कम नींद और प्री-डायबिटीज़: 6 घंटे से कम सोना कैसे बढ़ाता है शुगर? बता रहे एक्सपर्ट्स
Ashlesha Thakur
अगर आपको लगता है कि सिर्फ़ ज़्यादा मीठा खाने, चावल खाने या वज़न बढ़ने से ही ब्लड शुगर बढ़ता है, तो आपको अपनी सोच बदलने की ज़रूरत है. हाल ही में आई एक बड़ी स्टडी जिसमें 5 लाख से ज़्यादा लोगों पर शोध किया गया ने एक चौंकाने वाला ख़ुलासा किया है. अगर आप रात में 6 घंटे से कम सोते हैं, तो सुबह उठने तक आपका ब्लड शुगर ‘प्री-डायबिटिक’ लेवल तक पहुंच सकता है.
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, भारत में 13.6 करोड़ लोग पहले से ही प्री-डायबिटिक हैं. हमारी शहरी लाइफ़स्टाइल, जिसमें देर रात तक जागना और स्क्रीन से चिपके रहना शामिल है, इस संकट को एक ‘महामारी’ में बदल रही है.
कम नींद और प्री-डायबिटीज़ के बीच के कनेक्शन को और भी बेहतर तरीक़े से समझने के लिए हमने विशेषज्ञों, डॉ. अमित प्रकाश सिंह (कंसल्टेंट – इंटरनल मेडिसिन, सीके बिरला हॉस्पिटल, दिल्ली) और डॉ. सुमीत अरोड़ा (सीनियर कंसल्टेंट, डायबिटीज़ एंड एंडोक्रिनोलॉजी, आर्टेमिस हॉस्पिटल्स, गुरुग्राम) से विस्तार से बात की. आइए जानते हैं कि नींद की कमी कैसे आपके लिवर और मेटाबॉलिज़्म के साथ खिलवाड़ कर रही है और कैसे इसे रिवर्स किया जा सकता है.
ख़राब डाइट नहीं, ख़राब नींद बन रही है असली ‘विलेन’
अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि वे मीठा नहीं खाते, फिर भी उनका ब्लड शुगर ज़्यादा क्यों आ रहा है.
डॉ. अमित प्रकाश सिंह अपनी ओपीडी का अनुभव साझा करते हुए बताते हैं: “आजकल मेरी ओपीडी में ऐसे काफ़ी मरीज़ आ रहे हैं ,जिनकी शुगर सिर्फ़ ख़राब डाइट की वजह से नहीं, बल्कि ख़राब नींद और ज़्यादा स्ट्रेस की वजह से बढ़ रही है. पहले लोग समझते थे कि सिर्फ़ मीठा या वज़न बढ़ना ही कारण है. लेकिन अब हम देख रहे हैं कि जो लोग 5–6 घंटे से कम सो रहे हैं, देर रात तक फ़ोन चला रहे हैं या बहुत स्ट्रेस में हैं, उनकी फ़ास्टिंग शुगर 100 के ऊपर आ रही है, यानी प्री-डायबिटिक रेंज में. कई बार डाइट बिलकुल ठीक होने के बावजूद सिर्फ़ नींद ख़राब होने से शुगर बढ़ रही है.”
ICMR के डराने वाले आंकड़ों पर बात करते हुए डॉ. अमित कहते हैं कि हमारी शहरी लाइफ़स्टाइल शरीर की बायोलॉजिकल घड़ी को पूरी तरह बिगाड़ रही है. जब आप 6 घंटे से कम सोते हैं, तो शरीर इसे ‘स्ट्रेस’ मानता है और स्ट्रेस हार्मोन रिलीज़ करता है, जो बिना मीठा खाए भी शुगर लेवल बढ़ा देते हैं.
साइंस की नज़र से: नींद, कोर्टिसोल और लिवर का कनेक्शन
आख़िर रात भर न सोने से शरीर के अंदर ऐसा क्या होता है कि सुबह शुगर बढ़ जाती है? इस जटिल बायोलॉजिकल प्रक्रिया को डॉ. सुमीत अरोड़ा बेहद आसान शब्दों में समझाते हैं.
