समाज का तिरस्कार और संत ज्ञानेश्वर के अद्भुत चमत्कार
Sunita Thatte
विट्ठलपंत के साथ इंद्रायणी की ओर प्रस्थान करने से पहले रुक्मिणी ने जाकर निवृत्ति अपने बड़े पुत्र को निद्रा से जगाया और गहिनीनाथ के हाथ में सौंपकर बोली “बेटा आज से यह महापुरुष तुम्हारा मार्ग प्रशस्त करेंगे. तुम अपने छोटे भाई और बहन की देखभाल करोगे. मैं अपने छोटे बच्चों का उत्तरदायित्व तुम्हें सौंपती हूं.” यह कहकर वह सती और ममतामयी माता अपने पति के साथ चली गई. उनके जाते ही वह दिव्य पुरुष अंतर्ध्यान हो गए. निवृत्ति कभी अपने सो रहे भाइयों और बहन पर दृष्टि डालता और कभी उस माता पर जो उनका उत्तरदायित्व उसे सौंपकर गयी थी.
दूसरे दिन का सूर्योदय हुआ. अपने माता – पिता हमें छोड़कर चले गए यह देखकर वह बच्चे कितने दुखी हुए होंगे यह कल्पनातीत है. आख़िर निवृत्ति ने सबको संभाला और चरितार्थ चलाने के लिये भिक्षा का रास्ता चुना. वह और ज्ञानदेव सूखा अनाज भिक्षा में मांगकर लाते, सोपान और मुक्ता घर का कार्य देखते.
पैठण यात्रा और शुद्धि पत्र
अब ऐसे चलते कुछ दिनों के बाद उन्हें शुद्धि पत्र की आवश्यकता अनुभव हुई. ऐसे सोचते चारों भाई – बहन पैदल चलकर गोदावरी तट पर आए. आलंदी से निकलकर उन्हें पूरा महीना हो गया था. वे सभी पैठण के लिये निकले थे. गोदावरी दर्शन से उनका मन प्रसन्न हो गया.
गोदावरी तट को देखकर उन्हें अपने माता-पिता की स्मृति हो आई, जिनके साथ वह पहली बार यहां आए थे. माता-पिता की स्मृति से उनके नेत्रों से अश्रु छलक पड़े. निवृत्ति के सामने उस दिन की घटना स्मरण हो आई, जिस दिन सिंह की दहाड़ और आंधी के कारण वे इस गुफा के अंदर आश्रय लेने पहुंचे थे, जहां एक महान तपस्वी समाधि में लीन था. उनका तेजस्वी मुखमंडल देखकर निवृत्ति के नेत्र चौंधिया गए. थोड़ी देर में वह महापुरुष समाधि से बाहर निकले और इस बालक को देखकर ऐसे प्रसन्न हुए, जैसे कोई माता अपने पुत्र को देखकर प्रसन्न होती है.
यह महापुरुष अन्य कोई नहीं, वही गहिनीनाथ थे, जिनके हाथ में रुक्मणी ने निवृत्ति का हाथ दिया था. उस समय उन्होंने निवृत्ति से उसका नाम पूछा और यह समझते ही कि यह मेरी शरण में आ गया, मेरा प्रतीक्षित शिष्य ही है, उसे अंक में भर लिया. उसके मस्तक पर हाथ रखकर उसे आशीर्वाद दिया, “बेटा, तुम्हारा जन्म जिस उद्देश्य से हुआ है, उसे पूरा करने के लिए मैं सदैव तुम्हारे साथ हूं. मेरा संपूर्ण आध्यात्मिक आद्यानंद वैभव मैं तुम्हें सौंपता हूं. समाज का कल्याण करो.” निवृत्ति ने स्वीकार करते हुए उन्हें दंडवत प्रणाम किया. जिस गोदावरी तट पर, दक्षिण गंगा के तट पर यह घटित हुआ था, उसे स्मरण करके निवृत्ति के हाथ अचानक प्रणाम करने को जुड़ गए.
