• Zindagi With Richa
  • 12 September, 2026
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संत ज्ञानेश्वर और नामदेव का मिलन: तीर्थयात्रा से संजीवनी समाधि तक

Sunita Thatte

नामदेव की भक्ति से पंढरपुर का पूरा परिसर हरि नाम से गूंज उठा था. हरि के इस अनन्य भक्त से भेंट करने के लिए निवृत्ति, ज्ञानेश्वर, सोपान और मुक्ता पंढरपुर आए. यह संत ज्ञानेश्वर और नामदेव के मिलन का एक अत्यंत ऐतिहासिक क्षण था. ज्ञानदेव के अलौकिक योग सामर्थ्य की सूचना नामदेव को पहले ही मिल चुकी थी, अतः उनके आने का समाचार मिलते ही नामदेव पंढरपुर में उनके स्वागत के लिए उत्सुक हो उठे. उनके स्वागत के लिए मृदंग, ढोल और मंजीरे लेकर नामदेव अन्य भक्तगणों के साथ आगे आए.

नामदेव ने ज्ञानदेव को कसकर आलिंगनबद्ध किया, फिर उन्होंने उनके चरणों में साष्टांग दंडवत प्रणाम किया. ज्ञानदेव ने भी सभी भक्तों का आतिथ्य स्वीकार करते हुए नामदेव से कहा, “नामदेव, तुमने अपनी भक्ति से श्री हरि विट्ठल को अपना बना लिया है. तुम भक्त शिरोमणि हो.”

ऐसा कहकर सभी लोग विट्ठल के दर्शन करने मंदिर पहुंचे. श्री विट्ठल के सामने खड़े होकर ज्ञानदेव अपनी समाधि अवस्था में चले गए. फिर थोड़ी देर बाद उनकी समाधि टूटी और वे पुनः सभी भक्तों के पास आए. उस दिन से पंढरपुर में अन्नछत्र प्रारम्भ हो गया. वैभव और आनंद के दिन बीत रहे थे.

संत ज्ञानेश्वर और नामदेव: अहंकार की परीक्षा और गोरा कुम्हार

एक दिन निवृत्ति, ज्ञानदेव, सोपान और मुक्ता नामदेव के घर जा पहुंचे. वहां निवृत्ति, ज्ञानदेव और सोपान ने नामदेव के पैर छूकर उन्हें नमस्कार किया, परंतु मुक्ता ने नहीं किया. उनका कहना था कि नामदेव को अपनी भक्ति का अहंकार हो गया है. यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि भक्त को अन्य किसी बात का हो या न हो, अपनी अनन्य भक्ति का अहंकार भी हो सकता है, जो ईश्वर के पास जाने के मार्ग में बाधक है.

तब निवृत्ति ने मुक्ता से पूछा कि उनके अहंकार के बारे में कौन बता सकता है. मुक्ता ने उनसे सभी भक्तों की परीक्षा करने को कहा. तुरंत ही गोरा कुम्हार को बुलाया गया, जो कि विट्ठल के निस्सीम भक्त थे. यह सोचने वाली बात है कि नामदेव जैसे भक्त की भक्ति की परीक्षा के लिए उन्हें बुलाया गया. अब यहां जाति का कोई बंधन नहीं रह जाता. पंढरपुर में गोरा कुम्हार ही नहीं, सांवता माली और चोखामेला, जो कि चमार थे, वे भी विट्ठल के श्रेष्ठ भक्तों में गिने जाते हैं. उनकी उत्कृष्ट भक्ति के आड़े उनकी जाति कभी नहीं आती.

गोरा कुम्हार आए और मुक्ता ने उनसे सभी भक्तों की परीक्षा लेने को कहा. उन्होंने प्रत्येक भक्त के सिर पर अपनी पीटने वाली थापी (हथौड़ी) से टक-टक किया और नामदेव का घड़ा कच्चा बताकर सबको चौंका दिया.

बहुत देर से यह सब देख रहे नामदेव को क्रोध आना स्वाभाविक था. वहां से अपमानित होकर नामदेव मंदिर आए और विट्ठल से उन लोगों की शिकायत करते हुए बोले, “आज कच्ची मटकी तोड़कर ये लोग मुझे पक्का बनाने के लिए नहीं देते.”

विट्ठल बोले, “अरे, हुआ क्या? कुछ बताओ तो.” नामदेव बोले, “अब वे सब आएंगे और मुझे तुमसे छीन लेंगे. देखो, तुमने मेरे हाथ से खाना खाया है, पानी पिया है, मेरी लाज रखना, मुझे उनके साथ न भेजना.”

