निपाह वायरस 2026: पश्चिम बंगाल में आहट, क्या हमारे पास वैक्सीन और इलाज है?
Ashlesha Thakur
जनवरी की सर्द हवाओं के साथ ही भारत के पूर्वी हिस्से, पश्चिम बंगाल में एक पुरानी और जानलेवा बीमारी निपाह वायरस (Nipah Virus) की चर्चा फिर शुरू हो गई है. सर्दियों का मौसम (दिसंबर से फरवरी) निपाह के लिए ‘हाई रिस्क’ सीज़न माना जाता है, और इस साल भी पश्चिम बंगाल में मिले संदिग्ध मामलों ने स्वास्थ्य महकमे की नींद उड़ा दी.
जहां 2024 में केरल के मलप्पुरम में हुए प्रकोप ने हमें डराया था, वहीं 2026 की शुरुआत में बंगाल से आ रही खबरें बता रही हैं कि खतरा अभी टला नहीं है. विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO इसे अपनी प्राथमिकता वाली बीमारियों की सूची में रखता है क्योंकि इसकी मृत्यु दर 40% से 75% तक है, जो कोविड-19 से कई गुना ज़्यादा है.
इस आर्टिकल में, हमने दो वरिष्ठ विशेषज्ञों डॉ. मनीषा अरोड़ा (डायरेक्टर- इंटरनल मेडिसिन, सीके बिरला हॉस्पिटल, दिल्ली) और डॉ. नमिता जग्गी (चेयरपर्सन- लैब सर्विसेज और इंफेक्शन कंट्रोल, आर्टेमिस हॉस्पिटल) से बात की. जानिए 2026 में हम इलाज, वैक्सीन और बचाव के मामले में कहां खड़े हैं.
सर्दियों का ख़तरा: खजूर का रस और बदलता पैटर्न
निपाह वायरस का सीधा संबंध फ्रूट बैट्स या चमगादड़ों से है. सर्दियों में बंगाल और बांग्लादेश में खजूर के पेड़ों से रस निकालने का चलन है. रात के समय चमगादड़ इस रस को पीते हैं और अपनी लार या मल से उसे दूषित कर देते हैं. जब इंसान सुबह इस कच्चे रस को पीते हैं, तो वायरस सीधे उनके शरीर में प्रवेश कर जाता है.
डॉ. नमिता जग्गी बताती हैं कि हालांकि यह पैटर्न पुराना है, लेकिन वायरस अब अपने पैर पसार रहा है. पहले निपाह ज्यादातर सर्दियों (दिसंबर–जनवरी) में और खजूर के रस से जुड़ा रहता था. यह पैटर्न अब भी बना हुआ है, लेकिन हम एक चिंताजनक बदलाव देख रहे हैं. हाल के कुछ मामलों में खजूर के रस से सीधा लिंक नहीं मिला, जिसका मतलब है कि वायरस अब सिर्फ उसी रास्ते से नहीं फैल रहा. संक्रमण के तरीके विविध हो रहे हैं, जैसे चमगादड़ की लार से दूषित फल खाना या संक्रमित जानवरों के संपर्क में आना.
डॉ. जग्गी ये भी कहती हैं: “बीमारी अब एक ही जगह तक सीमित नहीं है. पहले बंगाल, फिर केरल और अब फिर बंगाल. वायरस का यह ‘शिफ्ट’ बताता है कि हमें सिर्फ एक राज्य या एक मौसम तक अपनी निगरानी सीमित नहीं रखनी चाहिए.”
निपाह वायरस के लक्षण और रेड फ़्लैग्स: फ़्लू या निपाह?
निपाह की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके शुरुआती लक्षण बिलकुल आम वायरल बुख़ार, फ़्लू या कोविड-19 जैसे लगते हैं. ऐसे में एक डॉक्टर या मरीज कैसे पहचाने कि यह निपाह हो सकता है?