पैठण, यह दक्षिण की काशी कही जाती है, जहां यवन संस्कृति का स्पर्श भी नहीं हुआ. यह नगर आर्य संस्कृति की तेजस्विता से दीप्त था. सद्विचार, विद्वत्ता और समृद्धि जिसका अलंकार थी, ऐसा पैठण बहुत ही सुंदर नगर था. प्रातः बेला थी. सभी अपने-अपने कार्यों में संलग्न थे. धीरे-धीरे संध्या उतरने लगी. नदी किनारे कोई धर्मशाला खोजते चारों एक धर्मशाला में ठहरे.
आलंदी के ब्राह्मण वृंद से एक पत्र लेकर चारों भाई-बहन आए थे, अतः एक ब्राह्मण को पत्र दिखाकर आगे की संभावना पूछने लगे. ब्राह्मण ने कहा, “कल प्रातःकाल वेद पाठ के बाद मैं आपका यह पत्र ब्राह्मण वृंद के सामने रखकर अनुमति लेने का प्रयास करूंगा. फिर उसने अपने घर से इन चारों के लिए अन्न भेज दिया. अपने इच्छित स्थान पर आकर चारों बहुत प्रसन्न थे. नदी के किनारे खिली हुई चांदनी में सभी प्रसन्नतापूर्वक सो गए.
शिवालय में विमर्श और ब्राह्मणों की चुनौती
प्रातः प्राची में आगत सूर्य को देखकर सभी ने अपना दिन प्रारंभ किया. वातावरण प्रसन्न था. सभी अपनी प्रार्तविधियों में व्यस्त थे. सभी को इन चार बच्चों के विषय में कौतूहल और जिज्ञासा थी. कुछ को दया भी थी कि इन कोमल बच्चों पर कैसी विपदा आ पड़ी है. सभी ब्राह्मण वृंदो को अपने निर्णय की चिंता सता रही थी. यदि निर्णय ठीक नहीं रहा तो समाज में गलत संदेश जाएगा. अतः ठीक निर्णय देना अनिवार्य था, जिसमें शास्त्र का आधार हो.
ऐसे उधेड़बुन में दिन का तीसरा प्रहर समाप्त हो गया. आखिर शिवालय की सीढ़ियों पर चारों बच्चों को बैठाया गया. संन्यासी के बच्चों को ब्राह्मण कैसे बनाया जाए, इस पर विमर्श हो रहा था. संन्यासी के बच्चे चांडाल की श्रेणी में आते हैं, ऐसा सबका मत था. इन्हें ब्राह्मण कैसे स्वीकार करें?
तभी एक कुटिल ब्राह्मण ने बच्चों से उनके नाम पूछे. सभी ने सविनय अपने नाम बता दिए. तभी उधर एक भैंसा गोबर लादे जा रहा था. उस कुटिल ब्राह्मण ने ज्ञानदेव से कहा, “अरे, उस भैंसे का नाम भी ज्ञानोबा है, अगर सबमें एक ही आत्मा विद्यमान है, तो वह भी वेद पढ़ेगा क्या? ऐसा कहकर सभी उपहासात्मक ठहाके लगाने लगे. ज्ञानदेव ने शांत होकर उत्तर दिया, “भूदेव, यह बिलकुल सत्य है. जो आत्मा मुझमें है, वही इस जीव में भी है.”
संत ज्ञानेश्वर के चमत्कार: भैंसे के मुख से वेद पठन
अब सब आश्चर्यचकित होकर देखने लगे कि अब क्या होने जा रहा है, क्योंकि कुछ लोगों को तो उन बच्चों पर दया भी आ रही थी और यह सोचकर दुख भी हो रहा था कि किसी प्रकार इन्हें दंड न मिले. इस चुनौती को स्वीकार करते हुए ज्ञानदेव उस भैंसे के बगल में खड़े होकर वेद पाठ करने लगे और आश्चर्य! महान आश्चर्य! भैंसे के मुख से वेद ऋचाओं के उच्चारण होने लगे.
