सफ़ेद दाग से प्यार तक का सफ़र: मेरी विटिलिगो की कहानी
Zindagi With Richa
Written by Tulika Srivastava “Manu”
कभी-कभी ज़िंदगी हमारे सामने ऐसी परिस्थितियां खड़ी कर देती है, जिन्हें बदलना शायद हमारे हाथ में नहीं होता. लेकिन उन्हें स्वीकार करके, उनके साथ आत्मविश्वास से जीना, हमारी असली ताक़त बन जाता है.
विटिलिगो (Vitiligo) सिर्फ़ त्वचा पर दिखने वाले सफ़ेद दागों की कहानी नहीं है, यह आत्म-स्वीकृति, साहस, मानसिक स्वास्थ्य और ख़ुद से प्यार करने की भी एक लंबी यात्रा है. विटिलिगो अवेयरनेस डे (Vitiligo Awareness Day) के मौक़े पर, यह ब्लॉग मेरी अपनी कहानी है, सफ़ेद दागों से डरने से लेकर उन्हें अपनी पहचान का हिस्सा मानने तक का सफ़र.
आख़िर क्या है विटिलिगो?
विटिलिगो, जिसे ल्यूकोडर्मा (Leucoderma) या सफ़ेद दाग भी कहते हैं, एक ऐसी स्किन कंडीशन है जिसमें त्वचा अपना प्राकृतिक रंग खोने लगती है. यह एक ऑटोइम्यून बीमारी (Autoimmune Disease) है, जिसमें शरीर का अपना ही इम्यून सिस्टम, मेलानिन (Melanin) बनाने वाले सेल्स (Melanocytes) पर अटैक करने लगता है. मेलानिन ही हमारी त्वचा को उसका रंग देता है. जब ये सेल्स नष्ट होने लगते हैं, तब त्वचा पर सफ़ेद दाग बनने लगते हैं.
विटिलिगो के साथ मेरा शुरुआती सफ़र
बचपन से ही मेरे शरीर पर 2-3 छोटे सफ़ेद दाग थे, लेकिन उनका आकार कभी बढ़ा नहीं. फिर लगभग 6 साल पहले, अचानक शरीर पर कई नए सफ़ेद दाग दिखाई देने लगे. मैंने डॉक्टरों से इलाज करवाया, लंबे समय तक स्टेरॉयड्स (Steroids) भी लेने पड़े. दाग तो कम नहीं हुए, लेकिन इन तेज़ दवाइयों से मेरा स्वास्थ्य बहुत अधिक प्रभावित होने लगा.
डॉक्टरों का कहना था कि दवाई और यूवी थेरेपी (UV Therapy) से केवल इन दागों को फैलने से रोकने की कोशिश की जा सकती है, पूरी तरह से ठीक होना तो मुश्किल है. लेकिन दवाइयां और थेरेपी मेरे शरीर पर काम नहीं कर पाईं और धीरे-धीरे ये दाग बढ़ते ही चले गए.
सिर्फ़ त्वचा नहीं, मेरा आत्मविश्वास भी छिन रहा था
ये दाग सिर्फ़ मेरे शरीर पर ही नहीं, बल्कि मेरे मन और आत्मविश्वास पर भी गहरा असर डाल रहे थे. मुझे हमेशा यही डर रहता था कि कहीं कोई इन्हें देख न ले. लंबे समय तक मैं कंसीलर (Concealer) लगाकर इन्हें दुनिया से छुपाती रही.
फिर मन में सवाल आता था, “इनको छुपाना क्यों है? इसमें मेरी क्या ग़लती है?”
लेकिन सच कहूं, तो इस हक़ीक़त को स्वीकार करना भी मेरे लिए बिलकुल आसान नहीं था. जब भी किसी को ये दाग दिख जाते, लोगों के सवालों की झड़ी लग जाती:
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“अरे! ये क्या हो गया?”
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“क्या ये छूने से फैलता है?”
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“इसका कोई इलाज नहीं है क्या?”
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“घर में किसी और को भी है?”
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“ये कहीं कुष्ठ रोग तो नहीं?”
कुछ लोग घूरते थे, तो कुछ बिना पूछे ही नीम-हकीम वाले इलाज और डॉक्टर के नाम बताने लगते थे. यह सब भावनात्मक रूप से बहुत थकाने वाला था, है, और शायद आगे भी रहेगा.
