दिखावे की दुनिया: सोशल मीडिया पर फ़ेक हैपनिंग लाइफ़ का कड़वा सच
Zindagi With Richa
लेखक-प्रभांशु शुक्ला
आज के दौर में सोशल मीडिया सिर्फ़ कम्युनिकेशन का माध्यम नहीं रहा है, बल्कि ये एक ऐसी जगह बन चुका है जहाँ लोग अपनी ज़िंदगी को दिखाते नहीं, बल्कि उसे ‘डिजाइन’ करने लगे हैं. इंस्टाग्राम, फ़ेसबुक और बाकी सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म पर दिखने वाली चमकदार ज़िंदगी अक्सर उतनी असली नहीं होती, जितनी हमें दिखाई जाती है. हाल ही में एक नया ट्रेंड सामने आया है, जहाँ लोग ऐसे इवेंट्स की फ़ोटो और वीडियो खरीदकर पोस्ट करते हैं, जहाँ वो कभी गए ही नहीं. इसका मकसद साफ़ है, अपनी लाइफ़ को “हैपनिंग” दिखाना.
फ़ेक हैपनिंग लाइफ़ का दिखावा करना न सिर्फ़ एक ट्रेंड है, बल्कि एक गहरी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक समस्या का संकेत भी है.
क्या है परचेज़्ड प्रेज़ेंस?
इस ट्रेंड को डिजिटल वर्ल्ड में “परचेज़्ड प्रेज़ेंस” या “फ़ेक अटेंडेंस” कहा जा सकता है. इसमें लोग पैसे देकर किसी इवेंट की फ़ोटो, रील या टैग्स खरीदते हैं और अपने इंस्टाग्राम प्रोफ़ाइल पर पोस्ट करते हैं. ये एक तरह का डिजिटल इल्यूजन है, जहाँ लोग अपनी सोशल आइडेंटिटी को आर्टिफिशियल तरीके से बनाते हैं, ताकि वो अपने दोस्तों के सामने और बाकी लोग जो उन्हें सोशल मीडिया पर फ़ॉलो करते हैं, उनके सामने खुश और दूसरों से बेहतर जीवन जीने का दिखावा बना सकें यानी फ़ेक हैपनिंग लाइफ़.
यहाँ हक़ीक़त से ज्यादा महत्व परसेप्शन को दिया जाता है. इसका मतलब ये है कि अब सोशल मीडिया पर “मैं कहाँ गया” से ज़्यादा “मैं कहाँ दिख रहा हूं” मायने रखता है.
लाइक्स ही अब नई करेंसी हैं
आज का सोशल मीडिया एक वेलिडेशन इकॉनमी (validation economy) बन चुका है. यहाँ लाइक्स, कॉमेंट्स और शेयर्स एक तरह के डिजिटल करेंसी बन गए हैं. लोग अपनी कीमत को इन नंबरों से जोड़ने लगे हैं.
ज़्यादा लाइक्स = ज़्यादा पॉपुलर
ज़्यादा व्यूज़ = ज़्यादा इंपोर्टेंस
इसी वेलिडेशन को पाने के लिए लोग अब फ़ेक कंटेंट तक क्रिएट करने लगे हैं. इवेंट में जाने की जगह उसकी फ़ोटो खरीदना, आसान और सस्ता पड़ता है, लेकिन उससे मिलने वाला सोशल वैलिडेशन वैसा ही रहता है.
FOMO और ‘तुलना’ का ज़हर
इस ट्रेंड के पीछे सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक फ़ैक्टर है FOMO (Fear of Missing Out). जब लोग अपने आसपास के लोगों को पार्टी करते हुए देखते हैं, कंसर्ट और इवेंट में जाते हुए देखते हैं, तो उन्हें लगता है कि वो कुछ मिस कर रहे हैं. ऐसे में कई लोग इस फ़ीलिंग को अवॉइड करने के लिए फ़ेक तरीके अपनाने लगते हैं. इसके साथ ही तुलना करने की होड़ भी बढ़ गई है. लोग अपनी ज़िंदगी की तुलना दूसरों के सोशल मीडिया वाली ज़िंदगी से करते हैं. पर सच ये है कि लोग सोशल मीडिया पर अपनी पूरी ज़िंदगी नहीं, सिर्फ़ बेस्ट मोमेंट्स को दिखाते हैं, और कई बार वो मोमेंट्स भी असली नहीं होते.
