• Zindagi With Richa
  • 10 October, 2026
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वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे: ‘लोग क्या कहेंगे’ से थेरेपी तक का सफ़र

Ashlesha Thakur

आज वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे है. यह दिन हमें याद दिलाता है कि जिस तरह शरीर थकने या बीमार पड़ने पर इलाज और आराम मांगता है, ठीक उसी तरह हमारे मन को भी देखभाल, समझ और उपचार की ज़रूरत होती है. विडंबना यह है कि हमारे समाज में शरीर की चोट या बुखार पर हम फ़ौरन डॉक्टर के पास दौड़ते हैं, लेकिन जब कोई अपने ही विचारों के बोझ तले दबा हो, तो उसे कह दिया जाता है, “थोड़ा मज़बूत बनो, सब ठीक हो जाएगा.”

भारतीय समाज में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जो झिझक, डर और भ्रम फैले हुए हैं, उन पर हमने दो प्रमुख विशेषज्ञों से विस्तार से बात की. मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स, गुरुग्राम की सीनियर कंसलटेंट (क्लिनिकल साइकोलॉजी) डॉ. मुनिया भट्टाचार्य और आर्टेमिस हॉस्पिटल, गुरुग्राम के हेड कंसलटेंट (मेंटल हेल्थ एंड बिहेव्यरल साइंस) डॉ. राहुल चंडोक ने इन अहम मुद्दों पर बेबाक राय रखी है. आइए जानते हैं कि एक समाज के तौर पर हमें कहां और कैसे बदलने की ज़रूरत है.

‘पागलपन’ का ठप्पा और ‘लोग क्या कहेंगे’ का डर

डॉ. मुनिया भट्टाचार्य बताती हैं, “हमारे समाज में शरीर की बीमारी को मानना आसान है, लेकिन मन की तकलीफ़ को अक्सर चरित्र की कमज़ोरी समझ लिया जाता है. लोग अक्सर कहते हैं कि ‘थोड़ा मज़बूत बनो’. कई लोग मदद सिर्फ़ इसलिए नहीं लेते क्योंकि उन्हें डर होता है कि लोग उन्हें ‘पागल’ समझेंगे.” मानसिक स्वास्थ्य के लिए मदद लेना कमज़ोरी नहीं, बल्कि अपने प्रति ज़िम्मेदारी का पहला कदम है.

वहीं, डॉ. राहुल चंडोक भी इस बात से इत्तेफ़ाक रखते हैं. उनका कहना है, “यह 100 फ़ीसदी सच है कि आज भी मानसिक स्वास्थ्य को पागलपन से जोड़कर देखा जाता है. जब कोई अपनी परेशानी बताता है, तो उसे ‘ओवरथिंकिंग’ कहकर टाल दिया जाता है. हमें यह समझना होगा कि थेरेपी लेना किसी के पागल होने का सर्टिफ़िकेट नहीं है.”

पारिवारिक टकराव और पीढ़ियों का अंतर

मानसिक समस्याओं को लेकर अक्सर परिवार में टकराव देखने को मिलता है. पुराने ज़माने में लोग जानकारी की कमी के कारण इसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा मान लेते थे. डॉ. चंडोक कहते हैं, “अगर आप डिप्रेशन में जा रहे हैं, तो ज़रूरी नहीं कि परिवार भी इस चीज़ को तुरंत स्वीकार करे. आपको इलाज के लिए उनकी अनुमति का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं है, ख़ुद आगे बढ़कर अपनी मदद करें.”

डॉ. मुनिया माता-पिता को एक बेहद अहम सलाह देती हैं. वह कहती हैं, “बुज़ुर्गों ने कठिन समय में चुप रहकर और सहकर जीना सीखा है, लेकिन हर दर्द को सहना मज़बूत होने की निशानी नहीं है. माता-पिता से मेरी एक ही गुज़ारिश है कि जब आपका बच्चा कहे कि ‘मैं ठीक नहीं हूं’, तो उसे तुरंत समाधान देने से पहले पूछें, ‘तुम्हें सबसे ज़्यादा क्या परेशान कर रहा है?”