पंडित, महापंडित, महामहोपाध्याय, सभी आश्चर्य यह चमत्कार देखते रह गए. ज्ञानदेव का यह अनुपम, अद्भुत चमत्कार देखकर सभी अवाक् रह गए और उनके चरणों में नतमस्तक हो गए. एक स्वर से सबने कहा, “आप लोग साक्षात् ईश्वर के अवतार हैं. आपको शुद्धिपत्र देने की आवश्यकता ही नहीं है. आप लोग कभी भी, कहीं भी विचरण कर सकते हैं.” यह सुनते ही पैठण के सभी नर-नारी उनके चरणों पर माथा टेकने लगे. जिस किसी ने यह चमत्कार देखा, वह स्वयं को भाग्यशाली समझने लगा. ज्ञानदेव का तेजोमय रूप देखने के लिए पूरा पैठण गांव अधीर हो उठा. दुष्ट, दुर्जन लोगों की जिह्वा बंद हो गई. ज्ञानदेव के तेज से पैठण नगर प्रकाशित हो उठा. इस प्रकार इन चारों भाई-बहन को उच्च समाज में आदरयुक्त स्थान मिला और उनकी यह कष्टकारी यात्रा समाप्त हुई. सबने एक स्वर से कहा, “आप चारों भाई और बहन देवता स्वरूप हो. आप जैसे बच्चों को शुद्धि की क्या आवश्यकता? आप कभी भी, कहीं भी अपनी इच्छानुसार आ-जा सकते हैं.”
सत्य ही है, वह दिन पैठण के इतिहास में अत्यंत पवित्र और रमणीय था. जिन्होंने भैंसे के मुख से वेदों की ऋचाएं सुनी, वे अपने को धन्य मानने लगे. इसके बाद यह चारों एक ब्राह्मण के यहां रहने लगे. वहां उन्होंने योग वशिष्ठ, भागवत, गीता, उपनिषद, आरण्यक, पुराण आदि का अवलोकन किया. वह सब वहां रह रहे थे कि उस ब्राह्मण के यहां उसके पितरों की श्राद्ध तिथि पड़ी. इतना सब कुछ घटित होने के बावजूद उस ब्राह्मण को कुछ लोगों का कोप भाजन बनना पड़ा था. अतः श्राद्ध तिथि को सभी ब्राह्मणों ने उसका बहिष्कार किया.
यह देखकर ज्ञानेश्वर ने उससे कहा, “आप श्राद्ध की तैयारी करें, निश्चिंत रहें.” सभी लोग कौतुहल से वहां जमा हो गए. कितना भी चमत्कार हो, कुछ लोग मानने से सहमत नहीं होते. कमी निकालने के लिए तत्पर थे, केवल अपने ज्ञान के आधार पर धन कमाकर सुखलोलुप समाज ज्ञानेश्वर की महानता को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे. उस ब्राह्मण ने श्राद्ध की पूरी तैयारी कर ली. सभी अन्य आगे की गतिविधि देखने एकत्र हुए थे. श्राद्ध संपन्न करने के लिए स्वयं ज्ञानेश्वर संचालन कर रहे थे. पितरों का आह्वान करते ही सभी पितर साक्षात् खाने की थाली के समक्ष विराजमान हो गए. यह देखकर सभी ब्राह्मणों की जिह्वा तालू से चिपक गई. उनका अहंकार क्षण में विगलित हो गया. अंत में सभी ब्राह्मण पुनः ज्ञानेश्वर की शरण आए और अपनी भूल के लिए क्षमा-प्रार्थी हो गए.
ऐसे पैठण के ब्राह्मणों को अपनी योग्यता से परिचित कराकर चारों विभूतियां शुद्धिपत्र लेकर वहां से विदा हुईं. जिस भैंसे के मुख से वेदघोष किया था, उसे भी अपने साथ ले लिया. वह तब से लगातार वेदघोष करता ही रहा था. इसका प्रमाण आज भी पैठण नगर में देखने को मिलता है. जब से वेदघोष किया, तब से आज तक पैठण नगर में भैंसा किसी गाड़ी में जोता नहीं जाता.
इस प्रकार अपने ज्ञान का प्रकाश प्रकाशित करके कुछ दिन पैठण में रहकर चारों भाई और बहन ने वहां से विदा ली. उनके बारे में इतना जानने के बाद जिस पथ पर वे लोग जाते, सभी आदरपूर्वक उनके दर्शन को रास्ते में खड़े हो जाते. अनेक नवमाताएं अपने शिशुओं को उनके चरणों में रखतीं. ज्ञानदेव भी सबको उनकी पात्रतानुसार आशीर्वाद देते. ऐसे चलते-चलते वे सब अलेगांव पहुंचे.
