अक्षय तृतीया: सोना ख़रीदने से लेकर परशुराम की अनसुनी कहानी तक
Sunita Thatte
चैत्र मास के बाद वैशाख का महीना शुरू होता है. वैशाख की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) कहा जाता है. जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, ‘अक्षय’ यानी जिसका कभी क्षय (नाश) न हो. हिंदू पंचांग के अनुसार, पूरे साल के साढ़े तीन सबसे शुभ मुहूर्तों में अक्षय तृतीया का विशेष स्थान है.
अक्सर लोग इस दिन को सिर्फ़ सोना ख़रीदने या नए बिज़नेस की शुरुआत करने से जोड़कर देखते हैं. लेकिन इस तिथि के साथ हमारे पुराणों और इतिहास के कई ऐसे रोचक प्रसंग जुड़े हैं, जो बताते हैं कि आख़िर यह दिन इतना पवित्र क्यों माना गया है. आइए जानते हैं अक्षय तृतीया के पीछे छिपे अनसुने रहस्य.
अक्षय तृतीया से जुड़े 8 बड़े पौराणिक संयोग
इस एक दिन में कई युगों और अवतारों की घटनाएं घटित हुई थीं:
- त्रेता युग का आरंभ: इसी पावन दिन से हिंदू धर्म के चार युगों में से एक ‘त्रेता युग’ की शुरुआत मानी जाती है.
- कुबेर बने धन के रक्षक: समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी का आगमन हुआ और उन्होंने अपने धन का कोषाध्यक्ष भगवान कुबेर को बनाया, जिससे इसे अक्षय समृद्धि का दिन माना जाता है.
- पांडवों को मिला अक्षय पात्र: वनवास के कठिन समय में सूर्य देवता ने पांडवों को ‘अक्षय पात्र’ दिया था, जिससे उनके भोजन का कभी क्षय न हो और उनका भरण-पोषण हो सके.
- माता अन्नपूर्णा का जन्म: इसी दिन माता अन्नपूर्णा का जन्म हुआ था, जिन्होंने भगवान शिव को भिक्षा देकर अपनी कृपा से संपूर्ण विश्व के भरण-पोषण का ज़िम्मा लिया था.
- गंगा का पृथ्वी पर अवतरण: भगीरथ के अथक प्रयास से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने इसी दिन गंगा को पृथ्वी पर अवतरण का वरदान दिया था. (हालांकि शिव जी द्वारा जटाओं में नियंत्रित करने के बाद उनका अवतरण ‘गंगा दशहरा’ के दिन हुआ).
- महाभारत की रचना: महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना और श्री गणेश जी ने उसे लिपिबद्ध करना इसी दिन से प्रारंभ किया था.
- द्रौपदी और सुदामा की लाज: कौरवों द्वारा अपमानित किए जाने पर श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को अक्षय वस्त्र प्रदान कर उनकी लाज बचाई थी. साथ ही, श्रीकृष्ण ने अपने मित्र सुदामा को इसी दिन अक्षय समृद्धि का वरदान दिया था.
- भगवान परशुराम का जन्म: भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम’ का जन्म भी अक्षय तृतीया के दिन ही हुआ था.
इतने सारे शुभ संयोगों के कारण इस दिन किया हुआ पुण्य कभी ख़त्म नहीं होता. इसलिए लोग अक्षय समृद्धि के लिए इस दिन स्वर्ण (Gold) ख़रीदते हैं या नए कार्यों का प्रारंभ करते हैं.
पितरों का दान और परशुराम की कथा
सनातन धर्म की यह ख़ास विशेषता है कि किसी भी मौसम या फसल की विशेष वस्तु का, बिना दान किए स्वयं उपयोग नहीं करते. अतः अक्षय तृतीया पर भीषण गर्मी को देखते हुए लोग सत्तू, मिठाई, खरबूज़, पंखा और पानी से भरा मटका इत्यादि दान करते हैं.
इस दान को पितरों (पूर्वजों) के लिए माना जाता है. पितरों के लिए दान की यह परंपरा सीधे भगवान परशुराम से जुड़ी है.
भगवान परशुराम महर्षि जमदग्नि और रेणुका के पुत्र थे. उनके पिता के पास कामधेनु गाय थी. एक बार कार्तवीर्य अर्जुन उनके आश्रम पधारे और बाहुबल से कामधेनु को छीन कर ले गए. यह पता चलने पर परशुराम ने कार्तवीर्य से युद्ध कर कामधेनु को वापस ले लिया. लेकिन उनके पिता जमदग्नि ने उन्हें प्रायश्चित के लिए तपस्या करने भेज दिया.
उनकी अनुपस्थिति में कार्तवीर्य के पुत्रों ने महर्षि जमदग्नि की हत्या कर दी. क्रोधित होकर परशुराम ने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रियों से विहीन कर दिया और उनकी सारी ज़मीन और राज्य छीन लिए. यह देखकर महर्षि कश्यप ने उन्हें क्षत्रियों को वापस ज़मीन लौटाने को कहा. परशुराम ने आज्ञा मानकर अपने पितरों का आह्वान किया, राज्य लौटा दिए और पितरों को प्रसन्न किया.
उसी समय से अक्षय तृतीया को पितरों का स्मरण कर उन्हें तृप्त करने की परंपरा प्रारंभ हुई.
चिरंजीवी हैं भगवान परशुराम
कहा जाता है कि परशुराम आज भी चिरंजीवी हैं और महेंद्रगिरी पर्वत पर तपस्या कर रहे हैं. अपने लिए कोई स्थान न बचने पर उन्होंने समुद्र को पीछे धकेल कर अपने लिए कोंकण प्रदेश यानी कर्नाटक से लेकर केरल तक की भूमि स्वतंत्र की थी. इसलिए आज भी कोंकण से लेकर केरल तक के लोग उन्हें अपना ईष्ट मानते हैं और इन स्थानों पर उनके कई विशाल मंदिर मौजूद हैं.
अक्षय तृतीया सिर्फ़ बाज़ार से सोना ख़रीदने का दिन नहीं है. यह दिन हमें दान, धर्म, पितरों के प्रति सम्मान और अपनी संस्कृति के उन अक्षय मूल्यों की याद दिलाता है, जो युगों-युगों से कभी कम नहीं हुए.