एल्गोरिदम (Algorithm) का दबाव
सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म का एल्गोरिदम भी इस ट्रेंड को बढ़ावा देता है. एल्गोरिदम हमेशा वही कंटेंट दिखाते हैं जो:
- ज़्यादा एंगेजिंग हो
- विजुअली अट्रैक्टिव हो
- लोगों को रोक कर रख सके
आसान ज़िंदगी या सादे मोमेंट्स एल्गोरिदम के लिए ज़्यादा मायने नहीं रखते. इसलिए सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाले भी वही कंटेंट बनाते हैं जो वायरल हो सके, चाहे वो असली हो या नकली. यहाँ पूरा सिस्टम ही एक अटेंशन इकॉनमी पर चलता है, जहाँ हर कोई अटेंशन पाने के लिए मुकाबला कर रहा है.
समाज और मेंटल हेल्थ पर इसका असर
इस ट्रेंड का असर सिर्फ़ किसी एक इंसान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे समाज पर पड़ता है. लोगों को लगता है कि हर किसी की जिंदगी परफ़ेक्ट है, सिवाय उनके. मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्याएं बढ़ने लगती हैं, क्योंकि तुलना और वैलिडेशन का खेल एंजाइटी और डिप्रेशन की ओर ले जाता है. असली रिश्तों की जगह इंसान ऊपरी तरह से रिश्तों को जीने लगता है, हर चीज़ दिखावटी होने लगती है.
साल 2010 में ही मिल गई थी चेतावनी
ये ट्रेंड अचानक नहीं आया. सोशल मीडिया के शुरुआती दिनों में ही इसके नेगेटिव इफ़ेक्ट्स को लेकर वार्निंग दी जा चुकी थीं. Pew Research (2010) के अनुसार: 900 से ज़्यादा एक्सपर्ट्स ने ये कहा था कि सोशल मीडिया लोगों को कनेक्ट तो करेगा, लेकिन असल ज़िंदगी के रिश्तों को कमज़ोर कर सकता है. इसके अलावा, भटकाव और समय की बर्बादी को भी बढ़ा सकता है.
2013 की एक रिव्यू में पाया गया कि ज़्यादा फ़ेसबुक इस्तेमाल करने से लोगों को लाइफ़ को लेकर सेटिस्फेक्शन कम महसूस होती है और इसका उनकी सोच पर नेगेटिव इफ़ेक्ट भी पड़ता है. ये दिखाता है कि सोशल मीडिया सिर्फ़ कनेक्ट नहीं करता, बल्कि हमारे व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य को भी बदलता है.
असल ज़िंदगी की क़ीमत पहचानें
सोशल मीडिया एक पावरफ़ुल टूल है, लेकिन इसका इस्तेमाल कैसे किया जाता है, ये सबसे ज़्यादा मायने रखता है. “Buy, Post, Impress” का ये कल्चर हमें एक ऐसी दुनिया की तरफ़ ले जा रहा है, जहाँ दिखावा हक़ीक़त से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गया है. लेकिन अंत में सवाल यही है, क्या हम सच में वो ज़िंदगी जीना चाहते हैं, जो हम दिखा रहे हैं या हम सिर्फ़ दूसरों को इंप्रेस करने के लिए एक इल्यूजन क्रिएट कर रहे हैं? शायद समय आ गया है कि हम सोशल मीडिया को सिर्फ़ फ़ेक हैपनिंग लाइफ़ दिखाने का माध्यम नहीं, बल्कि समझदारी से इस्तेमाल करने का टूल बनाएं. क्योंकि असली हैपनिंग लाइफ़ वो नहीं है जो दिखती है, बल्कि वो है जो जी जाती है.