भैंसे के मुख से निरंतर वेदघोष सुनकर अलेगांव के ब्राह्मणों ने ज्ञानेश्वर से विनती की कि “भैंसे के मुख से वेदोच्चारण सुनना शोभा नहीं देता, अतः इसे शांत करें.” ज्ञानेश्वर ने उत्तर दिया, “आप भूदेव हो, परम ज्ञानी, अतः आपकी आज्ञा शिरोधार्य है.” उनके ऐसा कहते ही भैंसे ने ‘ॐ तत्सत’ कहकर प्राण त्याग दिए. परंतु आश्चर्य! सभी ब्राह्मणों के मुख से वेद लुप्त हो गए. इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि आज भी अलेगांव के ब्राह्मण वेदपठन नहीं करते. ज्ञानेश्वर ने वहीं पर भैंसे की समाधि निर्मित की और आगे सभी नेवासा नामक नगरी में आ पहुंचे. जिस कार्य के लिए ज्ञानेश्वर ने जन्म लिया था, वह यहीं संपन्न होने वाला था.
नेवासा और ज्ञानेश्वरी की रचना
समुद्र मंथन में जब अमृत निकला, तो भगवान विष्णु को मोहिनी रूप धारण करना पड़ा था, जहां उन्होंने यह रूप धारण करके देव और दैत्यों में अमृत का वितरण किया, वह स्थान है ‘नेवासा’. यहां मोहिनीराज का मंदिर भी है, जिसे महालया कहते हैं. ऐसे अनादिकाल के तीर्थ क्षेत्र में चारों ने अपना निवास निश्चित किया.
प्रवरा नदी का विशाल प्रवाह, अपार सृष्टि वैभव और मोहिनीराज का वह जागृत स्थान, परंतु यहां ज्ञान का संपूर्ण लोप हो चला था. अतः समाज को पुनः ज्ञान की ओर प्रवृत्त करने के लिए ज्ञानेश्वर ने अपने गुरु निवृत्ति के मार्गदर्शन कार्य आरंभ करने का विचार किया. पूरा समाज विसंगतियों से भरा पड़ा था. ब्राह्मण वर्ग निम्न जाति को अतिनिम्न देखते थे. समाज में अशिक्षा के कारण शोषण हो रहा था. इसलिए ही गीता में कहा है, “अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्.” जब भी धर्म की हानि होती है, उसे स्थापित करने लिए ईश्वर को स्वयं पृथ्वी पर आना पड़ता है.
एक दिन सभी नदी किनारे विचरण कर रहे थे कि एक स्त्री ने आदर ज्ञानेश्वर को नमस्कार किया. स्वाभाविक रूप से ज्ञानेश्वर के मुख से “सौभाग्यवती भव” आशीर्वाद स्वरूप निकला. उस समय वह स्त्री अपने पति के शव के साथ सती जाने को उद्यत थी. यह देखते ही ज्ञानदेव ने उसके पति के शव को स्पर्श किया. वह जीवित हो गया. उनका नाम सच्चिदानंद था. स्त्री का आनंद उसके मुख पर दिख रहा था. उसके जीवंत होते ही सब उसे सच्चिदानंद बाबा कहकर बुलाने लगे. ज्ञानदेव ने उस स्त्री से कहा, “अब आपका सुहाग आपको मिल गया है. अब मैं सच्चिदानंद बाबा को साथ रख लूं, तो आपको कोई आपत्ति तो नहीं है?” स्त्री ने उत्तर दिया, स्त्री को उसके सुहाग के अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहिए. फिर आपके साथ रहने में तो उनका कल्याण ही होगा. ज्ञानदेव ने उपदेश देकर सच्चिदानंद को अपने साथ रख लिया. फिर उन्होंने जनसाधारण की भाषा में समझ आए ऐसी ओवीबद्ध भाषा में भगवद्गीता का अर्थ समझाना प्रारंभ किया, जिसे लिपिबद्ध करने का कार्य सच्चिदानंद ने किया.
