हैं कि ज़रूरी नहीं कि माता-पिता माइनर हों तो बच्चा बीमार ही होगा, लेकिन यह 25% का रिस्क बहुत बड़ा होता है.
समाधान: शादी से पहले बस एक ब्लड टेस्ट
इस पूरी समस्या का समाधान बहुत ही आसान और सस्ता है.
डॉ. सहगल सलाह देती हैं: “शादी या प्रेगनेंसी से पहले HbA2 (हीमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफोरेसिस) नाम का एक बहुत ही आसान सा ब्लड टेस्ट करवाएं. यह बता देगा कि आप माइनर हैं या नहीं. अगर दोनों पार्टनर माइनर निकलते हैं, तो सही काउंसलिंग से बच्चे को थैलेसीमिया मेजर होने से बचाया जा सकता है.”
अगर प्रेगनेंसी हो चुकी है, तो क्या करें?
अगर कोई कपल पहले से गर्भवती है और तब उन्हें पता चलता है कि वे दोनों कैरियर हैं, तो भी घबराने की ज़रूरत नहीं है. मेडिकल साइंस के पास इसका भी उपाय है.
डॉ. सहगल बताती हैं: “प्रेगनेंसी के दौरान गर्भ में पल रहे बच्चे की जांच की जा सकती है. इसके लिए दो टेस्ट मौजूद हैं— CVS (कोरियोनिक विलस सैंपलिंग) जो 10 से 12 हफ़्तों में होता है, और एमनियोसेंटेसिस (Amniocentesis) जो 15 से 20 हफ़्तों में किया जाता है. इन टेस्ट से पता चल जाता है कि बच्चे को थैलेसीमिया मेजर है या नहीं. इसके आधार पर कपल आगे का सही फ़ैसला ले सकते हैं.
समाज की ग़लतफ़हमियाँ और सरकार की ज़िम्मेदारी
भारत में इस बीमारी का बोझ बहुत ज़्यादा है, फिर भी जागरूकता की भारी कमी है.
डॉ. गौरव दीक्षित बताते हैं कि पढ़े-लिखे लोग भी इसे लेकर ग़लतफ़हमियों का शिकार हैं. कई लोग इसे ‘छुआछूत’ की बीमारी समझ लेते हैं, तो कुछ लोग कैरियर (माइनर) होने की बात को हल्के में लेते हैं.
डॉ. रेनू सहगल का मानना है कि अब सरकार को सख़्त कदम उठाने होंगे. “सरकार को जागरूकता अभियान चलाने चाहिए. जो भी सरकारी विवाह योजनाएं हैं, उनमें इस टेस्ट को अनिवार्य कर देना चाहिए. ग्रामीण इलाक़ों तक इस टेस्ट की सुविधा और काउंसलिंग पहुँचनी चाहिए, ताकि हर व्यक्ति समय पर अपनी स्थिति जान सके.”
कुंडलियां मिलाना हमारी आस्था हो सकती है, लेकिन ‘मेडिकल कुंडली’ मिलाना हमारी ज़िम्मेदारी है. थैलेसीमिया मेजर कोई ऐसी बीमारी नहीं है जिसका इलाज न हो, लेकिन यह ऐसी बीमारी ज़रूर है जिसे 100% रोका जा सकता है. अपनी ज़िम्मेदारी समझें, जाँच कराएँ और आने वाली पीढ़ी को एक स्वस्थ भविष्य दें.