World Brain Tumor Day: क्या मोबाइल रेडिएशन से होता है ब्रेन ट्यूमर? जानें सच
Ashlesha Thakur
“क्या मुझे ब्रेन ट्यूमर है?” बार-बार सिरदर्द होने पर यह ख़्याल आज के तनाव भरे दौर में किसी को भी डरा सकता है. हममें से ज़्यादातर लोग दर्द होते ही या तो इंटरनेट पर लक्षण खंगालने लगते हैं या फिर तुरंत कोई पेनकिलर खाकर उसे स्ट्रेस का नाम दे देते हैं. लेकिन क्या हर सिरदर्द सिर्फ़ थकान है या क्या हर ट्यूमर का मतलब ज़िंदगी का अंत है? हर साल 8 जून को मनाए जाने वाले विश्व ब्रेन ट्यूमर दिवस (World Brain Tumor Day) का मक़सद लोगों के मन से इसी डर और बेवजह की भ्रांतियों को मिटाना है.
2026 के इस दौर में, जहां 5G रेडिएशन का डर है और स्क्रीन टाइम बहुत बढ़ गया है, वहां ब्रेन ट्यूमर को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. क्या मोबाइल फ़ोन इसका कारण है?
इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए हमने दो शीर्ष विशेषज्ञों डॉ. सीमा धीर (यूनिट हेड व सीनियर कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन, आर्टेमिस हॉस्पिटल्स) और डॉ. कृष्ण कुमार यादव (क्लिनिकल डायरेक्टर- न्यूरोसर्जरी, मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स) से विस्तार से बात की. आइए जानते हैं ब्रेन ट्यूमर की असली पहचान और आज के दौर के इलाज के बारे में.
आम सिरदर्द और ब्रेन ट्यूमर के दर्द में क्या फ़र्क है?
अक्सर लोग तेज़ सिरदर्द या माइग्रेन को ट्यूमर समझकर घबरा जाते हैं. डॉ. सीमा धीर इस भ्रम को दूर करती हैं:
“आम सिरदर्द या माइग्रेन ज़्यादातर तनाव, नींद की कमी, तेज़ रोशनी या ख़राब लाइफ़स्टाइल के कारण होता है. आराम करने या दवा लेने से इसमें राहत मिल जाती है. लेकिन ब्रेन ट्यूमर का सिरदर्द कुछ अलग होता है. यह वक़्त के साथ धीरे-धीरे बढ़ता है और दवा से भी ठीक नहीं होता. यह अक्सर सुबह उठने के समय सबसे ज़्यादा महसूस होता है. इसके साथ ही उल्टी आना, बोलने में परेशानी और दौरे (Seizures) जैसे लक्षण भी हो सकते हैं.”
अगर आपका सिरदर्द लगातार बढ़ रहा है और नए लक्षण दिख रहे हैं, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.
सिर्फ़ सिरदर्द नहीं, इन ‘छिपे हुए लक्षणों’ पर भी दें ध्यान
क्या ब्रेन ट्यूमर का लक्षण सिर्फ़ सिरदर्द है? नहीं! कई बार इसके संकेत इतने सामान्य होते हैं कि लोग इन्हें बढ़ती उम्र या थकान मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं.
डॉ. धीर कुछ महत्वपूर्ण ‘रेड फ़्लैग्स’ (Red Flags) की ओर इशारा करती हैं:
- मूड में अचानक बदलाव: बिना बात गुस्सा आना, उदास रहना या भ्रमित (Confused) होना.
- याददाश्त कमज़ोर होना: रोज़मर्रा की बातें भूल जाना और फ़ोकस न कर पाना.
- दृष्टि दोष: कम दिखना या एक चीज़ दो नज़र आना (Double vision).
- शारीरिक संतुलन बिगड़ना: चलने में लड़खड़ाहट, शरीर के एक हिस्से में सुन्नपन या बोलने/सुनने में तकलीफ़.
अगर ये लक्षण बार-बार आएं, तो इन्हें स्ट्रेस का नाम देकर टालें नहीं, न्यूरोलॉजिस्ट से मिलें.
क्या 5G मोबाइल रेडिएशन से होता है ब्रेन ट्यूमर?
आज हर हाथ में स्मार्टफ़ोन है तो क्या मोबाइल के रेडिएशन से ट्यूमर का सीधा संबंध है?
