• Zindagi With Richa
  • 10 September, 2026
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सुसाइड प्रिवेंशन डे: अपनों की ख़ामोशी को समझें, ज़िंदगी बचाएं

Ashlesha Thakur

ट्रिगर वॉर्निंग (Trigger Warning): इस लेख में आत्महत्या (खुदकुशी) और गहरे मानसिक अवसाद का ज़िक्र है.

कुछ विषयों पर बात करने या लिखने के लिए सच में बहुत हिम्मत जुटानी पड़ती है. खुदकुशी उनमें से ही एक ऐसा दर्दनाक विषय है, जो सीधे दिल पर चोट करता है.

हर साल ‘सुसाइड प्रिवेंशन डे’ (World Suicide Prevention Day) बस एक दिन बनकर नहीं आता, बल्कि यह याद दिलाने आता है कि इंसान की मानसिक तकलीफ़ कोई दिखावा नहीं है. यह एक बहुत गहरी और खामोश पीड़ा है. खुदकुशी सिर्फ़ अख़बार के पन्नों पर छपे आंकड़े या ख़बरें नहीं हैं. जब कोई अपना अचानक यूं ज़िंदगी से हार मानकर चला जाता है, तो उसके पीछे छूट गए लोगों की दुनिया हमेशा के लिए सूनी हो जाती है. उनका सब कुछ बदल जाता है.

सुसाइड प्रिवेंशन डे पर इस विशेष लेख में उन तीन लोगों की सच्ची दास्तान है, जिन्होंने अपनों को हमेशा के लिए खो दिया है. वे आज भी उस गहरे खालीपन के साथ किसी तरह अपनी ज़िंदगी काटने को मजबूर हैं.

1. ‘शादी के बाद मनमर्ज़ी करना’: झूठी उम्मीदें और सुलेखा की दीदी

“शादी के बाद जो मन में आए वो करना, अभी वैसे रहो जैसे हम कह रहे हैं.” हमारे समाज का यह एक बहुत आम और कड़वा जुमला है. छोटे शहरों में पली-बढ़ी ज़्यादातर लड़कियों ने यह जुमला कभी न कभी ज़रूर सुना होगा. बात चाहे स्कूल-कॉलेज की ट्रिप पर जाने की हो, दोस्तों के साथ फ़िल्म देखने की या फिर अपनी ज़िंदगी के छोटे-छोटे फ़ैसले ख़ुद लेने की, घरवाले अक्सर यह कहकर बात टाल देते हैं कि ‘एक बार शादी हो जाए, फिर जो मर्ज़ी करना, तब पूरी छूट मिलेगी’. कुछ ऐसा ही कहता था सुलेखा का परिवार.

सुलेखा (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि उनकी बड़ी दीदी इन पाबंदियों का अक्सर विरोध करती थीं:

“दीदी बाहर घूमने-फिरने के लिए नहीं, बल्कि अपने बुनियादी अधिकारों और ख़ुद फ़ैसले लेने की आज़ादी के लिए आवाज़ उठाती थीं. उन्हें डांट पड़ती और कई बार बात डांट से आगे भी बढ़ जाती थी.”

पढ़ाई-लिखाई को अक्सर शादी के बाज़ार में एक योग्यता बना दिया जाता है, ताकि लड़की ससुराल में ‘उठने-बैठने लायक’ दिखे. दीदी की शादी हुई तो लगा कि अब वो अपनी ज़िंदगी जी सकेंगी. लेकिन शादी के बाद वो जब भी मायके आईं, पहले से ज़्यादा बुझी-बुझी और ख़ामोश नज़र आईं.

शादी के बाद भी वही बंदिशें रहीं. हर चीज़ के लिए पति और ससुराल वालों की इज़ाज़त की ज़रूरत. उन्हें बिना अनुमति मायके के किसी कार्यक्रम में आने तक की आज़ादी नहीं थी. मन की बात न कह पाने और स्वाभिमान खो देने के दुख ने धीरे-धीरे उनके जीने की इच्छा ही छीन ली. शादी के महज़ तीन साल बाद सुलेखा की दीदी ने खुदकुशी कर ली.

2. “हमारा बेटा इंजीनियर बनेगा”: कोटा का दमघोंटू दबाव और सूरज का भाई

राजस्थान का कोटा शहर दशकों से इंजीनियरिंग और मेडिकल कोचिंग की फ़ैक्ट्री माना जाता है. लेकिन इसी चमक के पीछे एक डरावना अंधेरा भी है, जहां हर साल उम्मीदों का बोझ न सह पाने के कारण कई युवा ज़िंदगी ख़त्म कर लेते हैं.

सूरज (बदला हुआ नाम) का परिवार आज से करीब दो दशक पहले इस दर्द से गुज़रा, जब उनके 18 वर्षीय भाई राकेश ने अपनी जान दे दी थी:

“कोटा का हद से अधिक दबाव भरा माहौल युवाओं को ऐसी दुनिया में ढकेल देता है, जहां वे सांस तो ले रहे होते हैं, पर ज़िंदगी से कोसों दूर चले जाते हैं.”