विट्ठल भगवान ने हंसकर कहा, “अरे, मुक्ता ने जो कहा, वह सत्य है. मेरे वे भक्त परम ज्ञानी हैं, परंतु तुम तो मेरे छोटे बच्चे की तरह हो, जो नासमझ है. इसलिए मैं तुम्हारी ज़िद पूरी करता हूं.” यह सुनकर नामदेव को बहुत दुख हुआ और वे विट्ठल से विनती करने लगे, “मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है, अब तुम ही बताओ कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए मैं क्या करूं?”

भगवान पांडुरंग ने कहा, “समय आने पर तुम्हें तुम्हारे गुरु अवश्य मिलेंगे. चिंता मत करो.”

संत ज्ञानेश्वर और नामदेव की तीर्थयात्रा और काशी में सम्मान

अब ज्ञानदेव को लगने लगा था कि उनका अवतार कार्य समापन की ओर है. अतः उससे पहले कुछ तीर्थयात्राएं कर ली जाएं, अपने लिए नहीं, बल्कि लोगों में उन तीर्थों के प्रति आस्था जागृत करने के लिए. इस कार्य में उन्हें नामदेव की अनन्य भक्ति का स्मरण हो आया. उन्हें लगा कि उस भक्त के सानिध्य में कुछ समय व्यतीत किया जाए. तो क्यों न उन्हें भी तीर्थयात्रा में सम्मिलित कर लें.

इस विचार से ज्ञानदेव नामदेव के घर पहुंचे. नामदेव चकित हुए और कहने लगे, “इस दास का घर स्वयं भगवान की चरण रज से पवित्र हो गया है. यह अलभ्य लाभ है.” ऐसा कहकर नामदेव ने ज्ञानदेव के चरणों में प्रणाम किया.

ज्ञानदेव ने कहा, “तुम तो भक्त शिरोमणि हो नामदेव. मैं तुम्हारे साथ तीर्थयात्रा पर जाना चाहता हूं.” नामदेव ने उत्तर दिया, “हे ज्ञानदेव, मैं विट्ठल के चरणों में समर्पित हूं. मुझे उन्हें छोड़कर कहीं नहीं जाना है और न ही मुझे उसकी आवश्यकता है.” ज्ञानदेव ने कहा, “चलो विट्ठल से ही पूछ लेते हैं, उनकी आज्ञा से चलना.”

दोनों मंदिर में विट्ठल के पास आए. ज्ञानदेव ने उनसे नामदेव को तीर्थयात्रा पर ले जाने की अनुमति मांगी. विट्ठल ठहाका लगाकर हंस पड़े. वे बोले, “ज्ञानेश्वर, तुम स्वयं विष्णु के अवतार हो, तुम्हें तीर्थयात्रा करने की क्या आवश्यकता है?” ज्ञानदेव बोले, “हे हरि, देह धारण की है, तो उसको तीर्थयात्रा का पुण्य मिले, यही मेरी इच्छा है और वह भी नामदेव जैसे भक्त के साथ.” विट्ठल भगवान ने नामदेव से कहा, “तुम परम भाग्यवान हो, तुम्हें ऐसे ज्ञानियों के साथ तीर्थयात्रा अवश्य करनी चाहिए.”

भगवान विट्ठल की आज्ञा लेकर नामदेव, ज्ञानदेव के साथ चलने तो लगे, परंतु वे बार-बार पीछे मुड़कर विट्ठल की ओर देख रहे थे. विट्ठल ने ज्ञानदेव को पुकारकर कहा, “यह मेरा अबोध दास है, मां की तरह इसका ध्यान रखना, इसे कोई कष्ट न होने देना.” यह सुनकर नामदेव की आंखों से आंसू गिरने लगे. ज्ञानदेव ने उन्हें धैर्य बंधाते हुए कहा, “नामदेव, तुम्हारे जैसा कोई भक्त नहीं है. तुम्हारे मुख से विट्ठल का गुणगान बहुत मीठा लगता है.”

अब संत ज्ञानेश्वर और नामदेव राजस्थान, मध्य प्रदेश इत्यादि स्थानों से होते हुए काशी आए. काशी में एक बहुत बड़ा यज्ञ होने वाला था. उस यज्ञ में अग्रपूजा का अधिकार किसे दिया जाए? यह प्रश्न उपस्थित हुआ. सर्वसम्मति से एक हथिनी की सूंड में माला दी गई. वह जिसे पहनाएगी, उसे ही अग्रपूजा का अधिकारी माना जाएगा. दर्शक वर्ग में नामदेव और ज्ञानदेव भी उपस्थित थे.

