उर्मिला, मंदोदरी और यशोधरा: नारी का त्याग या वजूद का विसर्जन?
Ankita
जयशंकर प्रसाद जी की महाकाव्य ‘कामायनी’ की वो प्रसिद्ध पंक्तियां अक्सर याद आती हैं:
“नारी! तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास-रजत-नग-पगतल में, पीयूष-स्रोत सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में.”
दशकों से इन पंक्तियों को नारीत्व और प्रेम की परिभाषा माना जाता रहा है. यह एक ऐसा आदर्श है जहां स्त्री को त्याग और श्रद्धा की देवी बना दिया गया, जिसे पूजा तो सबने पर कभी एक जीता-जागता इंसान नहीं समझा. उसके त्याग की तारीफ़ तो खूब हुई, मगर उस त्याग के पीछे छुपी उसकी तकलीफ़ और चीखों को आदर्शों और महानता के तले दबा दिया गया.
यह हमारे भारतीय समाज की उस पारंपरिक दृष्टि को दर्शाता है, जहां स्त्री को केवल प्रेरणा का स्रोत माना जाता है, पर उसे अपने अस्तित्व की आग या संघर्ष का अधिकार नहीं दिया जाता. जब हम किसी स्त्री को ‘देवी’ बना देते हैं और उसे अमृत (पीयूष) का स्रोत मानकर पूजने लगते हैं, तो जाने-अनजाने हम उससे एक सामान्य इंसान होने का अधिकार छीन लेते हैं. हम यह उम्मीद करने लगते हैं कि उसका जीवन केवल दूसरों के बंजर मन को सींचने के लिए ही बना है.
इतिहास और पुराणों के पन्नों में दर्ज तीन महान नाम—उर्मिला, मंदोदरी और यशोधरा—इसी महिमामंडन के कड़वे सच हैं, जहां त्याग को स्त्री का आभूषण बताकर उसके वज़ूद को मौन में ढकेल दिया गया.
उर्मिला: विरह के रणक्षेत्र की अकेली नायिका
जब भगवान राम के साथ लक्ष्मण वनवास गए, तो दुनिया ने इसे भ्रातृप्रेम और महान कर्तव्य की कथा का नाम दिया. पर असली रणक्षेत्र तो अयोध्या के महलों में सजा था, जहां उर्मिला अकेली उस युद्ध को लड़ रही थी जिसका कोई गवाह नहीं था. उर्मिला ने अपने जीवन के सुंदर समतल को विरह की आग में तपाकर सोने सा चमका लिया था. वह सिर्फ़ एक सहमा हुआ इंतज़ार नहीं थी, बल्कि एकाकीपन के समंदर में चट्टान की तरह अडिग खड़ी एक ऐसी महानायिका थी, जिसने बिना किसी शस्त्र के अपनी भीतर की इच्छाशक्ति से 14 साल का पूरा महाकाव्य अकेले जी लिया.
मंदोदरी: अधर्म के समंदर में घुटता विवेक
अधर्म और अहंकार की लंका में मंदोदरी एक ऐसी प्रखर चेतना थी, जिसकी एक दृष्टि रावण के दंभ को बौना कर देती थी. उन्होंने युद्ध के मैदान में कोई बाण नहीं चलाए, पर हर रोज़ अपने विवेक और स्वाभिमान का दम घुटते देखा. जहां पुरुष का अहंकार विनाश का मार्ग चुन ले, वहां स्त्री से केवल ‘अमृत’ और समर्पण की उम्मीद करना कितना न्यायसंगत है!.
मंदोदरी के हिस्से केवल लंका की जलती हुई राख और वह खामोशी आई, जिसे इतिहास ने कभी नहीं सुना. उनका मौन आज भी सोचने पर मजबूर करता है कि किसी विनाशकारी के साथ बांध दिए जाने पर सहना क्या वाक़ई महानता थी, या फिर परंपराओं के नाम पर थोपी गई एक लाचारी?.
यशोधरा: अधिकार और आत्मसम्मान का प्रश्न
और फिर आती है यशोधरा. बुद्ध ने संसार का दुख देखकर गृहत्याग किया, पर क्या एक बार भी उस जीवनसाथी के बारे में सोचा, जिसे वह बिना बताए पीछे छोड़ आए थे?. यशोधरा ने कोई शिकायत नहीं की और न ही कोई विलाप किया. उसने अकेले बच्चे को पाला, अपने भीतर के आघात को सहा और जब बुद्ध वापस लौटे, तो उसने एक भिक्षुक के आगे सिर झुकाने के बजाय समता के धरातल पर खड़े होकर सवाल पूछा. यशोधरा का त्याग यह दिखाता है कि किसी के महान बनने के लिए जब कोई स्त्री चुपचाप अपनी पहचान मिटा देती है, तो वह सिर्फ़ श्रद्धा नहीं, बल्कि उस स्त्री का सबसे बड़ा मौन विद्रोह होता है.
देवी का आसन या मौन की सज़ा?
जब तक हम स्त्री के मौन और उसके त्याग को महानता का चोला पहनाकर उसका जश्न मनाते रहेंगे, तब तक हम उसके असली दर्द से मुंह मोड़ते रहेंगे. जब प्रसाद जी ने कहा था कि “नारी तुम केवल श्रद्धा हो”, तो शायद उन्होंने अनजाने में उस युग की इसी सीमा को बयां कर दिया था, जहां स्त्री को इंसान कम और एक भावना या प्रतीक ज़्यादा समझा जाता है.
समाज उसे इसलिए पूज्य बना देता है, ताकि वह कोई सवाल न कर सके. उसे देवी का आसन सिर्फ़ इसलिए दे दिया जाता है, ताकि वह कभी अपनी थकान न बयां कर सके. अब वक़्त आ गया है कि नारी के त्याग का महिमामंडन करने के बजाय, उसके वजूद और एक इंसान के रूप में उसकी अहमियत को स्वीकार किया जाए.