12वीं के बाद जब राकेश ने कोचिंग का एंट्रेंस पास किया, तो पूरे मोहल्ले में उसकी मिसाल दी जाने लगी. लेकिन वहां पहुंचते ही हर रोज़ क्लास में बढ़ती अपेक्षाएं, टेस्ट के नंबर और टीचर्स के तानों ने उसे तोड़ना शुरू कर दिया. हर रविवार फ़ोन पर परिवार से बात करते हुए उसकी आवाज़ धीमी होती गई. माता-पिता को लगा कि यह सिर्फ़ पढ़ाई की ‘तपस्या’ है और जल्द ही सब ठीक हो जाएगा. वे उसके डिप्रेशन और तनाव की गहराई को भांप नहीं पाए.

एक रविवार, घरवाले फ़ोन के इंतज़ार में बैठे रहे लेकिन सूरज का कॉल नहीं आया. उसने परिवार से अपनी नाकामी का डर साझा करने से आसान मौत को गले लगाना समझा. सवाल वही है, हमारे बच्चे अपनी तकलीफ़ अपने ही माता-पिता से बयां करने से क्यों डरते हैं? जन्म देने वालों का डर, मौत के डर से बड़ा क्यों हो जाता है?

3. “हर बात में समझौता”: घरेलू हिंसा, डिप्रेशन और डेज़ी की मां

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में आत्महत्या करने वाली महिलाओं में आधी से अधिक संख्या गृहणियों (Homemakers) की होती है. यह आंकड़ा बताता है कि चारदीवारी के भीतर कितनी ख़ामोश चीखें अनसुनी रह जाती हैं.

डेज़ी (बदला हुआ नाम) आज भी अपनी मां को याद करते हुए रो पड़ती हैं:

“मैं ऐसे माहौल में बड़ी हुई जहां माता-पिता कभी एक-दूसरे के साथ ख़ुश नहीं थे. बचपन से मां को मानसिक अवसाद और डिप्रेशन का शिकार होते देखा. वो दिन-रात बिस्तर पर पड़ी रहती थीं, न किसी से मिलती थीं और न बात करती थीं.”

लगातार झगड़ों के बाद जब उनकी मां अपने दोनों बच्चों को लेकर मायके आईं, तब भी उन्हें कोई भावनात्मक सहारा नहीं मिला. रिश्तेदार, हर जानने वाले की सिर्फ़ एक ही नसीहत थी, ‘समझौता करो और पति के पास लौट जाओ.’ उस समय डेज़ी महज़ एक बच्ची थीं और नहीं जानती थीं कि ‘समझौते’ का असल मतलब क्या होता है.

लगातार अकेलेपन और बिना किसी सहारे के घुटते हुए, डेज़ी की मां ने महज़ 27 साल की उम्र में अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली.

अपनों के जाने के बाद का खालीपन जो कभी नहीं भरता

सुलेखा, सूरज और डेज़ी तीनों की ज़िंदगी उस एक हादसे के बाद कभी पहले जैसी नहीं रही. वे आज भी थेरेपी और काउंसलिंग के सहारे अपनी ज़िंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं.

सुलेखा कहती हैं, “घर में लड़कियों पर अब पहले जैसी पाबंदियां नहीं हैं, लेकिन परिवारवालों की सख्ती कम करने के लिए दीदी को अपनी जान क्यों देनी पड़ी?”

सूरज का कहना है, “न अब वो पुराना घर रहा, न माता-पिता से पहले जैसा सहज रिश्ता. सब कुछ बिखर गया.”

डेज़ी आज भी अक्सर मां को याद करती हैं और बताती हैं, “मेरी मां जब हंसती थीं तो बहुत प्यारी लगती थीं. वो आज भी बहुत याद आती हैं.”

हम क्या कर सकते हैं?

सुसाइड प्रिवेंशन डे हमें याद दिलाता है कि हर ज़िंदगी क़ीमती है. अगर आपके आसपास कोई इंसान अचानक बहुत ख़ामोश हो गया है, अपनी पसंदीदा चीज़ों से दूर हो रहा है, गहरी मायूसी में है या ख़ुद को चोट पहुंचाने जैसी बातें करता है, तो:

  1. बिना शर्त सुनें: उसे उपदेश या ज्ञान देने के बजाय सिर्फ़ उसकी बात को बिना किसी जजमेंट के ध्यान से सुनें.
  2. सहानुभूति दिखाएं: ‘सब ठीक हो जाएगा’ या ‘तुम अभी कमज़ोर हो’ जैसी बातें कहने से बचें. उनकी तकलीफ़ को स्वीकार करें.
  3. प्रोफ़ेशनल मदद दिलाएं: मनोचिकित्सक, काउंसलर या अधिकृत हेल्पलाइन की मदद लेने में संकोच न करें.
  4. अकेला न छोड़ें: मुश्किल वक़्त में उनके आसपास रहें और उन्हें भरोसा दिलाएं कि वे अकेले नहीं हैं.

अपनों के जाने के बाद अफ़सोस करने से कहीं बेहतर है कि हम आज ही उनके आंसुओं और ख़ामोशी को समझें. सही संवाद ही वो डोर है, जो किसी भी टूटते हुए इंसान को ज़िंदगी से जोड़े रख सकती है.

हेल्पलाइन और सहायता: अगर आप या आपका कोई परिचित किसी मानसिक तनाव, अवसाद या निराशा से जूझ रहा है और मन में ख़ुद को नुक़सान पहुंचाने के विचार आ रहे हैं, तो कृपया अकेले न रहें. तुरंत हेल्पलाइन नंबरों पर संपर्क करें:

  • टेली-मानस (Tele-MANAS): 14416 / 1800-891-4416 (टोल-फ़्री, 24×7)

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