डॉ. मनीषा अरोड़ा ने 2026 के लिए कुछ रेड फ़्लैग्स बताए हैं: अगर किसी मरीज को तेज बुख़ार के साथ अचानक दिमागी लक्षण दिखें, तो यह ख़तरे की घंटी है. जैसे:
- अचानक चक्कर आना
- बहुत ज्यादा नींद आना
- कन्फ़्यूज़न या बातों का ठीक से जवाब न देना
- व्यवहार में बदलाव
इसके अलावा, अगर मरीज को झटके आ रहे हों या उसकी हालत 24-48 घंटे में तेज़ी से बिगड़ रही हो, तो यह निपाह हो सकता है. डॉ. अरोड़ा कहती हैं: “अगर मरीज हाल ही में किसी प्रभावित इलाके (जैसे केरल या बंगाल के कुछ ज़िले) से आया हो, तो डॉक्टर को तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए, भले ही वहां कोई बड़ा आउटब्रेक न चल रहा हो.”
गोल्डन ऑवर: अस्पताल क्या करें?
निपाह एक अत्यधिक संक्रामक रोग है, जो मरीज से उसके केयरगिवर और नर्सों में बहुत तेज़ी से फैलता है. 2018 के कोझिकोड प्रकोप में हमने देखा था कि कैसे इलाज करने वाली नर्स लिनी पुथुसरी की जान चली गई थी.
डॉ. मनीषा अरोड़ा के अनुसार, लैब रिपोर्ट का इंतज़ार करना भारी पड़ सकता है. वो आगे कहती हैं, “निपाह में समय बहुत कीमती है. अगर लक्षण संदिग्ध हैं, तो सबसे पहले मरीज को आइसोलेशन वार्ड में शिफ्ट करना चाहिए. यह नॉन-नेगोशिएबल है. डॉक्टर और स्टाफ़ को फ़ुल PPE किट (N95 मास्क, फेस शील्ड, गाउन) पहनकर ही मरीज के पास जाना चाहिए. जब तक पुणे की वायरोलॉजी लैब (NIV) से रिपोर्ट नहीं आती, तब तक उसे ‘पॉजिटिव’ मानकर ही इलाज करना चाहिए ताकि बाकी मरीज़ सुरक्षित रहें.”
इलाज: निपाह वायरस से लड़ने के लिए क्या 2026 में हमारे पास कोई दवा है?
सालों तक निपाह का इलाज सिर्फ ‘सपोर्टिव केयर’ (बुख़ार कम करना, ऑक्सीजन देना) तक सीमित था. क्या 2026 में तस्वीर बदली है?
मोनोक्लोनल एंटीबॉडी (m102.4): यह एक विशेष एंटीबॉडी दवा है, जिसे ऑस्ट्रेलिया से मंगवाया जाता है. डॉ. अरोड़ा बताती हैं: “2026 में स्थिति पहले से बेहतर है, लेकिन यह दवा अभी भी रूटीन इलाज का हिस्सा नहीं है. m102.4 जैसी एंटीबॉडी का इस्तेमाल ‘कम्पैशनेट यूज़’ यानी विशेष अनुमति के तहत किया जाता है. सबसे अहम बात यह है कि यह दवा तभी असरदार है जब इसे बीमारी की शुरुआती स्टेज में दिया जाए. एक बार जब वायरस दिमाग को पूरी तरह जकड़ लेता है, तो इसका असर कम हो जाता है.”
ICMR अब स्वदेशी एंटीबॉडी विकसित करने पर काम कर रहा है, लेकिन अभी इसे आम जनता तक पहुंचने में वक्त लगेगा.
वैक्सीन: हम कितने करीब हैं?
2024-25 में ऑक्सफ़ॉर्ड यूनिवर्सिटी की निपाह वैक्सीन के ट्रायल ने दुनिया को एक उम्मीद दी थी. क्या 2026 में यह वैक्सीन तैयार है?
डॉ. नमिता जग्गी हकीकत बयां करती हैं: “हम अभी मंज़िल से दूर हैं. 2024–25 में जो ट्रायल हुए, वे अभी शुरुआती या मिड-स्टेज (Phase-2) तक ही पहुंचे हैं. इन ट्रायल्स से यह साबित हुआ है कि वैक्सीन सुरक्षित है और इम्यूनिटी बनाती है, लेकिन क्या यह वास्तव में निपाह को रोक पाएगी, इसका पक्का सबूत (Phase-3 data) अभी आना बाकी है.”