इंसुलिन रेजिस्टेंस की शुरुआत: “यह बात बिलकुल सही है कि नींद की कमी से इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या हो जाती है. जब हम 8 घंटे की अच्छी और गहरी नींद नहीं ले पाते हैं, तो शरीर तनाव की स्थिति यानी स्ट्रेस मोड में चला जाता है. इससे कोर्टिसोल और एड्रीनलीन जैसे स्ट्रेस हार्मोन बढ़ जाते हैं. ये हार्मोन कोशिकाओं को इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील बना देते हैं. नतीजा यह होता है कि इंसुलिन अपना काम ठीक से नहीं कर पाता है और ग्लूकोज़ खून में जमा रहने लगता है. इसे सीधे शब्दों में कहा जाए तो अगर आप अच्छी नींद नहीं लेते हैं, तो शरीर इंसुलिन की बात ही नहीं सुनता है.”
लिवर क्यों छोड़ता है ज़्यादा ग्लूकोज़? डॉ. अरोड़ा आगे बताते हैं कि नींद की कमी से हमारा दिमाग़ शरीर को ‘अलर्ट मोड’ में रहने का संकेत देता है. इसके जवाब में एड्रेनल ग्लैंड ज़्यादा मात्रा में कोर्टिसोल छोड़ती है. “कोर्टिसोल का एक ज़रूरी काम यह है कि वह शरीर को आपातकालीन ऊर्जा उपलब्ध कराए. यह लिवर को संकेत देता है कि वह अपनी जमा की हुई ग्लूकोज़ (ग्लाइकोजन) को तोड़े और खून में छोड़े. इस प्रक्रिया को ग्लाइकोजेनोलाइसिस कहते हैं. लिवर ज़रूरत से ज़्यादा ग्लूकोज़ रिलीज़ करने लगता है, भले ही शरीर को उस वक़्त ऊर्जा की ज़रूरत न हो. नतीजा, सुबह उठते ही ब्लड शुगर बहुत ज़्यादा बढ़ा हुआ मिलता है.”
कम सोना बनाम बार-बार नींद टूटना: ज़्यादा ख़राब क्या है?
कई लोग 8 घंटे बिस्तर पर तो रहते हैं, लेकिन उनकी नींद बार-बार टूटती है. मेटाबॉलिज़्म के नज़रिए से क्या ज़्यादा ख़राब है, कम सोना या ख़राब क्वालिटी की नींद?
डॉ. सुमीत अरोड़ा स्पष्ट करते हैं: “मेटाबॉलिज़्म के नज़रिए से देखा जाए तो सिर्फ़ 4-5 घंटे वाली नींद या ख़राब क्वालिटी वाली नींद, दोनों ही ब्लड शुगर के लिए बेहद नुक़सानदायक हैं. अगर आप सिर्फ़ 4-5 घंटे सोते हैं, तो शरीर को पर्याप्त गहरी नींद नहीं मिलती, इंसुलिन सेंसिटिविटी घटती है और लिवर ज़्यादा ग्लूकोज़ खून में छोड़ता है. दूसरी तरफ़, अगर आप 8 घंटे बिस्तर पर रहते हैं और नींद बार-बार टूटती है, तो शरीर बार-बार अलर्ट मोड में चला जाता है. इससे भी स्ट्रेस हार्मोन बढ़ते हैं. ब्लड शुगर मेंटेन रखने के लिए सबसे अच्छा है कि 7 से 8 घंटे की लगातार, गहरी और आरामदायक नींद लें.”
डायबिटीज़ के मरीज़ों के लिए ‘एक रात’ का नुक़सान
जो लोग पहले से ही टाइप-2 डायबिटीज़ के शिकार हैं, उनके लिए नींद की कमी और भी ज़्यादा ख़तरनाक है.
डॉ. अरोड़ा कहते हैं: “जिस भी व्यक्ति को पहले से टाइप-2 डायबिटीज़ है, उसके लिए सिर्फ़ एक रात की ख़राब नींद भी ब्लड शुगर के कंट्रोल को बिगाड़ सकती है. कई स्टडीज़ में देखा गया है कि एक रात की नींद की कमी से इंसुलिन सेंसिटिविटी 15 से 20% तक घट सकती है. डायबिटीज़ के मरीज़ों में पहले से ही इंसुलिन रेजिस्टेंस मौजूद होता है, ऐसे में नींद की कमी उस पर और ज़्यादा बोझ डालती है. इससे दिनभर भोजन के बाद शुगर तेज़ी से बढ़ सकती है और दवाओं या इंसुलिन की प्रभावशीलता थोड़ी कम हो सकती है.”
शरीर के वो छिपे हुए संकेत जिन्हें न करें नज़रअंदाज़
थकान महसूस होना तो आम है, लेकिन ख़राब नींद आपके मेटाबॉलिज़्म को बिगाड़ रही है, इसके कुछ छिपे हुए शारीरिक संकेत भी हैं.