लोगों का ऐसे देखना, उनकी जिज्ञासा और उनका बिन-मांगी सलाह देना कभी ख़त्म नहीं होगा. कुछ लोग शायद अपनी चिंता में ऐसा करते हैं, लेकिन कुछ लोग पूरी तरह से संवेदना-रहित होते हैं. उन्हें यह समझ नहीं आता कि उनकी इस ‘चिंता’ या सवालों से सामने वाले को कैसा महसूस होगा, जो पहले ही मानसिक और भावनात्मक रूप से एक बड़ी लड़ाई लड़ रहा है.
आत्म-स्वीकृति की असली शुरुआत
मेरे परिवार और दोस्तों ने हमेशा मुझे समझाने और मेरा आत्मविश्वास लौटाने की पूरी कोशिश की. लेकिन शायद उनके प्रयासों और मेरी समझ में कुछ कमी थी. कहीं न कहीं सच यह भी है कि जब तक हम ख़ुद को पूरी तरह से स्वीकार नहीं करते, तब तक कोई और हमारा आत्मविश्वास हमें नहीं लौटा सकता.
मैंने हमेशा ज़िंदगी की हर चुनौती का सामना हिम्मत से किया है और मैं मानसिक रूप से कभी कमज़ोर नहीं रही. फिर भी, मैं इन सफ़ेद दागों के साथ खुलकर जीने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी. मेरी हमेशा बस यही कोशिश रहती कि ये दाग किसी को न दिखें, क्योंकि शायद मुझे सफ़ेद दाग दिखने से भी ज़्यादा लोगों की निगाहों और उनके चुभते सवालों से डर लगता था.
शायद यह सिलसिला और लंबा चलता, अगर मुझे एक ऐसी दोस्त न मिली होती, जिसने मुझे ख़ुद को स्वीकार करना सिखाया. उसने मुझे यह एहसास दिलाया कि “ख़ुद से प्यार करने से बड़ा, इन दागों का कोई इलाज नहीं.”
धीरे-धीरे मैंने आईने के सामने खड़े होकर ख़ुद से कहना सीखा:
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“मैं जैसी भी हूं, बहुत सुंदर हूं.”
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“ये दाग मेरे व्यक्तित्व, मेरे मूल्यों, मेरी अच्छाइयों और मेरी योग्यताओं को परिभाषित नहीं कर सकते.”
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“मैं अपनी आत्मा का भी प्रतिबिम्ब हूं, सिर्फ़ अपने शरीर का नहीं.”
और जब मैंने अपनी सोच में यह बदलाव लाना शुरू किया, उसके बाद ही शायद मैं एक बहुत लंबे अरसे बाद ‘ख़ुद’ से फिर मिल पाई.
सफ़ेद दाग हमें परिभाषित नहीं कर सकते
विटिलिगो का सफ़र शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक, सभी तरह से बहुत चुनौतीपूर्ण होता है. शरीर का रंग उड़ने (Depigmentation) के धब्बे सिर्फ़ त्वचा तक सीमित नहीं रहते, ये बार-बार हमारे आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को हिलाते रहते हैं.
लेकिन यह याद रखना बहुत ज़रूरी है कि हमारी त्वचा बदल सकती है, लेकिन हमारी असली पहचान नहीं. हमारी सुंदरता सिर्फ़ हमारे चेहरे या रंग में नहीं, बल्कि हमारे दिल, हमारी सोच और हमारी आत्मा में बसती है.
“सच कहूं तो हर सफ़ेद दाग, हमारी मानसिक ताक़त की एक नई कहानी कहता है.”
इस सफ़र में मैंने क्या सीखा?
अपने अनुभव से मैं बस इतना ही कहना चाहूंगी कि ख़ुद को “बेचारा” समझने से कुछ भी हासिल नहीं होता. अपनी क़ीमत का अंदाज़ा सिर्फ़ आप लगा सकते हैं; दुनिया को इसका फ़ैसला मत करने दीजिए. अपनी इस अलग पहचान को पूरे हक़ से स्वीकार कीजिए.
आत्मविश्वास और आत्म-प्रेम ही आपकी सबसे बड़ी ताक़त हैं. आप बहुत सुंदर हैं और आपकी असली सुंदरता आपके भीतर, आपकी सुंदर भावनाओं में निहित है.
एक ख़ास बात… जो मैं आप सभी से कहना चाहती हूं
ख़ुद को प्यार करना, ख़ुद को स्वीकार करना और ख़ुद पर विश्वास रखना… यह किसी और की ज़िम्मेदारी नहीं है, यह ज़िम्मेदारी सबसे पहले हमारी अपनी है. जब हम ख़ुद को पूरे दिल से स्वीकार कर लेंगे, तब इस बात का कोई मोल नहीं रह जाएगा कि दुनिया हमारे बारे में क्या सोचती है.
