सावन की फुहारें: महादेव का आशीर्वाद और बेटियों के लौटने की आस
Shyama Thakur
जैसे ही तपती गर्मी के बाद आसमान में काले बादल घिरते हैं, मन में एक अलग सी उमंग उठने लगती है. सावन का महीना सिर्फ़ कलेंडर का पन्ना बदलना नहीं है, यह एक बहुत ही गहरा और भावुक एहसास है. बारिश की पहली बूंद के साथ ही मिट्टी की सोंधी महक सीधे दिल में उतर जाती है. यह वह समय है जब प्रकृति अपना रूप निखारती है, सूखे पेड़ों पर नई पत्तियां आती हैं और हर तरफ़ हरियाली की चादर बिछ जाती है. सावन हमें बताता है कि कितनी भी कड़ी धूप क्यों न हो, सुकून की बारिश एक दिन ज़रूर आती है.
सावन का महत्व और शिव पूजा
अगर हम सावन के महत्व की बात करें, तो यह महीना भगवान शिव को समर्पित है. हमारी पुरानी मान्यताओं के अनुसार, जब समुद्र मंथन हुआ था, तो उसमें से खतरनाक विष निकला था. उस विष से पूरी दुनिया को बचाने के लिए भगवान शिव ने उसे अपने गले में ग्रहण कर लिया था, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया. उसी विष की भयानक जलन को शांत करने के लिए सावन के महीने में शिव जी पर शीतल जल चढ़ाया जाता है. यह महीना हमें त्याग, प्रेम और दुनिया को बचाने का संदेश देता है. कई लोग सावन के हर सोमवार को व्रत रखते हैं और सच्चे मन से भगवान की पूजा करते हैं.
बेटियों का इंतज़ार और सावन की परंपरा
सावन का सबसे खूबसूरत और भावुक पहलू वह है, जो एक शादीशुदा बेटी और उसके मायके से जुड़ा है. सावन आते ही हर बेटी का मन अपने पुराने घर के आंगन की तरफ़ भागने लगता है. बचपन की वो मीठी यादें, आम के पेड़ों पर पड़े झूले, सखियों के साथ गाए जाने वाले गीत और मां के हाथ का खाना, सब कुछ उसे पुकारने लगता है.
भारत में यह एक बेहद प्यारी और पुरानी परंपरा रही है कि सावन में बेटियां अपने मायके आती हैं. जब एक बेटी घर लौटती है, तो मानों पूरा घर फिर से खिल उठता है. उनके हाथों में रची गहरी लाल मेहंदी, कलाइयों में खनकती हरी चूड़ियां और माथे की बिंदिया, सावन की हरियाली में और भी रंग भर देती हैं. एक मां के लिए सावन का महीना सिर्फ़ शिव जी की पूजा नहीं है, बल्कि अपनी बेटी को गले लगाने की वो खुशी है जिसका इंतज़ार वह पूरे साल करती है.
भारत के अलग-अलग हिस्सों में सावन का रंग
पूरे भारत में सावन को अलग-अलग और बेहद ख़ास तरीकों से मनाया जाता है. उत्तर भारत में जहां शिव भक्त लंबी कांवड़ यात्रा पर निकलते हैं और पूरा माहौल ‘बम भोले’ के जयकारों से गूंज उठता है, वहीं राजस्थान और गुजरात में ‘तीज’ का त्योहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. औरतें सज-संवर कर झूला झूलती हैं और सावन के गीत गाती हैं.
वहीं, अगर हम बिहार के मिथिलांचल की बात करें, तो वहां सावन का एक अलग ही पारंपारिक रूप देखने को मिलता है. मिथिला में नवविवाहित बेटियों के लिए ‘मधुश्रावणी’ का पर्व मनाया जाता है, जो तेरह से पंद्रह दिन तक चलता है. इस दौरान नई दुल्हनें हर दिन शिव-पार्वती और नाग देवता की पूजा करती हैं.
इन पंद्रह दिनों तक नवविवाहित बेटी मायके में रहती है. सभी नवविवाहिताएं सज-धज कर एक साथ बैठती हैं और गांव की बुजुर्ग महिलाएं उन्हें शिव-पार्वती के जीवन और पति-पत्नी के रिश्ते की लोक कथाएं सुनाती हैं. यह सिर्फ़ एक पूजा नहीं है, बल्कि एक बेटी को उसके नए जीवन के लिए तैयार करने का एक अनोखा तरीका है.
सावन सिर्फ़ बारिश का मौसम नहीं है, यह रिश्तों के फिर से हरे-भरे होने का समय है. यह भगवान की असीम कृपा, प्रकृति के फिर से सजीव होने और एक बेटी के अपने मायके लौटने की मीठी सी आस का महीना है. हर साल सावन की फ़ुहारें हमें यही याद दिलाती हैं कि ज़िंदगी की भागदौड़ में अपनी जड़ों और अपनों से जुड़े रहना कितना ज़रूरी है.