इंदौर का अनोखा गांव, जहां न कोई नौकरी करता और न बच्चे स्कूल जाते हैं
Zindagi With Richa
लेखक: प्रभांशु शुक्ला
इस आर्टिकल का शीर्षक पढ़कर शायद आप भी सोच में पड़ गए होंगे कि क्या सच में ऐसी कोई जगह हो सकती है जहां बच्चे स्कूल नहीं जाते और कोई किसी की नौकरी नहीं करता?
सुनने में यह थोड़ा अजीब लगता है, लेकिन इंदौर के पास एक ऐसी कम्यूनिटी वास्तव में मौजूद है.
मध्य प्रदेश के इंदौर से लगभग 24 किलोमीटर दूर ‘पीवडाई’ गांव में करीब 16 एकड़ ज़मीन पर “मानव चेतना विकास केंद्र” नाम की एक कम्यूनिटी कई वर्षों से रह रही है. यहां लगभग 50 परिवारों के 130 लोग एक साथ रहते हैं और एक बिलकुल अलग तरह की जीवनशैली जीने की कोशिश कर रहे हैं.
इस कम्यूनिटी की एक खास बात यह भी है कि यहां चार पीढ़ियां एक साथ रहती हैं. लगभग 6 साल के बच्चे से लेकर 80 साल के बुज़ुर्ग तक. साथ ही, यहां अलग-अलग धर्म और जातियों के लोग भी एक छत के नीचे साथ रहते हैं, जो इस कम्यूनिटी को और भी अनोखा बनाता है.
शोषण रहित जीवन का विचार
इस कम्यूनिटी की शुरुआत साल 2008 में अजय दायमा जी ने की थी. उनका मुख्य उद्देश्य एक ऐसा जीवन जीना था जो पूरी तरह से शोषण रहित हो.
अजय दायमा का मानना था कि आधुनिक जीवन में इंसान अक्सर किसी न किसी रूप में दूसरे इंसानों या प्रकृति का शोषण करता है. यही वजह थी कि उन्होंने एक ऐसी जगह बनाने की कोशिश की जहां लोग प्रकृति के साथ संतुलन में रह सकें. इस कम्यूनिटी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहां कोई हायरार्की या पद-भेद नहीं है.
कोई किसी का बॉस नहीं है, कोई किसी की नौकरी नहीं करता और हर व्यक्ति को अपनी क्षमता और इच्छा के अनुसार जीवन जीने की पूरी आज़ादी है.
उपभोक्तावाद से दूर, आत्मनिर्भर बनने की कोशिश
इस आर्टिकल को लिखने से पहले मेरी बातचीत वहां रहने वाले राहुल जी से हुई. उन्होंने बताया कि हमारा समाज बहुत तेज़ी से उपभोक्तावाद की तरफ़ बढ़ रहा है.
राहुल जी कहते हैं, “दुनिया का हर प्राणी, चाहे चूहा हो या गाय, अपने खाने के लिए खुद प्रयास करता है. इंसानों की तरह उन्होंने कोई जटिल इकोसिस्टम नहीं बनाया है.”
इसी सोच के कारण मानव चेतना विकास केंद्र में रहने वाले लोग ज़्यादा से ज़्यादा आत्मनिर्भर बनने की कोशिश करते हैं. यहां रहने वाले लोग:
- खुद अपना अनाज उगाते हैं.
- गाय पालते हैं और डेयरी चलाते हैं.
- सब मिलकर खाना बनाते हैं.
- अपने कपड़े भी खुद सिलते हैं.
राहुल जी बताते हैं कि जब कोई व्यक्ति खुद खेती करता है या गाय की देखभाल करता है, तब उसे समझ आता है कि खाना पैदा होने में कितनी मेहनत और समय लगता है. इससे हर चीज़ की रियल वैल्यू समझ में आती है.
फिर भी बाहरी दुनिया से रिश्ता बना हुआ है
हालांकि, आज के दौर में पूरी तरह आत्मनिर्भर होना संभव नहीं है. राहुल जी बड़ी बेबाकी से कहते हैं, “हम मोबाइल, कार, पेट्रोल या मोबाइल रिचार्ज जैसी चीज़ें खुद नहीं बना सकते. इसलिए हमारी निर्भरता बाहरी समाज पर किसी न किसी रूप में बनी रहती है और शायद हमेशा कुछ न कुछ बनी रहेगी.”
इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए कम्यूनिटी के कुछ लोग अभी भी फ़्रीलांस काम करते हैं. इसके अलावा, यहां उगाई या बनाई गई प्राकृतिक चीज़ों को लोग ठेले के माध्यम से इंदौर के अलग-अलग इलाकों में बेचते हैं. इससे जो पैसा मिलता है, वह एक ‘कॉमन फंड’ में जाता है. उसी फंड से वे ऐसी चीज़ें खरीदते हैं जो फिलहाल कम्यूनिटी के भीतर बनाना संभव नहीं है.