मैंने तो अपने आप को पूरी तरह से स्वीकार कर लिया है. मैंने तय किया है कि जैसे-जैसे यह सफ़ेद दाग और फैलेंगे, और मेरे चेहरे पर भी आएंगे, तो मैं किसी नकारात्मक सोच के बिना ख़ुशी से इन्हें स्वीकार करूंगी. मैं यह बात अब अच्छी तरह समझ चुकी हूं कि आपकी असली क़ीमत सिर्फ़ आप तय कर सकते हैं, कोई और नहीं.
मैं उम्मीद करती हूं कि आप भी सबसे पहले अपने आप को प्यार करेंगे. हर परिस्थिति, हर रूप में ख़ुद को दिल से स्वीकार करेंगे और ज़िंदगी की हर कठिन चुनौती का सामना पूरी हिम्मत और आत्मविश्वास के साथ करेंगे. क्योंकि विटिलिगो सिर्फ़ रंग बदल सकता है, लेकिन किसी भी इंसान की ख़ूबसूरती उसकी आंतरिक सुंदरता से होती है. शरीर केवल उसकी पहचान नहीं हो सकता.
मेरी कहानी का नया रंग
सफ़ेद दाग कोई कमी नहीं हैं, ये मेरी कहानी का एक ख़ास हिस्सा हैं. जब हम अपनी कहानी को शर्म से नहीं, बल्कि प्यार से अपनाते हैं, तभी ख़ुद को स्वीकार करने की असली शुरुआत होती है.
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एक समय था जब मैं आईने में सबसे पहले अपने दागों को देखती थी. आज मैं ख़ुद को देखती हूं, अब मेरा ध्यान उनकी तरफ़ जाता भी नहीं.
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एक समय था जब मैं सोचती थी कि लोग क्या कहेंगे. आज मैं लोगों के बीच पूरे विश्वास के साथ खड़ी होती हूं, बिना यह परवाह किए कि वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे.
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एक समय था जब मुझे लगता था कि मेरे शरीर से कुछ छिन गया है. लेकिन अब मानती हूं कि शायद ज़िंदगी मुझे बहुत कुछ सिखाना चाहती थी. मुझे और हिम्मती बनाना चाहती थी और इस समस्या से जूझ रहे लाखों लोगों के लिए एक मिसाल बनने का मौक़ा देना चाहती थी.
इस सफ़र ने मुझे सिखाया कि आत्मविश्वास बेदाग़ त्वचा से नहीं, आपके व्यक्तित्व और आपके मन की सुंदरता से आता है. ख़ुद से प्रेम करना तब सबसे ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है, जब दुनिया आपको अलग नज़रों से देखने लगे.
आज भी मेरे शरीर पर सफ़ेद दाग हैं जो बढ़ते ही जा रहे हैं, लेकिन अब वे मुझे डराते नहीं हैं. वे मुझे हर दिन मेरी हिम्मत और मेरी उस ताक़त की याद दिलाते हैं कि कैसे मैंने अपने सबसे कठिन दिनों को पार किया है. वे मुझे याद दिलाते हैं कि कैसे मैंने ख़ुद को खोकर फिर से पाया है.
और शायद इसी वजह से अब मुझे अपने दाग़ों से कोई शिकायत नहीं है. क्योंकि उन्होंने मुझसे मेरा रंग नहीं छीना… उन्होंने मुझे मेरी असली पहचान से मिलवाया है!
जो लोग विटिलिगो के साथ जी रहे हैं, उनके लिए एक संदेश
यदि आप भी विटिलिगो के साथ जी रहे हैं और इसे स्वीकार करना आपके लिए अभी भी मुश्किल हो रहा है, तो मैं बस इतना कहना चाहूंगी…
ख़ुद को थोड़ा समय दीजिए. ख़ुद पर थोड़ा भरोसा रखिए. ख़ुद को उतना ही प्यार दीजिए, जितना आप दुनिया के बाक़ी लोगों को देते हैं.
यक़ीन मानिए… जिस दिन आप ख़ुद को पूरी तरह स्वीकार कर लेंगे, उस दिन आपकी सबसे बड़ी कमज़ोरी ही आपकी सबसे बड़ी ताक़त बन जाएगी. इस सफ़र में आपकी त्वचा के रंग भले ही बदलते रहें, लेकिन अंत में आपको वह रंग मिल जाएगा जो कभी फ़ीका नहीं पड़ता और वह रंग होगा— आत्म-स्वीकृति का रंग!