Audio-Visual Heritage Day: जब पुरानी यादों में ठहर जाता है वक़्त
Ankita
जब भी हम अपने फ़ोन की गैलरी में बहुत नीचे स्क्रॉल करते हुए किसी पुरानी धुंधली वीडियो या फ़ोटो पर पहुंच जाते हैं, तो एक सेकंड के लिए सब कुछ थम सा जाता है. चेहरा वही रहता है, बस वक़्त आगे निकल चुका होता है.
डिवाइस बदलते हैं, फ़ॉर्मैट पुराने होते हैं और तकनीक हर दशक में नया रूप ले लेती है लेकिन हमारा यह डर कि कहीं कोई ज़रूरी पल, कोई अनमोल आवाज़ या इतिहास का कोई अहम हिस्सा वक़्त के साथ ‘हमेशा’ के लिए गुम न हो जाए. यही डर हमें उन्हें सहेजने पर मजबूर करता है. जब हम किसी ब्लैक एंड वाइट रील पर क़ैद शहर को या दशकों पुरानी रिकॉर्डेड आवाज़ को दोबारा सुनते-देखते हैं, तो एहसास होता है कि यह सब सिर्फ़ फ़िल्म या डेटा नहीं है, यह वक़्त की रफ़्तार के ख़िलाफ़ हमारी एक छोटी सी जीत है.
वक़्त को मुट्ठी में क़ैद करने की ज़िद
सवाल यह नहीं है कि तकनीक कितनी आगे निकल आई है, बल्कि यह है कि उस स्क्रीन और आवाज़ के पीछे ऐसा कौन सा एहसास छिपा है जो हमें आज भी थम जाने पर मजबूर कर देता है.
शायद इसका सबसे जीवंत उत्तर इतिहास के पन्नों से गूंजती उन आवाज़ों में मिलता है. ज़रा उस मध्यरात्रि की कल्पना कीजिए, जब आज़ाद भारत अपनी आंखें खोल रहा था. तब पंडित नेहरू के मुंह से निकला वह ऐतिहासिक वाक्य “At the stroke of the midnight hour” आज भी जब हम किसी ऑडियो या वीडियो रिकॉर्डिंग में सुनते हैं, तो वक़्त जैसे अपनी सारी रफ़्तार भूलकर वहीं ठहर जाता है. वह सिर्फ़ एक भाषण नहीं है, वह एक पूरे राष्ट्र के जागने का, उसके सपनों का और नियति से मिलन (Tryst with Destiny) का अमर दस्तावेज़ है, जिसे महसूस कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं. अगर हमारी यह ‘ठहर जाने की ज़िद’ न होती, तो वह गूंज हमेशा के लिए गुम हो चुकी होती.
सेल्युलाइड पर उकेरी गई अमिट दुनिया
यादों को सहेजने का यह सिलसिला सिर्फ़ राजनीतिक पन्नों तक सीमित नहीं रहा. सत्यजित रे की ‘पथेर पांचाली’ और उनका सिनेमा इसका सबसे बड़ा प्रमाण है. सेल्युलाइड की परतों पर उकेरी गई वह दुनिया क्रिस्टोफ़र नोलन और मार्टिन स्कॉर्सेसे जैसे हॉलीवुड दिग्गजों को भी अचंभित करती है.
जब हम उस दृश्य को देखते हैं जहां अप्पू और दुर्गा काश के फूलों के बीच से दौड़ते हुए पहली बार ट्रेन का धुआं देखते हैं, या बारिश की बूंदों के साथ बेपरवाह हंसी गूंजती है तो वह सिर्फ़ बंगाल के किसी छोटे से गांव का क़िस्सा नहीं रहता, वह हर इंसान के भीतर बसी मासूमियत और उसकी उम्मीद बन जाता है. सत्यजित रे ने ऑडियो-विज़ुअल हेरिटेज के रूप में सेल्युलाइड पर जो उकेरा, वह समय की रेत पर खींची गई वह रेखा है, जो लहरों के आने के बाद भी अमिट है.
हवा में तैरती आवाज़ें और रूह का सुकून
यादों का यह सफ़र उन आवाज़ों और संगीत की तारों में भी ज़िंदा है, जो बिना किसी शक्ल के सीधे रूह में उतर जाती हैं. रेडियो की दुनिया में अमीन सयानी की वह सुनहरी आवाज़, “बहनों और भाइयों…” आज भी कानों में गूंजती है, तो लगता है 1950-1980 के दशक की वही महफ़िल लौट आई है. वह सिर्फ़ एक रेडियो जॉकी नहीं थे, बल्कि एक नए दौर के सूत्रधार थे जिन्होंने रेडियो के ज़रिए घर-घर में एक अलग ही रिश्ता बना दिया था.
और जब बात संगीत की आती है, तो किशोर कुमार की मस्ती, लता मंगेशकर का पावन सरगम, जगजीत सिंह की ग़ज़लों का ठहराव, या पंडित भीमसेन जोशी के शास्त्रीय संगीत की गूंज, ये सब महज़ गीत नहीं हैं. ये वक़्त के वो स्तंभ हैं जो बताते हैं कि इंसान चाहे जितना भी आगे निकल जाए, उसका दिल आज भी उन्हीं पुराने तरानों में धड़कता है. जब किसी पुराने रेडियो पर अचानक कोई भूला-बिसरा गीत बज उठता है, तो हम अपने उस अतीत में पहुंच जाते हैं जिसे हम कभी छोड़कर आगे बढ़ गए थे.
एक मुकम्मल कहानी का एहसास
यही वजह है कि 27 अक्टूबर को मनाया जाने वाला “World Audio-Visual Heritage Day” हमारे जीवन में एक अनकहे ठहराव की तरह आता है. यह सिर्फ़ अतीत को सहेजने का दिन नहीं, बल्कि इस बात को महसूस करने का मौक़ा है कि ये धुंधली तस्वीरें और गूंजती आवाज़ें ही वह पुल हैं जो हमें एक-दूसरे से और ख़ुद से जोड़ती हैं.
क्या आने वाले कल में, जब तकनीक हमारी हर याद को सिर्फ़ एक ‘कोल्ड डेटा’ में बदल देगी, तब इंसान अपनी रफ़्तार भरी दुनिया में खोकर रह जाएगा? या सदियों बाद भी कोई पुरानी रील और गूंजती हुई आवाज़ें यह तय करती रहेंगी कि हमारा होना महज़ एक इत्तेफ़ाक़ नहीं, बल्कि एक मुकम्मल कहानी थी?