• Zindagi With Richa
  • 22 April, 2026
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Ashlesha Thakur

क्या आपको भी अक्सर सिर के एक हिस्से में हथौड़े के बजने जैसा दर्द होता है? क्या उस दर्द के समय तेज़ रोशनी या आवाज़ बर्दाश्त नहीं होती? अगर हां, तो यह महज़ कोई आम सिरदर्द या थकान नहीं, बल्कि माइग्रेन (Migraine) हो सकता है.

अक्सर हम सिरदर्द को हल्के में लेते हैं और तुरंत कोई भी पेनकिलर खाकर काम पर लग जाते हैं. लेकिन क्या यह सही है? माइग्रेन आख़िर होता क्यों है और इससे बचने का सही तरीका क्या है? इन सभी सवालों के जवाब जानने के लिए हमने दो जाने-माने विशेषज्ञों—डॉ. प्रवीण गुप्ता (न्यूरोलॉजिस्ट और चेयरमैन, मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्‍स, गुरूग्राम) और डॉ. सीमा धीर ((यूनिट हेड, इंटरनल मेडिसिन, आर्टेमिस हॉस्पिटल्स, गुरुग्राम) से विस्तार से बात की. आइए समझते हैं इस बीमारी का पूरा विज्ञान और बचाव.

आम सिरदर्द और माइग्रेन में क्या फ़र्क है?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि हम पहचानें कैसे कि हमें माइग्रेन है. आख़िर क्या हैं माइग्रेन के लक्षण?

डॉ. सीमा धीर इसे बहुत आसान शब्दों में समझाती हैं: “आम सिरदर्द अक्सर हल्का या मध्यम होता है. पूरे सिर में दबाव जैसा महसूस होता है और थोड़ा आराम करने या कुछ खाने से यह ठीक हो जाता है. लेकिन माइग्रेन एक न्यूरोलॉजिकल समस्या है. इसमें सिर के एक तरफ़ धड़कता हुआ (Throbbing) तेज़ दर्द होता है. इसके साथ ही उल्टी आना, मितली महसूस होना, तेज़ रोशनी और आवाज़ से परेशानी होना इसके मुख्य लक्षण हैं.” डॉ. सीमा बताती हैं कि माइग्रेन के दर्द की एक साइकिल होती है, जो 4 से 72 घंटे तक चल सकती है. दर्द में अगर सामान्य दवा से आराम न मिले, तो इसे माइग्रेन समझकर डॉक्टर से मिलना चाहिए.

दिमाग के अंदर क्या होता है?

माइग्रेन अटैक के दौरान दिमाग के अंदर क्या हलचल होती है, इसे डॉ. प्रवीण गुप्ता समझा रहे.

“मेडिकल साइंस के अनुसार, माइग्रेन एक ‘न्यूरोवैस्कुलर डिसऑर्डर’ है. इसमें दिमाग के अंदर एक इलेक्ट्रिकल वेव फैलती है. इससे नसें सक्रिय हो जाती हैं और CGRP जैसे केमिकल रिलीज़ करती हैं, जो दर्द और सूजन को बहुत बढ़ा देते हैं.”

डॉ. प्रवीण ने ‘माइग्रेन ऑरा’ (Migraine Aura) के बारे में भी बताया. यह दर्द शुरू होने से पहले का एक वॉर्निंग साइन (Warning sign) है, जो 20 से 60 मिनट तक रहता है. इसमें मरीज़ को आंखों के सामने चमकती लाइट, ज़िग-ज़ैग लाइनें, धुंधलापन या चेहरे पर सुन्नपन महसूस हो सकता है.

महिलाओं में माइग्रेन ज़्यादा क्यों होता है?

आंकड़े बताते हैं कि पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं में माइग्रेन की शिकायत ज़्यादा होती है.