डॉ. सीमा धीर ने साफ़ किया: “फ़िलहाल इसका कोई भी सीधा और ठोस वैज्ञानिक प्रमाण (Scientific proof) नहीं है. 2024 की एक बड़ी स्टडी (CoSMos) में पाया गया कि मोबाइल का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल करने वालों में भी ट्यूमर का ख़तरा सामान्य लोगों जैसा ही था. 5G या 6G रेडिएशन को ब्रेन ट्यूमर का सीधा कारण नहीं माना जा सकता, लेकिन फिर भी सावधानी बरतना समझदारी है.”
ब्रेन ट्यूमर का मतलब ब्रेन कैंसर या मौत नहीं है!
समाज में सबसे बड़ा मिथक यही है. न्यूरोसर्जन डॉ. कृष्ण कुमार यादव इस डर को सिरे से ख़ारिज करते हैं.
“हर ब्रेन ट्यूमर कैंसर नहीं होता. इसके दो प्रकार हैं— बिनाइन (Benign – जो कैंसर नहीं है) और मैलिग्नेंट (Malignant – जो कैंसर है). बिनाइन ट्यूमर धीरे-धीरे बढ़ते हैं और शरीर के दूसरे हिस्सों में नहीं फैलते. हालांकि, दिमाग़ संवेदनशील जगह है, इसलिए बिनाइन ट्यूमर भी दबाव डाल सकता है. लेकिन अच्छी ख़बर यह है कि आज के समय में सही पहचान और एडवांस सर्जरी से ज़्यादातर मरीज़ बिलकुल सामान्य और स्वस्थ जीवन जी रहे हैं.”
2026 की जादुई तकनीक: रोबोटिक्स और अवेक क्रैनियोटॉमी
अक्सर ब्रेन सर्जरी का नाम सुनते ही अधिकतर लोगों की रूह कांप जाती है लेकिन डॉक्टर का कहना है कि अब दौर बदल गया है.
डॉ. यादव बताते हैं: “आजकल ‘अवेक क्रैनियोटॉमी’ (Awake Craniotomy) की जाती है, जिसमें सर्जरी के दौरान मरीज़ जगा रहता है और डॉक्टर से बात करता है! इससे डॉक्टर यह सुनिश्चित करते हैं कि दिमाग़ के ज़रूरी हिस्सों (जैसे बोलने या समझने की क्षमता) को कोई नुक़सान न पहुंचे.”
इसके अलावा मिनिमली इनवेसिव तकनीक, AI-आधारित सर्जिकल प्लानिंग और न्यूरो-नेविगेशन ने चीरे (Incision) को छोटा कर दिया है, जिससे रिकवरी बहुत तेज़ हो गई है. अब लक्ष्य सिर्फ़ ट्यूमर निकालना नहीं, बल्कि मरीज़ की क्वालिटी ऑफ़ लाइफ़ बचाना है.
बच्चों का ट्यूमर और उनकी शानदार रिकवरी
दुर्भाग्य से, बच्चों में भी ट्यूमर देखा जाता है. लेकिन बड़ों की तुलना में बच्चों की रिकवरी ज़्यादा हैरान करने वाली होती है.
डॉ. यादव समझाते हैं: “बच्चों के दिमाग़ में नई परिस्थितियों के हिसाब से ख़ुद को ढालने की अद्भुत क्षमता (Neuroplasticity) होती है. इसलिए इलाज के बाद वे तेज़ी से रिकवर करते हैं. डॉक्टरों का पूरा ध्यान इस बात पर होता है कि ट्यूमर निकालने के साथ-साथ बच्चे की पढ़ाई, याददाश्त और भविष्य सुरक्षित रहे.”
डरें नहीं, उम्मीद रखें विश्व ब्रेन ट्यूमर दिवस हमें यही सिखाता है कि ‘ब्रेन ट्यूमर सर्वाइवर’ (Survivor) अब सिर्फ़ एक शब्द नहीं, बल्कि जीने की उम्मीद है. बीमारी का पता चलना ज़िंदगी का अंत नहीं है. सही वक़्त पर पहचान, पॉज़िटिव सोच और आधुनिक मेडिकल साइंस मिलकर इस बीमारी को हरा सकते हैं.