हरीश राणा केस, जानिए भारत में किन परिस्थितियों में मिलती है इच्छामृत्यु?
Zindagi With Richa
लेखिका- प्रकृति त्रिपाठी
जीवन को सुकून और सम्मान के साथ जीने की इच्छा हर व्यक्ति की होती है. लोग अक्सर कहते हैं कि जब तक हाथ-पैर चलते रहें, तब तक जीवन अच्छा है. लेकिन ज़िंदगी अनिश्चित है. कभी-कभी एक ऐसा पल आता है जब इंसान पूरी तरह बेबस हो जाता है. वह न बोल सकता है, न चल सकता है और न ही अपने दम पर सांस ले सकता है. जीवन केवल मशीनों के सहारे चल रहा होता है.
कुछ ऐसी ही दर्दनाक परिस्थितियों में पिछले 13 वर्षों से जीवन बिता रहे हैं 32 वर्षीय हरीश राणा. हाल ही में अदालत ने उनके मामले में ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी है. यह भारत में बेहद दुर्लभ मामलों में ही दी जाती है. आइए जानते हैं कौन हैं हरीश राणा और यह मामला भारत के लिए इतना ख़ास क्यों है.
कौन हैं हरीश राणा?
हरीश राणा उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद स्थित राजनगर एक्सटेंशन की राज एम्पायर सोसायटी के निवासी हैं. जब उनके साथ यह दुखद हादसा हुआ, तब वे केवल 20 वर्ष के थे और पंजाब यूनिवर्सिटी से बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे.
उस समय वे अपने भविष्य और करियर के शानदार सपनों के साथ एक सामान्य छात्र की तरह पढ़ाई कर रहे थे.
20 अगस्त 2013: वो शाम जिसने सब कुछ बदल दिया
20 अगस्त 2013 की शाम क़रीब 6 बजे हरीश राणा जिस पेइंग गेस्ट बिल्डिंग में रह रहे थे, अचानक उसी की चौथी मंज़िल से नीचे गिर गए. इस भयानक दुर्घटना में उन्हें गंभीर चोटें आईं और वे कोमा में चले गए.
उस मनहूस दिन के बाद से हरीश राणा कभी होश में नहीं आ सके. पिछले 13 वर्षों से उनका जीवन पूरी तरह मेडिकल सपोर्ट यानी मशीनों पर निर्भर है.
अदालत की अनुमति मिलने के बाद अब उनकी निष्क्रिय इच्छामृत्यु की प्रक्रिया पूरी करने के लिए उन्हें अस्पताल में शिफ़्ट किया जाएगा. इसके लिए ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) ने एक विशेष मेडिकल कमेटी का गठन किया है.
इच्छामृत्यु (Euthanasia) क्या होती है?
इच्छामृत्यु का अर्थ है, ऐसी स्थिति में किसी व्यक्ति के जीवन को समाप्त करने की अनुमति देना जब वह असाध्य बीमारी (Incurable disease) या स्थायी कोमा जैसी स्थिति में हो और उसके ठीक होने की कोई संभावना न हो.
मुख्य रूप से यह दो प्रकार की होती है:
- सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia): इसमें किसी व्यक्ति को दवा या इंजेक्शन देकर जानबूझकर मृत्यु दी जाती है. भारत में यह पूरी तरह अवैध है.
- निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia): इसमें मरीज़ को जीवित रखने वाली मशीनें (लाइफ़ सपोर्ट) या कृत्रिम चिकित्सा सहायता हटा दी जाती है और उसकी प्राकृतिक रूप से मृत्यु होने दी जाती है. भारत में कुछ विशेष परिस्थितियों में इसकी अनुमति दी जाती है.
भारत में इच्छामृत्यु के नियम और इतिहास
भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता सुप्रीम कोर्ट ने दी है.
इसकी शुरुआत अरुणा शानबाग केस (Aruna Shanbaug Case) के ऐतिहासिक फ़ैसले से हुई थी. अरुणा मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में नर्स थीं. 1973 में उन पर एक क्रूर हमला हुआ, जिसके बाद वे 42 वर्षों तक कोमा जैसी स्थिति में रहीं. इसी मामले ने भारत में इच्छामृत्यु को लेकर कानूनी और नैतिक बहस को जन्म दिया था. इसी निर्णय में पहली बार अदालत ने कुछ परिस्थितियों में जीवन रक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति दी थी.
इसके बाद वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘लिविंग विल’ (Living Will) को भी मान्यता दी. इसका मतलब है कि कोई भी व्यक्ति पहले से लिखकर यह बता सकता है कि गंभीर हालत में उसे कृत्रिम जीवन सहारा (Life Support) न दिया जाए.
किन परिस्थितियों में मिल सकती है इजाज़त?
भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु हर किसी को नहीं दी जाती. यह केवल कुछ विशेष और सख़्त परिस्थितियों में ही संभव है:
- जब मरीज़ लंबे समय से कोमा या वेजिटेटिव स्टेट में हो और उसके ठीक होने की कोई संभावना (Zero recovery chance) न हो.
- जब बीमारी लाइलाज हो और मरीज़ को लगातार असहनीय पीड़ा हो रही हो.
- जब मरीज़ की ‘लिविंग विल’ मौजूद हो या परिवार इसकी अनुमति के लिए अदालत में याचिका दे.
- जब एक स्वतंत्र ‘मेडिकल बोर्ड’ मरीज़ की स्थिति का मूल्यांकन करे और अदालत से अंतिम मंज़ूरी मिले.
हरीश राणा के इच्छामृत्यु का मामला भारत में इच्छामृत्यु से जुड़े सख़्त कानून और मानवीय संवेदनाओं, दोनों को हमारे सामने लाता है. एक ओर जीवन बचाने की ज़िद है, तो दूसरी ओर सम्मानजनक मृत्यु (Right to die with dignity) का अधिकार. यही कारण है कि ऐसे फ़ैसले देश में बेहद सावधानी और कड़ी कानूनी प्रक्रिया के बाद ही लिए जाते हैं.