पुरुषोत्तम मास: कैसे स्फटिक में रिकॉर्ड हुआ था विष्णु सहस्रनाम?
Sunita Thatte
भारतीय पंचांग में ‘अधिक मास’ (Adhik Maas) या ‘मलमास’ का नाम तो आपने ज़रूर सुना होगा. अक्सर घरों में बड़े-बुज़ुर्ग कहते हैं कि इस महीने में कोई शादी-ब्याह या शुभ कार्य नहीं होगा. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस महीने को शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना जाता है, उसे स्वयं भगवान विष्णु ने अपना सबसे प्रिय महीना यानी ‘पुरुषोत्तम मास’ क्यों बना दिया?
इससे भी ज़्यादा दिलचस्प बात यह है कि इस महीने में पढ़े जाने वाले ‘विष्णु सहस्रनाम’ (विष्णु के 1000 नाम) का सीधा कनेक्शन महाभारत काल के एक ऐसे ‘प्राचीन टेपरिकॉर्डर’ से है, जिसके बारे में जानकर आप हैरान रह जाएंगे. आइए जानते हैं इस अद्भुत मास और स्फटिक की माला का रहस्य.
आख़िर क्या है अधिक मास का गणित?
हिंदू कैलेंडर मुख्य रूप से चंद्रमा की चाल पर आधारित होता है. चंद्र वर्ष और सूर्य वर्ष के बीच हर साल लगभग 11 दिनों का फ़र्क आ जाता है. यह फ़र्क बढ़ते-बढ़ते तीन साल में पूरे 33 दिनों का हो जाता है. पंचांग की गणना को सूर्य वर्ष के बराबर रखने के लिए हर तीन साल में एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है. इसी 33 दिनों के महीने को ‘अधिक मास’ कहा जाता है.
भगवान विष्णु ने क्यों दिया अपना नाम?
चूंकि यह एक ‘एक्स्ट्रा’ महीना था, इसलिए इसमें कोई भी नियमित त्योहार या शुद्ध तिथि नहीं आती थी. इस वजह से कोई भी शुभ कार्य (जैसे विवाह, गृह प्रवेश) इस महीने में नहीं किए जाते.
कथाओं के अनुसार, जब अधिक मास को हर जगह से नकारा जाने लगा, तब भगवान श्री हरि विष्णु ने इसे अपना नाम दे दिया ‘पुरुषोत्तम मास’. भगवान ने वरदान दिया कि अब इंसान किसी अन्य शुभ मुहुर्त या सांसारिक बातों में न उलझकर इस महीने में सिर्फ़ ईश्वर का स्मरण करेगा. इस माह में किया गया दान, पूजा-पाठ और मंत्र साधना सीधे भगवान विष्णु को समर्पित होती है.
इस महीने में क्या दान करना चाहिए?
पुरुषोत्तम मास में दान का बहुत महत्व है. चूंकि यह अक्सर गर्मियों (जैसे ज्येष्ठ माह) के आस-पास आता है, इसलिए मौसमी फल (जैसे आम) और अन्न दान करना बहुत पुण्य का काम माना जाता है. इस महीने की सबसे विशेष मिठाई ‘मालपुआ’ है, जिसे पात्र (बर्तन) सहित दान करने की अद्भुत परंपरा है.
‘विष्णु सहस्रनाम’ और महाभारत का ‘टेपरिकॉर्डर’
पुरुषोत्तम मास में ‘विष्णु सहस्रनाम’ का पाठ करना सबसे श्रेष्ठ माना गया है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसकी रचना स्वयं भगवान विष्णु ने नहीं, बल्कि भीष्म पितामह ने की थी? इसके रचे जाने और लिपिबद्ध (लिखे जाने) की कहानी किसी साइंस फ़िक्शन फ़िल्म से कम नहीं है.
कहानी महाभारत युद्ध के अंत की है. भीष्म पितामह तीरों की शय्या पर लेटे हुए थे. उनके पास पांच पांडव, धृतराष्ट्र, कुंती, गांधारी और स्वयं भगवान श्रीकृष्ण मौजूद थे. इच्छा मृत्यु का वरदान पाए भीष्म ने जब अपने प्राण त्यागने का निश्चय किया, तो उन्होंने अपने अंतिम समय में भगवान श्री हरि का स्मरण करते हुए विष्णु के 1000 नामों का तेज़ी से उच्चारण किया और प्राण त्याग दिए.
बाद में युधिष्ठिर ने चिंता जताते हुए सबसे पूछा, “पितामह ने भगवान विष्णु के जो हज़ार नाम लिए, क्या किसी ने उन्हें कंठस्थ (याद) किया?”
वहां मौजूद हर व्यक्ति ने न में सिर हिला दिया. स्वयं वेदव्यास जी और श्रीकृष्ण भी इतने बड़े और तेज़ उच्चारण को एक बार में याद रखने में असमर्थ रहे. सभी चिंतित हो गए कि इतना महान ज्ञान हमेशा के लिए लुप्त हो जाएगा.
जब स्फटिक की माला बनी ‘ऑडियो रिकॉर्डर’
तभी श्रीकृष्ण की नज़र सहदेव पर पड़ी. उन्होंने कहा, “सहदेव! तुम्हारे गले में पड़ी यह शुद्ध स्फटिक की माला कोई साधारण चीज़ नहीं है. जब पितामह विष्णु सहस्रनाम का उच्चारण कर रहे थे, तो वे सारी ध्वनियां इस स्फटिक में संचित (रिकॉर्ड) हो गई हैं.”
यह सुनकर सहदेव ख़ुद हैरान रह गए. श्रीकृष्ण के निर्देश पर सहदेव ने भगवान शिव का ध्यान किया और उस स्फटिक की माला पर अपना ध्यान केंद्रित किया. चमत्कारिक रूप से, उस माला से विष्णु सहस्रनाम का वही उच्चारण दोबारा गूंजने लगा (बिलकुल एक टेपरिकॉर्डर की तरह) जिसे सुनकर महर्षि वेदव्यास जी ने उसे लिपिबद्ध कर लिया.
महाभारत काल का यह ‘स्फटिक रिसर्च’ हमें बताता है कि हमारे पूर्वज ऊर्जा और तरंगों को संजोने का विज्ञान जानते थे. इसी अद्भुत घटना के कारण आज हमारे पास ‘विष्णु सहस्रनाम’ जैसा अनमोल ग्रंथ है.
तो इस पुरुषोत्तम मास में, जब भी आप भगवान विष्णु का ध्यान करें या विष्णु सहस्रनाम सुनें, तो उस स्फटिक की माला और भीष्म पितामह की उस अंतिम आवाज़ को ज़रूर याद करें जिसने हमें यह धरोहर सौंपी.