पंढरपुर वारी: भगवान विट्ठल की अद्भुत यात्रा और इसका महत्व
Sunita Thatte
भारत विविधताओं और गहरी आस्थाओं का देश है. यहां ईश्वर तक पहुंचने के अनगिनत रास्ते हैं, लेकिन कुछ रास्ते ऐसे होते हैं जो इंसान को सिर्फ़ भगवान से ही नहीं, बल्कि पूरी मानवता से जोड़ देते हैं. महाराष्ट्र की ‘पंढरपुर वारी’ (Pandharpur Wari) एक ऐसी ही अद्भुत और अनुशासित आध्यात्मिक यात्रा है.
आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवशयनी एकादशी) और कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी (ज्ञान प्रबोधिनी एकादशी) के अवसर पर, लाखों भक्त पैदल चलते हुए, अभंग गाते हुए पंढरपुर पहुंचते हैं. आइए जानते हैं इस यात्रा का इतिहास, इसका असली अर्थ और यह आज के समाज के लिए क्यों इतनी महत्वपूर्ण है.
क्या है ‘वारी’ और कौन हैं ‘वारकरी’?
‘वारी’ शब्द का अर्थ है— ‘बार-बार की जाने वाली यात्रा’, और इस यात्रा को पूरी श्रद्धा के साथ करने वाले भक्त “वारकरी” कहलाते हैं.
वारकरी संप्रदाय से जुड़े लोग भगवान श्री विट्ठल (पांडुरंग) के परम भक्त होते हैं. यह संप्रदाय किसी विशेष धर्म या जाति तक सीमित नहीं है. इसमें समाज के हर तबके के लोग शामिल होते हैं. वारी में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता, कोई अमीर-गरीब का फ़र्क नहीं होता; यहां हर व्यक्ति सिर्फ़ और सिर्फ़ विट्ठल का भक्त होता है.
संत ज्ञानेश्वर से हुई ‘वारी’ की शुरुआत
इस महान यात्रा का प्रारंभ स्वयं संत ज्ञानेश्वर जी (जिन्हें महाराष्ट्र में प्यार से ‘माऊली’ यानी ‘मां’ कहा जाता है) ने किया था. वे भगवान विट्ठल से मिलने के लिए आलंदी से अपने भाई-बहन और अन्य भक्तों के साथ पैदल पंढरपुर आए थे. आषाढ़ी एकादशी का उपवास करने के बाद, द्वादशी को भक्तों को भोजन कराकर उन्होंने अपना पारणा संपन्न किया और उसी तरह पैदल वापस लौट गए.
आज भी वारकरी उनकी पालकी लेकर आते हैं. इसका अर्थ यह माना जाता है कि भक्त संत ज्ञानेश्वर को अपने साथ लेकर आ रहे हैं. इस परंपरा को संत ज्ञानेश्वर ने शुरू किया, लेकिन इसे शिखर तक पहुंचाने का श्रेय संत तुकाराम जी को जाता है. इसीलिए आज भी भक्तगण रास्ते में संत तुकाराम और संत नामदेव के अभंग (भजन) गाते हुए, ढोल-मंजीरे के साथ पंक्तिबद्ध होकर पंढरपुर की ओर बढ़ते हैं. रास्ते में पड़ने वाले गांव वाले इन वारकरियों के खाने-पीने की व्यवस्था करके अपना पुण्य अर्जित करते हैं.
अनुशासन और पवित्रता: वारी की तीन सबसे बड़ी विशेषताएं
आज के समय में जब कई धार्मिक स्थलों पर भारी भीड़, व्यावसायीकरण और अव्यवस्था देखने को मिलती है, वहीं पंढरपुर वारी अनुशासन की एक मिसाल पेश करती है. इस यात्रा के दौरान वारकरी तीन बातों का विशेष रूप से ध्यान रखते हैं:
- समानता: वारी में सभी एक समान हैं। कोई ऊंच-नीच या जाति-पाति का भेदभाव नहीं होता। सभी एक-दूसरे को ‘माऊली’ कहकर बुलाते हैं.
- अनुशासन: लाखों की भीड़ होने के बावजूद सभी भक्त इतने अनुशासनबद्ध तरीके से चलते हैं कि रास्ते से आने-जाने वाले किसी भी आम नागरिक को कोई असुविधा न हो। जहां भी ये रुकते हैं, वहां कोई गंदगी नहीं फैलाते.
- सात्विकता: वारी के समय कोई भी भक्त मांस, मदिरा या किसी भी प्रकार के नशे का सेवन नहीं करता। यह पूरी तरह से सात्विक तपस्या है.
लंबे सफ़र की थकान मिटाने के लिए खाली स्थानों पर भक्त गोल रिंगण (Ringan) बनाकर विभिन्न प्रकार के खेल और नाटक भी करते हैं, जो इस यात्रा को मनोरंजन और भक्ति का एक सुंदर संगम बनाते हैं.
वारी का असली अर्थ: सिर्फ़ यात्रा नहीं, जीवन का सबक
अगर गहराई से नज़र डालें, तो वारी का अर्थ केवल पंढरपुर की ओर बढ़ने वाले कदम नहीं हैं.
- ‘माऊली’ कहने मात्र से हर भक्त को यह भरोसा मिलता है कि उसके साथ चलने वाला व्यक्ति कोई अनजान नहीं, बल्कि अपना ही है.
- वारी का अर्थ है— अगर कोई थक जाए तो उसे सहारा देना, और कोई पीछे छूट जाए तो उसकी प्रतीक्षा करना.
- वारी का अर्थ है— अपने भोजन के कौर में से दूसरे को भी खिलाना और पानी की एक बूंद से किसी प्यासे की प्यास बुझाना.
- वारी का अर्थ है— सबके सुख-दुख में सहभागी होना.
क्योंकि पंढरपुर वारी केवल भगवान विट्ठल के दर्शन नहीं कराती, बल्कि यह इंसान का सच्ची मानवता से साक्षात्कार कराती है.