सोशल मीडिया की ‘थेरेपी’ बनाम असली इलाज

आजकल युवाओं में इंस्टाग्राम रील्स देखकर ख़ुद को बीमार (Self-diagnose) मान लेने का चलन बहुत बढ़ गया है. डॉ. चंडोक चेतावनी देते हुए कहते हैं, “30 सेकंड की रील देखकर ख़ुद को बीमार समझ लेना सही नहीं है. गैसलाइटिंग, नार्सिसिस्ट या बर्नआउट जैसे शब्द सुनकर अपनी बीमारी तय न करें. यह शुरुआती जागरूकता के लिए ठीक है, लेकिन इसे प्रोफ़ेशनल हेल्प से रिप्लेस नहीं किया जा सकता.”

डॉ. मुनिया के अनुसार, “सोशल मीडिया आपको अपनी भावनाओं को पहचानने के लिए शब्द दे सकता है, लेकिन हर दुखद अनुभव ‘आघात’ (Trauma) नहीं होता. क्लिनिकल सेशन में हम समस्या की जड़ और उसके पीछे के ढर्रे को समझते हैं.”

कैसे चुनें सही मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ?

आजकल सोशल मीडिया पर ‘लाइफ़ कोच’ और ‘हीलर’ की भरमार है. डॉ. चंडोक साफ़ करते हैं, “गाइनेकोलॉजिस्ट और न्यूरोलॉजिस्ट की तरह मेंटल हेल्थ प्रोफ़ेशनल के भी अलग काम होते हैं. साइकियाट्रिस्ट एक डॉक्टर होता है, जो दवाएं लिख सकता है, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट थेरेपी के ज़रिए मदद करता है और काउंसलर इमोशनल दिक्कतों को समझता है. किसी भी विशेषज्ञ को चुनने से पहले उसकी योग्यता और पेशेवर पंजीकरण ज़रूर जांचें.” सोशल मीडिया पर फ़ॉलोअर्स की संख्या किसी की मेडिकल दक्षता का पैमाना नहीं है.

ऑनलाइन थेरेपी: छोटे शहरों के लिए नई उम्मीद

छोटे शहरों में आज भी विशेषज्ञों की कमी है. ऐसे में ऑनलाइन थेरेपी और टेली-काउंसलिंग एक वरदान साबित हो रहे हैं. डॉ. मुनिया बताती हैं, “ऑनलाइन सेशन में कई लोग पहली बार खुलकर बात कर पाते हैं क्योंकि उन्हें अपने परिचित सामाजिक दायरे में पहचाने जाने का डर कम होता है.”

हालांकि, डॉ. चंडोक इसमें प्राइवेसी की चुनौती को अहम मानते हैं. “कई बार मन में यह हिचक रहती है कि कोई हमारी बात सुन तो नहीं रहा है. इसलिए डिजिटल थेरेपी के लिए घर में एक शांत और सुरक्षित जगह का होना बहुत ज़रूरी है. ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दोनों माध्यम अपनी-अपनी जगह कारगर हैं.”

क्राइसिस का इंतज़ार न करें, आज ही मदद लें

हम शरीर में ज़रा सा दर्द होने पर जांच करा लेते हैं, लेकिन मन के मामले में महीनों इंतज़ार करते हैं. डॉ. चंडोक के अनुसार, अगर आपको लगातार उदासी, बहुत ज़्यादा चिंता, चिड़चिड़ापन, नींद न आना, भूख में बदलाव, काम में मन न लगना या पैनिक अटैक जैसे लक्षण दिख रहे हैं, तो तुरंत प्रोफ़ेशनल से बात करें.

ख़ामोशी तोड़ें, संवाद जोड़ें

वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे महज़ कैलेंडर की एक तारीख़ नहीं है. यह हम सबके लिए एक मौक़ा है कि हम अपने घरों, दफ़्तरों और दोस्तों के बीच एक ऐसा माहौल तैयार करें जहां कोई भी व्यक्ति अपने मन की बात बिना किसी हिचक या शर्म के कह सके. मन की तकलीफ़ से गुज़रना किसी इंसान की हार नहीं है, और मदद मांगना कायरता नहीं बल्कि सबसे बड़ा साहस है.

आइए, इस वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे किसी को यह कहने के बजाय कि “सब ठीक हो जाएगा”, उनसे प्यार से पूछें “तुम्हें कैसा महसूस  हो रहा है? मैं तुम्हारी बात सुनने के लिए यहां मौजूद हूं.”

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