ऐसे जनसाधारण की भाषा में ज्ञानदेव ने गीता का सही अर्थ समाज के प्रत्येक वर्ग को समझ में आए, इस प्रकार वर्णित किया. पहले संस्कृत अथवा तत्सम भाषा में भगवद्गीता होने के कारण ग्रामीण, अनपढ़ लोगों को उसके विषय में भी मालूम नहीं था. ज्ञानदेव के इस निरूपण से उनकी गीता को सुनने रोज़ लोग आते. ज्ञानदेव जो बताते, उसे सच्चिदानंद बाबा ने लिपिबद्ध किया, जिसे आज हम सभी ‘ ज्ञानेश्वरी ‘ के नाम से जानते हैं.
इसी के माध्यम से निवृत्तिनाथ ने भक्ति का आद्यानंद प्रकट किया. शंकराचार्य के दिए मार्ग को सभी लोगों में प्रकट किया, अतः किसी को भी ब्रह्मविद्या पाने के लिए कहीं और भटकने की आवश्यकता ही नहीं रही.
विसोबा चाटे का अहंकार टूटना और वारी परंपरा
दो वर्षों तक ज्ञानदेव ने अपने गुरु की आज्ञा से ज्ञान से लोगों को प्रकाशित किया. इस प्रकार निवृत्तिनाथ का कार्य भी पूर्ण हुआ. अब ज्ञानदेव ज्ञानेश्वर कहलाने लगे. चारों भाई-बहन की ख्याति दूर-दूर तक फैल चुकी थी, परंतु फिर भी कुछ लोग अपनी विद्वता के अहंकार में संन्यासी के बच्चे कहकर उनका उपहास करते थे. ज्ञानेश्वरी के प्रचार-प्रसार से अनीति बढ़ रही है, ऐसा उनका विश्वास था. वे भगवद्गीता को जनसाधारण के लिए योग्य नहीं समझते थे. आलंदी में विसोबा चाटे ऐसे ही एक उच्च कुलीन ब्राह्मण थे. विठ्ठलपंत का धर्म-विरोधी आचरण उन्हें बिल्कुल भी नहीं भाया था और उसका दंड वे उनके बच्चों को देना चाहते थे.
एक बार दीपावली पर निवृत्तिनाथ को चावल की मीठी रोटी खाने की इच्छा हुई. उन्होंने बहन मुक्ताबाई से अपनी यह इच्छा प्रकट की. वह रोटी सेंकने के लिए तवा लेने कुम्हार के पास गई. वहां विसोबा के कहने पर उसे तवा देने से मना कर दिया. वह रोती हुई घर आई. ज्ञानदेव ने रोने का कारण पूछा, तो मुक्ताबाई ने बता दिया. उसी समय ज्ञानदेव ने कहा, “बहन, चिंता मत करो, लो मेरी पीठ पर सेंक दो.” ऐसा कहकर ज्ञानदेव ने योग बल से अपनी पीठ को इतना गरम कर दिया कि उस पर मुक्ता ने रोटी सेंक दी.
एक कोने से विसोबा यह देख रहे थे और देखकर आश्चर्यचकित होकर ज्ञानदेव के चरणों में गिर गए. इतने अहंकारी ब्राह्मण होते हुए भी उनके यहां मीठी रोटी की जूठन खाने लगे. यह देखते ही ज्ञानदेव बाहर आए और विसोबा को ‘ खेचर ‘ कहा. यह कहते ही विसोबा समाधि की अवस्था में चले गए. फिर ज्ञानदेव की आज्ञा से वे औंढा नागनाथ शिव मंदिर में जाकर अपनी तपस्या करने लगे.
नामदेव नामक संत ने पूरा पंढरपुर भक्तिमय कर दिया था. अन्य संतों से भेंट करने हेतु निवृत्ति, ज्ञानदेव, सोपान और मुक्ता भी पंढरपुर जाने हेतु निकले. मार्ग में अन्य भक्त भी उनके साथ चले. इस प्रकार आलंदी से पंढरपुर जाना ‘वारी ‘ बन गया, जिसकी परंपरा आज भी जारी है.
क्रमशः