डॉ. अमित प्रकाश सिंह इन संकेतों की पहचान बताते हैं:
- कमर का घेरा तेज़ी से बढ़ना.
- सुबह की फ़ास्टिंग शुगर का हमेशा हल्की बढ़ी हुई आना.
- बार-बार भूख लगना और मीठा या तला हुआ खाने की ज़बरदस्त क्रेविंग होना.
- ब्लड प्रेशर का बढ़ना.
- दिन में बहुत ज़्यादा नींद आना और रात में ज़ोर से खर्राटे लेना.
अगर आपके साथ भी ऐसा हो रहा है, तो समझ जाइए कि नींद की कमी आपके मेटाबॉलिज़्म के साथ खिलवाड़ कर रही है.
क्या इस नुक़सान की भरपाई संभव है?
सबसे बड़ा सवाल तह है कि क्या नींद सुधारने से ब्लड शुगर वापस नॉर्मल हो सकता है?
डॉ. अमित प्रकाश सिंह एक अच्छी ख़बर देते हैं: “अगर कुछ हफ़्तों या महीनों की ख़राब नींद की वजह से शुगर बढ़ी है, तो ज़्यादातर मामलों में यह स्थायी नुक़सान नहीं होता. अगर समय रहते नींद का रूटीन सुधार लिया जाए और रोज़ 6–8 घंटे की नींद ली जाए, तो शुगर लेवल फिर से नॉर्मल आ सकता है. मरीज़ ख़ुद बताते हैं कि नींद ठीक होते ही एनर्जी बढ़ती है, भूख और मीठे की क्रेविंग कम होती है और वज़न कंट्रोल करना आसान हो जाता है.”
हालांकि, वे चेतावनी भी देते हैं कि अगर सालों तक नींद ख़राब रहे, तो यह नुक़सान धीरे-धीरे स्थायी हो सकता है और व्यक्ति को डायबिटीज़ की समस्या हो सकती है.
इलाज का ‘तीसरा स्तंभ’: नींद कोई आलस नहीं, शरीर की ज़रूरत है
हमेशा से डायबिटीज़ को कंट्रोल करने के लिए दो चीज़ों पर ज़ोर दिया जाता रहा है, संतुलित आहार और नियमित व्यायाम. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अब ‘नींद’ को आधिकारिक तौर पर इसका तीसरा स्तंभ मान लेना चाहिए.
डॉ. सुमीत अरोड़ा कहते हैं: “हम नींद के पहलू को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. नींद सिर्फ़ आराम नहीं है, बल्कि यह हार्मोन संतुलन, इंसुलिन सेंसिटिविटी, भूख नियंत्रण करने वाले हार्मोन और स्ट्रेस लेवल को संतुलित रखती है. अगर व्यक्ति कितना भी सही खान-पान ले रहा हो, एक्सरसाइज़ कर रहा हो, लेकिन लगातार नींद सही से नहीं ले पा रहा है, तो शुगर कंट्रोल करना मुश्किल हो सकता है. डायबिटीज़ मैनेजमेंट के लिए नींद को तीसरा स्तंभ मानना एकदम जायज़ है.”
टॉप 3 ‘स्लीप हाइजीन’ टिप्स (बॉर्डरलाइन मरीज़ों के लिए):
बिना दवाइयों के शुगर कंट्रोल करने और बेहतर नींद के लिए डॉ. अमित ये 3 आसान सलाह देते हैं:
- सोने का समय तय करें: रात 11 बजे से पहले सोने की आदत डालें और 6–8 घंटे की नींद ज़रूर लें.
- डिजिटल डिटॉक्स: सोने से कम से कम 1 घंटा पहले मोबाइल, टीवी और लैपटॉप पूरी तरह बंद कर दें.
- हल्का डिनर: रात का खाना सोने से 2–3 घंटे पहले कर लें और डिनर में बहुत भारी या ज़्यादा मीठा खाना न खाएं.
सीधी बात यह है कि “अच्छी नींद का मतलब है बेहतर शुगर कंट्रोल.” अपनी नींद को अपनी कामयाबी की राह का रोड़ा न मानें, बल्कि इसे अपने स्वास्थ्य का सबसे बड़ा रक्षक समझें. आज रात अपने मोबाइल को किनारे रखें, और अपने शरीर को वो आराम दें, जिसका वह हक़दार है.