करवा चौथ: दांपत्य प्रेम, सरगी की परंपरा और इसका असली महत्व
Sunita Thatte
करवा चौथ का व्रत उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्य प्रदेश और पंजाब सहित पूरे उत्तर भारत में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है. सुहागिन महिलाएं साल भर से इस विशेष दिन की प्रतीक्षा करती हैं. यह केवल एक उपवास नहीं है, बल्कि पति-पत्नी के अभूतपूर्व प्रेम और समर्पण का प्रतीक है. बदलते समय के साथ इस व्रत की तस्वीर भी बदली है. आजकल सिर्फ़ महिलाएं ही नहीं, बल्कि कई पति भी अपनी पत्नी के प्रति प्रेम और सम्मान व्यक्त करने के लिए उनके साथ यह कठिन निर्जला व्रत रखते हैं.
भारतीय परंपराओं में देवशयनी एकादशी से देवोत्थान एकादशी तक चातुर्मास के दौरान अनेक व्रतों और पर्वों का प्रावधान है. इन व्रतों का वैज्ञानिक और मानसिक दोनों तरह से गहरा महत्व है.
व्रत और मानसिक सकारात्मकता
व्रत एक तरह की तपस्या है. चातुर्मास में व्रत करने से स्वास्थ्य पर बेहद अनुकूल प्रभाव पड़ता है. जब व्यक्ति व्रत करता है, तो वह स्वतः ही नकारात्मक विचारों से दूर हो जाता है. पूजा-अर्चना व्यक्ति के मन पर सकारात्मक प्रभाव डालती है, जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है.
अगर ध्यान से देखा जाए, तो भारतीय संस्कृति के सभी पर्व संबंधों में मिठास घोलने का कार्य करते हैं. श्रावण मास में भाई-बहन के लिए रक्षाबंधन आता है, तो उसी मास में हरितालिका तीज का पर्व आता है जिसे कन्याएं और सुहागिनें अच्छे वर या पति के कल्याण के लिए करती हैं. माता पार्वती ने भगवान शिव को वर रूप में पाने के लिए पत्तों पर जीवन व्यतीत कर कठिन तपस्या की थी. शिव-पार्वती का दांपत्य प्रेम आज भी पूरे समाज के लिए एक आदर्श है. भाद्रपद मास में हलषष्ठी और गोवत्स द्वादशी (संतान सप्तमी) जैसे व्रत संतान की मंगलकामना के लिए रखे जाते हैं.
सरगी की मिठास और करवा चौथ की विधि
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ व्रत रखा जाता है. सुहागिन स्त्रियां पूरे दिन निर्जल (बिना जल के) व्रत रखकर रात में चंद्र-दर्शन के बाद छलनी से पति के चंद्रमुख के दर्शन करती हैं. चंद्रमा को अर्घ्य देकर पूजा की जाती है और फिर पति अपनी पत्नी को जल पिलाकर उनका व्रत संपन्न कराते हैं.
इस व्रत की एक बेहद ख़ूबसूरत परंपरा ‘सरगी’ है. व्रत के दिन सूर्योदय से पूर्व, पति की मां (सास) अपनी बहू को सरगी के रूप में भोजन, मिष्ठान्न और शृंगार का सामान देती हैं. यह एक प्रकार से बहू का सम्मान है, क्योंकि वह उनके पुत्र की दीर्घायु की कामना से यह कठिन व्रत कर रही है.
वीरावती की कथा: आस्था और संकल्प
करवा चौथ व्रत के साथ राजकुमारी वीरावती की पौराणिक कथा गहराई से जुड़ी है. वीरावती अपने सात भाइयों की इकलौती और लाडली बहन थी. विवाह के बाद जब उसने अपने पति के लिए निर्जल व्रत रखा, तो शाम होते-होते भूख-प्यास से उसकी हालत बिगड़ने लगी और वह बेहोश होने लगी. अपनी बहन की यह हालत देखकर भाइयों ने एक वृक्ष की आड़ में आग जलाकर नकली चंद्र-दर्शन करा दिया.
नकली चांद देखकर व्रत तोड़ने के कारण वीरावती के पति के प्राण संकट में पड़ गए. जब उसे वास्तविकता का पता चला, तो उसने कठोर संकल्प लिया कि वह पूरे साल नियमों का पालन करेगी और अगले वर्ष वास्तविक चंद्र-दर्शन के बाद ही अपना व्रत खोलेगी. कथा के अनुसार, उसके इस संकल्प और पूर्ण विधि-विधान से व्रत करने पर उसके पति को पुनः जीवन और दीर्घायु की प्राप्ति हुई.
सत्कर्म और एक-दूसरे का साथ
यह धारणा ग़लत है कि केवल स्त्रियां ही अपने पति के लिए व्रत रखती हैं. महाराष्ट्र में प्रचलित ‘शिवलीलामृत’ नामक ग्रंथ में साफ़ तौर पर उल्लेख मिलता है कि एक सुंदर, गुणवान और पतिव्रता पत्नी को पाने के लिए पति के पूर्वजन्म के अच्छे कर्म सहायक होते हैं. जिस प्रकार अच्छा वर पाने के लिए लड़कियां व्रत करती हैं, उसी प्रकार एक अच्छी जीवनसंगिनी पाने के लिए पुरुषों को भी सत्कर्म करने की सलाह दी गई है.
शृंगार की सामग्री, मेहंदी, सुंदर परिधान और व्रत खोलने में पति का सहयोग—यह सब मिलकर दांपत्य जीवन में मधुरता लाते हैं. जीवन की रोज़मर्रा की भागदौड़ और व्यस्तता के बीच, पति-पत्नी दोनों को इन ख़ास क्षणों की प्रतीक्षा रहती है.
दिखावे से दूर, सादगी में है असली सुंदरता
पंजाब में महिलाएं सामूहिक रूप से बैठकर पूजा-अर्चना करती हैं और कथा सुनती हैं. रात में चांद निकलने पर सभी पति-पत्नी एक साथ एकत्रित होते हैं और एक उत्सव जैसा माहौल बन जाता है. लेकिन आज के दौर में यह समझना बहुत ज़रूरी है कि इन व्रतों का मूल उद्देश्य आपसी प्रेम और सम्मान बढ़ाना है, न कि दिखावा करना.
आजकल त्योहारों के नाम पर बहुत महंगे उपहारों की अपेक्षा और दिखावा काफ़ी ज़्यादा बढ़ गया है, जो व्रत की वास्तिवक पवित्रता को समाप्त कर देता है. करवा चौथ व्रत हो या कोई अन्य पर्व, इन्हें परिस्थिति के अनुसार सादगी से मनाया जाना चाहिए. महंगे उपहारों से ज़्यादा, एक-दूसरे का साथ और सम्मान ही किसी भी दांपत्य जीवन की सबसे अमूल्य विरासत है.