चुनौती: निपाह के मामले कम और छिटपुट होते हैं, इसलिए बड़े पैमाने पर हज़ारों लोगों पर इसका ट्रायल करना वैज्ञानिकों के लिए मुश्किल है. डॉ. जग्गी कहती हैं: “फ़िलहाल स्वास्थ्य कर्मियों के लिए भी यह वैक्सीन रूटीन इस्तेमाल के लिए उपलब्ध नहीं है. शायद भविष्य में किसी बड़े आउटब्रेक के दौरान इसे ‘आपातकालीन मंज़ूरी’ मिले.”
‘वन हेल्थ’ की विफलता?
वैज्ञानिक बार-बार ‘वन हेल्थ’ (One Health) अप्रोच की बात करते हैं यानी इंसानों की सेहत को जानवरों और पर्यावरण के साथ जोड़कर देखना. लेकिन 2024 का मलप्पुरम केस और अब बंगाल के मामले बताते हैं कि हम चूक रहे हैं.
डॉ. नमिता जग्गी मानती हैं कि जमीनी स्तर पर कमियां हैं: “2024 का मलप्पुरम केस दिखाता है कि चमगादड़ों में वायरस की मौजूदगी पहले पकड़ में नहीं आई. हम अक्सर तब जागते हैं जब कोई इंसान संक्रमित होकर अस्पताल पहुंचता है. ‘वन हेल्थ’ का असली मकसद है कि हम जानवरों में ही वायरस को पकड़ लें और लोगों को चेतावनी दे दें. अभी हम ‘प्रतिक्रिया’ दे रहे हैं, जबकि हमें ‘निवारक’ (Proactive) होना होगा.”
ठीक होने के बाद का डर: लेट-ऑनसेट एन्सेफ़लाइटिस
निपाह वायरस की एक और डरावनी सच्चाई यह है कि यह ठीक होने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ता. इसे लेट-ऑनसेट एन्सेफलाइटिस कहते हैं.
डॉ. मनीषा अरोड़ा समझाती हैं, “यह देखा गया है कि वायरस मरीज के ठीक होने के महीनों या सालों बाद भी दिमाग में दोबारा सक्रिय हो सकता है. इसलिए जो लोग 2023–2024 के प्रकोप से बच निकले हैं, उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि वे पूरी तरह सुरक्षित हैं. उन्हें नियमित न्यूरोलॉजिकल फ़ॉलो-अप की जरूरत है. अगर ठीक होने के बाद भी भूलने की बीमारी, सिरदर्द या व्यवहार में बदलाव दिखे, तो इसे हल्के में न लें.”
डर बनाम सावधानी: जनता के लिए सलाह
अक्सर निपाह की खबर आते ही लोग फल खाना छोड़ देते हैं या पैनिक में आ जाते हैं. क्या यह ज़रूरी है?
डॉ. मनीषा अरोड़ा की सलाह:
- पैनिक न करें: निपाह हवा में फैलने वाला वायरस नहीं है जैसे कोविड. यह बहुत करीबी संपर्क से फैलता है.
- फल खाने का नियम: बाज़ार से फल खरीदना बंद न करें, लेकिन सावधानी बरतें. आधे कटे फल, पक्षियों द्वारा कुतरे गए फल या जमीन पर गिरे फल बिलकुल न खाएं. फलों को अच्छे से धोकर और छीलकर खाएं.
- खजूर का रस: कच्चा खजूर का रस पीने से बचें. अगर पीना ही है, तो उसे उबालकर पिएं.
लक्षण पहचानें: हर बुखार निपाह नहीं होता. लेकिन अगर बुखार के साथ दिमागी उलझन हो, तो तुरंत डॉक्टर के पास जाएं.
2026 की चुनौती
2026 में हम 2018 के मुकाबले कहीं ज्यादा तैयार हैं. हमारे पास बेहतर लैब हैं, आइसोलेशन प्रोटोकॉल हैं और डॉक्टरों का अनुभव है. लेकिन वैक्सीन और कारगर दवा की कमी अब भी हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी है. जब तक विज्ञान हमें यह सुरक्षा कवच नहीं देता, तब तक जागरूकता और सावधानी ही इस जानलेवा वायरस के ख़िलाफ़ हमारा सबसे बड़ा हथियार है.