11 राज्यों के लोग, लेकिन विचारधारा एक
इस कम्यूनिटी की एक और दिलचस्प बात यह है कि यहां 11 अलग-अलग राज्यों के लोग रहते हैं. यहां आपको हर बैकग्राउंड के लोग मिलेंगे:
- कोई PhD स्कॉलर है.
- कोई डॉक्टर या इंजीनियर है.
- कोई पहले कमर्शियल पायलट रह चुका है.
- कोई चार्टर्ड अकाउंटेंट है.
कुछ लोग आर्थिक रूप से बेहद संपन्न रहे हैं, जबकि कुछ ऐसे भी हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति पहले अच्छी नहीं थी. लेकिन इन सबको सिर्फ़ एक ही विचारधारा जोड़ती है, एक शांत और सहयोगी समाज बनाने की चाहत.
राहुल जी के शब्दों में, “हम एक कॉन्फ़्लिक्ट-फ़्री और फ़्रिक्शन-फ़्री समाज बनाना चाहते हैं. इंसान मूल रूप से प्रेम और सद्भाव से रहने के लिए ही बना है.”
यहां बच्चे फ़ॉर्मल स्कूल नहीं जाते
मानव चेतना विकास केंद्र की सबसे अलग और चौंकाने वाली बात ये है कि यहां कोई भी बच्चा फ़ॉर्मल स्कूलिंग के लिए बाहर नहीं जाता.
सभी बच्चे होम-स्कूलिंग के माध्यम से यहीं सीखते हैं. यहां बच्चों को किताबों के रट्टे के बजाय लगभग 50 तरह की लाइफ स्किल्स सिखाई जाती हैं, जैसे:
- हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान
- खेती, सिंचाई, बीज और खाद की समझ
- बेकरी, फ़ूड प्रोसेसिंग और मिठाइयां बनाना
- गायों की देखभाल और पनीर-घी बनाना
- कंस्ट्रक्शन वर्क (फ़्लोरिंग, ईंटें लगाना और प्लंबिंग)
- कपड़े तैयार करना और ग्राहकों से कम्युनिकेशन करना
इसके अलावा, बच्चों को म्यूज़िक, आर्ट, डांस, ड्रामा और कविता जैसी क्रिएटिव एक्टिविटीज़ का भी पूरा एक्सपोज़र दिया जाता है. हाल ही में इस कम्यूनिटी के कुछ बच्चे बनारस भी गए थे, ताकि वे यात्रा कर सकें और समाज के दूसरे पहलुओं को करीब से समझ सकें.
बिना डिग्री के भविष्य?
जब मैंने राहुल जी से पूछा कि क्या बिना किसी फ़ॉर्मल डिग्री के इन बच्चों को भविष्य में मुश्किल नहीं होगी?
उन्होंने बड़े आत्मविश्वास से कहा, “हम बच्चों को इतनी लाइफ़ स्किल्स सिखाते हैं कि उन्हें जीवन में सर्वाइव करने में कभी दिक्कत न आए.“ उनका मानना है कि AI के इस दौर में शिक्षा अब ग्लोबल हो चुकी है और आने वाले समय में पारंपरिक स्कूलों और डिग्रियों की भूमिका वैसे भी बदलने वाली है.
यहां रहने की कोई बाध्यता नहीं
इस कम्यूनिटी में रहना किसी के लिए भी अनिवार्य नहीं है. राहुल जी मुस्कुराते हुए कहते हैं, “यह कोई 1 साल या 5 साल का कोर्स नहीं है. किसी को जीवन से जो चाहिए, वह उसे 1 साल में मिल जाता है, तो किसी को 10 साल में मिलता है.”
यहां कोई भी व्यक्ति 1 घंटे से लेकर पूरी ज़िंदगी तक रह सकता है. अगर कोई व्यक्ति कुछ दिन यहां आकर बस रहने भर का अनुभव लेना चाहता है, तो वह भी संभव है. बस एक ही शर्त है, अगर आप इंसान की तरह, प्रेम और सद्भाव के साथ जीना चाहते हैं, तो आपका स्वागत है.
एक बार ज़रूर अनुभव करें
भागदौड़, स्ट्रेस और कॉर्पोरेट रैट-रेस से भरी इस दुनिया में, ‘मानव चेतना विकास केंद्र’ एक ठंडी हवा के झोंके जैसा है. अगर आप इंदौर या उसके आसपास रहते हैं, या कभी आपको इंदौर जाने का मौका मिले, तो पीवडाई गांव की इस अनोखी जगह को एक बार ज़रूर देखिएगा. हो सकता है, यहां बिताए चंद घंटे आपको जीवन जीने का एक नया नज़रिया दे जाएं.