डॉ. प्रवीण इसके पीछे हार्मोनल बदलाव को मुख्य कारण मानते हैं. “महिलाओं में एस्ट्रोजन (Estrogen) हार्मोन का उतार-चढ़ाव माइग्रेन को ट्रिगर करता है, जो विशेषकर पीरियड्स, प्रेग्नेंसी या मेनोपॉज़ के दौरान देखा जाता है. इसके अलावा स्ट्रेस, नींद की कमी और ख़राब लाइफ़स्टाइल भी इसे बढ़ाते हैं.”

अचानक दर्द उठने पर क्या करें?

अगर ऑफिस या घर में अचानक माइग्रेन का तेज़ दर्द शुरू हो जाए तो क्या करें?

डॉ. सीमा धीर के अनुसार, तुरंत ये कदम उठाएं:

  • शांत और ठंडी जगह: सबसे पहले किसी शांत, अंधेरी और ठंडी जगह पर आराम करें.
  • स्क्रीन से दूरी: तेज़ रोशनी, मोबाइल या लैपटॉप तुरंत बंद कर दें.
  • कोल्ड कंप्रेस: माथे या गर्दन के पीछे ठंडी पट्टी रखने से नसें शांत होती हैं.
  • हाइड्रेशन: नार्मल पानी या नींबू पानी पिएं. अगर डॉक्टर ने पहले से कोई दवा दी है, तो उसे समय पर लें और आंखें बंद करके आराम करें.

खुद से बार-बार पेनकिलर खाना हो सकता है ख़तरनाक

थोड़ा-सा दर्द हुआ नहीं कि हमने पेनकिलर खा ली, यह आदत बहुत भारी पड़ सकती है.

डॉ. सीमा कहती हैं: “बार-बार खुद से पेनकिलर लेने से ‘मेडिकेशन ओवरयूज़ हेडेक’ (MOH) हो सकता है, यानी दवा की वजह से ही सिरदर्द और ज़्यादा बढ़ जाता है. लंबे समय में यह आपकी किडनी, लिवर और पेट को भी गंभीर नुक़सान पहुंचाता है.”

माइग्रेन के मरीजों, ‘क्या करें और क्या न करें’

इस दर्द से बचने के लिए ट्रिगर्स को पहचानना सबसे ज़रूरी है.

क्या करें:

  • रोज़ एक ही समय पर सोने और उठने का रूटीन बनाएं (7-8 घंटे की नींद).
  • संतुलित आहार लें और पानी ज़्यादा पिएं.
  • योग, मेडिटेशन और स्ट्रेस मैनेजमेंट को लाइफ़स्टाइल का हिस्सा बनाएं.

क्या न करें:

  • लंबे समय तक भूखे बिलकुल न रहें.
  • जंक फ़ूड, ज़्यादा कैफीन (चाय/कॉफी) और प्रोसेस्ड फ़ूड से बचें.
  • देर रात तक जागने और ज़्यादा स्क्रीन टाइम से दूरी बनाएं. तेज़ परफ्यूम की गंध या शोरगुल से भी बचें.

क्रॉनिक माइग्रेन और आधुनिक इलाज

अगर किसी को महीने में 10-15 बार माइग्रेन का अटैक आता है, तो इसे ‘क्रॉनिक माइग्रेन’ कहा जाता है.

डॉ. प्रवीण गुप्ता बताते हैं कि आज मेडिकल साइंस में इसके बेहतरीन इलाज मौजूद हैं. “प्रिवेंटिव ट्रीटमेंट के तहत अब CGRP इनहिबिटर्स (मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़), बोटॉक्स इंजेक्शन, RTMS और न्यूरोमॉड्यूलेशन जैसी आधुनिक तकनीकें मौजूद हैं. इनके साथ-साथ बीटा-ब्लॉकर्स जैसी दवाइयां भी दी जाती हैं.”

माइग्रेन कोई ऐसी बीमारी नहीं है, जिसके साथ आपको ज़िंदगी भर समझौता करके जीना पड़े. सही लाइफ़स्टाइल, ट्रिगर्स की पहचान और आधुनिक चिकित्सा के ज़रिए इसे पूरी तरह कंट्रोल किया जा सकता है. दर्द को सहें नहीं, बल्कि सही समय पर डॉक्टर से मिलें.

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