हथिनी ने अकस्मात ज्ञानदेव के गले में माला डाल दी. फिर क्या था! नामदेव ने विट्ठल के हरिनाम का उद्घोष किया. हरिनाम के गुंजन से काशी का कण-कण आह्लादित हो गया. चारों ओर ज्ञानेश्वर के नाम का उद्घोष होने लगा. यज्ञ पूर्ण हुआ. काशी विश्वनाथ ने स्वयं प्रकट होकर यज्ञ की पूर्ण आहुति ज्ञानेश्वर के हाथों से स्वीकार की. यह बात पूरे काशी नगर में फैल गई. सभी ज्ञानेश्वर के दर्शन के लिए ललायित हो उठे. वहीं मणिकर्णिका घाट पर प्रत्यक्ष रूप से श्री दत्त, महेंद्रनाथ और गोरखनाथ से ज्ञानेश्वर की भेंट हुई, जिसे नामदेव ने भी देखा.

संत ज्ञानेश्वर और नामदेव का प्रत्यक्ष साथ और संजीवनी समाधि

इसके बाद अयोध्या, गोकुल और वृंदावन सहित सभी तीर्थों की यात्रा करके लौटने पर ज्ञानेश्वर को अपना अवतार कार्य पूरा होने का अनुभव होने लगा. सभी भक्तों को संबोधित करते हुए ज्ञानदेव ने अपना यह आशय प्रकट किया. वे कार्तिक शुक्ल एकादशी का व्रत करके द्वादशी को पारणा करेंगे और कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी को मध्याह्न में ज्ञानेश्वर समाधिस्थ हो जाएंगे. यह वृत्तांत सुनते ही सभी की अश्रुधाराएं बहने लगीं.

नामदेव को अत्यंत दुख हुआ. वे कहने लगे, “मुझे भी आपके साथ समाधि लेनी है.” अब ज्ञानदेव के अंतिम दर्शन का समय आ गया था. यह बात लोगों से सहन नहीं हो रही थी. उस समय ज्ञानदेव सिर्फ़ इक्कीस वर्ष के थे. उनके समाधिस्थ होने की कल्पना मात्र से सभी लोगों को अपार दुख हो रहा था.

कार्तिक शुक्ल दशमी को सभी ने आलंदी के लिए प्रस्थान किया. स्वयं भगवान हरि अपनी पत्नी रुक्मिणी के साथ आए. नामदेव की दुखी स्थिति देखकर भगवान ने उन्हें ढाढ़स बंधाया. एकादशी के पूरे दिन हरि नाम का डंका बजता रहा. नामदेव ने पूरी रात कीर्तन किया. द्वादशी को पारणा किया गया. प्रत्यक्ष रुक्मिणी सभी भक्तों को भोजन परोस रही थीं और स्वयं भगवान घी परोस रहे थे. रात भर नामदेव समाधि स्थल को सजाते रहे, फूल और अगरबत्ती से सारा वातावरण सुगंधित कर दिया गया. आसन तैयार किया गया.

त्रयोदशी की प्रातः बेला हुई. नामदेव ने चंदन का उबटन बनाया. उबटन लगाते समय नामदेव के नेत्रों से अश्रुधारा अविरल बह रही थी. ज्ञानदेव अपनी समाधि के लिए तैयार थे. उन्हें देहभान नहीं था, अतः निवृत्ति और भगवान श्री हरि उन्हें आसन तक ले गए. ज्ञानदेव ने आसन ग्रहण करने से पहले अपने गुरु और माता स्वरूप निवृत्ति के चरण स्पर्श किए. निवृत्ति ने स्नेह से अपने शिष्य और पुत्रवत भ्राता के सिर पर हाथ फेरकर आशीर्वाद दिया और उन्हें आलिंगनबद्ध किया.

समाधि स्थल पर बैठने के बाद सभी ने कातर दृष्टि से उनकी ओर देखा. भगवान पांडुरंग ने कहा, “जब तक सूर्य, चंद्रमा, तारे और पृथ्वी अस्तित्व में हैं, तब तक तुम्हारी समाधि भी रहेगी ज्ञानदेव.”

निवृत्तिनाथ ने भारी अंतःकरण से समाधि पर सिर रखा. सिर रखते ही निवृत्ति के आंसुओं का बांध फूट पड़ा. नामदेव ने उन्हें संभाला. इस प्रकार संत ज्ञानेश्वर और नामदेव का यह प्रत्यक्ष समाधि समारोह पूर्ण हुआ. आठ-दस दिन वहां रुककर सभी अपने-अपने गंतव्य की ओर चले गए.

इन चारों भाई-बहनों के नाम मानव जीवन की पूर्णता को परिभाषित करते हैं. आसक्ति से निवृत्ति होने पर ज्ञान की प्राप्ति होती है, ज्ञान के आगे जो सोपान (सीढ़ी) है, वहीं से मुक्ति (मुक्ता) का मार्ग दिखाई पड़ता है.

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