जितिया व्रत: महत्व, नहाय-खाय की अनूठी परंपरा और पूजा विधि
Aditi Jha
जितिया… यह सिर्फ़ एक व्रत नहीं है, बल्कि एक मां के असीम प्रेम, त्याग और उसकी गहरी ममता की तपस्या है. हमारे समाज में कई व्रत और त्योहार मनाए जाते हैं, लेकिन जितिया (जिसे जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है) की भावना सबसे अलग और बेहद मार्मिक है. इस दिन माताएं अपनी संतान की सलामती, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और लंबी आयु की कामना करते हुए अत्यंत कठिन निर्जला व्रत रखती हैं.
हर राज्य और क्षेत्र में जितिया व्रत मनाने की परंपरा अलग हो सकती है, लेकिन इसके पीछे की भावना केवल एक ही होती है, अपनी संतान के सुखी और सुरक्षित जीवन की निस्वार्थ प्रार्थना.
नहाय-खाय और मैथिल समाज की विशेष परंपरा
किसी भी बड़े अनुष्ठान की तरह जितिया व्रत की शुरुआत भी एक दिन पहले ‘नहाय-खाय’ की परंपरा के साथ होती है. इस दिन माताएं स्नान के बाद सात्विक और पारंपरिक भोजन ग्रहण कर व्रत का संकल्प लेती हैं.
इस व्रत में स्थानीय मान्यताओं का बहुत सुंदर समावेश देखने को मिलता है. उदाहरण के लिए, मैथिल समाज में नहाय-खाय के दिन एक बेहद विशिष्ट और प्राचीन परंपरा का पालन किया जाता है. इस दिन मुख्य रूप से ‘मरवा (रागी) की रोटी’ और ‘मछली’ खाने की विशेष परंपरा है. माना जाता है कि यह भोजन व्रत रखने वाली माताओं को अगले दिन के कठिन उपवास के लिए शारीरिक शक्ति और ऊर्जा प्रदान करता है, साथ ही यह उनकी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव का प्रतीक भी है.
ब्रह्म मुहूर्त का ओठगन और चूड़ा-दही
नहाय-खाय के अगले दिन मुख्य व्रत की शुरुआत होती है, जिसके नियम बेहद कड़े होते हैं. व्रत वाले दिन सूर्योदय से पहले यानी ‘ब्रह्म मुहूर्त’ में माताएं अपने बच्चों को नींद से उठाकर ‘ओठगन’ करवाती हैं.
ओठगन इस व्रत का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है. इस दौरान बच्चों को पारंपरिक रूप से चूड़ा-दही खिलाया जाता है और माताएं स्वयं भी इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करती हैं. ओठगन संपन्न होने के साथ ही सूर्योदय के बाद से अत्यंत कठिन निर्जला उपवास शुरू हो जाता है, जिसमें अन्न का एक दाना और पानी की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती. इस व्रत का पारण (व्रत खोलना) हमेशा अगले दिन की तिथि और पारंपरिक नियमों के अनुसार ही किया जाता है.
जितवाहन बाबा से संतान की रक्षा की गुहार
व्रत के दौरान माताओं द्वारा ‘जितवाहन बाबा’ (भगवान जीमूतवाहन) की विधि-विधान से पूजा की जाती है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, जीमूतवाहन ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना गरुड़ से नाग वंश के एक बालक के प्राणों की रक्षा की थी. उन्हीं के त्याग को याद करते हुए, व्रत के दिन माताएं जितवाहन बाबा से प्रार्थना करती हैं कि जिस तरह उन्होंने उस बालक की रक्षा की, वैसे ही वे उनकी संतान को भी लंबी आयु, अच्छा स्वास्थ्य और सुखी जीवन प्रदान करें.
मां की तपस्या
जितिया व्रत की महिमा इसी बात में छिपी है कि एक मां खुद दिन-रात की कड़ी भूख और प्यास हंसते-हंसते सह लेती है, लेकिन अपनी संतान के जीवन में दुख की एक बूंद भी नहीं देखना चाहती.
यही है असली जितिया. मां का त्याग, उसकी तपस्या, उसकी अटूट ममता की शक्ति, और अपनी संतान के सुनहरे भविष्य के लिए की गई एक अनमोल प्रार्थना. जब एक मां अपने बच्चे की रक्षा का संकल्प लेती है, तो वह संकल्प ईश्वर को भी स्वीकार करना ही पड़ता है.