गणपति उत्सव: शाडू मिट्टी, मोदक, और दूर्वा का रहस्य
Sunita Thatte
महाराष्ट्र का सबसे चर्चित और प्रिय गणपति उत्सव भाद्रपद माह की चतुर्थी से शुरू होकर अनंत चतुर्दशी तक बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है. चतुर्थी वाले दिन मिट्टी की मूर्ति की स्थापना की जाती है. महाराष्ट्र में इसे ‘शाडू’ की मिट्टी कहते हैं. यह विशेष मिट्टी नदी के तट से मिलती है. नदी के तेज़ प्रवाह में पत्थरों के घिसने से प्राप्त यह मिट्टी बहुत ही चिकनी होती है और पानी डालने के बाद इसे बहुत सुंदर आकार दिया जा सकता है.
इसके बाद मूर्ति को गेरू, हल्दी और अन्य प्राकृतिक रंगों से सजाया जाता है. गणेश चतुर्थी वाले दिन इसी प्राकृतिक गणपति की स्थापना की जाती है, जिसे ‘पार्थिव पूजा’ कहा जाता है. अनंत चतुर्दशी के दिन इस मूर्ति का विसर्जन किया जाता है. चूंकि शाडू की मिट्टी जल से ही प्राप्त होती है, अतः जल में विसर्जित होते ही यह पूरी तरह पानी में घुल जाती है, जो कि पर्यावरण के अनुकूल और पूर्णतया प्राकृतिक प्रक्रिया है.
महाभारत और गणपति उत्सव की पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं में इस उत्सव का सीधा संबंध महाभारत काल से जुड़ता है. महर्षि वेदव्यास जी को महाभारत की रचना करनी थी, परंतु उन्हें कोई ऐसा नहीं मिल रहा था जो इसे लगातार लिख सके. उन्होंने अपनी यह समस्या ब्रह्मा जी को बताई, तो उन्होंने तुरंत “गणेश जी” का नाम सुझाया.
व्यास जी ने जब गणेश जी से महाभारत लिपिबद्ध करने का अनुरोध किया, तो उन्होंने सहमति दे दी. लगातार लिखने के दौरान गणेश जी को थकान न हो, इसलिए उन्हें उसी मिट्टी (शाडू) का लेप लगाकर बिठाया गया था. साथ ही, उन्हें स्वादिष्ट व्यंजन (मोदक आदि) भी खिलाए गए, ताकि वे प्रसन्नचित्त होकर लिखते रहें. लेखन कार्य समाप्त होते-होते दस दिन लग गए. लगातार दस दिनों तक तेज़ गति से लिखने के कारण उनके शरीर का तापमान बहुत अधिक बढ़ गया था. उनके शरीर के इसी ताप को शांत करने के लिए व्यास जी ने उन्हें जल में बैठा दिया था (विसर्जन).
घरों से सार्वजनिक उत्सव तक का ऐतिहासिक सफ़र
अब सवाल यह उठता है कि यह पौराणिक कथा महाराष्ट्र में ही उत्सव के रूप में क्यों मनाई जाती है? इसका एक गहरा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है.
जब छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिंदू स्वराज्य की स्थापना की प्रतिज्ञा ली थी, तब उनकी माता राजमाता जीजाबाई ने मल्लेश्वर “गणपति” की स्थापना करके इस महायज्ञ का आरंभ किया था. समय के साथ, महाराष्ट्र के लोग गणेश जी को एक कुलदेवता के रूप में घरों में स्थापित करने लगे. पेशवाओं के समय तक, घरों में “गणपति” को बैठाना एक बड़ा पारिवारिक उत्सव बन चुका था. इस अवसर पर पूरा परिवार एक साथ जुटता था, जिससे पारिवारिक सौहार्द और एकता बढ़ती थी.
तिलक और सार्वजनिक गणेशोत्सव: यह पारिवारिक उत्सव सार्वजनिक कैसे बना, इसके पीछे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की दूरदर्शी सोच थी. देश में अंग्रेज़ों की सत्ता थी और तिलक स्वतंत्रता के प्रखर पक्षधर और क्रांतिकारी थे. अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ़ कुछ बोलना या लिखना बड़ा अपराध था. तिलक ने स्वराज्य का संदेश समाज में फैलाने के लिए यह धार्मिक रास्ता चुना. अंग्रेज़ सरकार धार्मिक आयोजनों पर रोक नहीं लगा सकती थी.
अतः तिलक ने सार्वजनिक गणपति उत्सव का प्रारंभ किया. इस मंच से ऐसे भाषण, नाटक और कविताएं प्रस्तुत की जाती थीं, जो लोगों को अंग्रेज़ों के विरुद्ध जागृत कर सकें. मोहल्ले से चंदा एकत्र कर यह उत्सव मनाया जाने लगा और धीरे-धीरे यह पूरे देश में स्वतंत्रता संग्राम का एक अहम हिस्सा बन गया.
गणेश जी का स्वरूप और उनका गहरा संदेश
गणपति, शिव के गणों के मुखिया हैं. उनका स्वरूप प्रकृति की एक अनोखी घटना है, जो हमें जीवन के अनेक महत्वपूर्ण संदेश देता है:
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बड़े कान: जो बताते हैं कि हमें अधिक सुनना चाहिए.
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छोटी और तीक्ष्ण आंखें: जो दूरदृष्टि और सूक्ष्म अवलोकन का प्रतीक हैं.
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बड़ा उदर (पेट): जो पूरे ब्रह्मांड और हर अच्छी-बुरी बात को अपने अंदर समेटने की क्षमता दर्शाता है.
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प्रसन्नचित्त मुख: जो संदेश देता है कि वातावरण को हमेशा प्रसन्न और सकारात्मक रखना चाहिए.
पारिवारिक परंपराओं के अनुसार, लोग अपनी सुविधा और मन्नत के अनुसार गणपति को डेढ़ दिन, तीन दिन, पांच दिन, सात दिन या पूरे दस दिन घर में विराजते हैं.
मोदक और 21 दूर्वा का विशेष महत्व
‘गणपति’ का सबसे प्रिय प्रसाद ‘मोदक’ है. मोदक का अर्थ ही है, प्रसन्नता देने वाला. महाराष्ट्र में यह पारंपरिक रूप से ताज़े नारियल, गुड़ और चावल के आटे से बनाया जाता है. उत्तर भारत में इसे अक्सर मैदे से भी बनाया जाता है, लेकिन इसके अंदर की मिठास (नारियल और गुड़/चीनी) वही रहती है.
गणपति पूजा में दूर्वा (दूब) का महत्व: गणपति की पूजा में दूर्वा का होना अत्यंत आवश्यक है. 21 दूर्वा की गड्डी बनाकर भगवान को चढ़ाई जाती है. इसके पीछे एक प्रसिद्ध कथा है. अनलासुर नामक राक्षस ने आतंक मचा रखा था. गणेश जी ने उसका अंत करने के लिए उसे निगल लिया. लेकिन एक असुर को निगलने के बाद गणेश जी के पेट की अग्नि इतनी बढ़ गई कि उनके प्राण संकट में पड़ गए. तब एक ऋषि ने उन्हें 21 दूर्वा की गांठ खिलाई, जिससे उनके पेट की जलन शांत हुई. दूर्वा शरीर को ठंडक पहुंचाती है, इसलिए इसे चढ़ाना अनिवार्य माना जाता है.
मान्यता यह भी है: गणेश पूजा में ‘तुलसी’ का प्रयोग वर्जित (निषिद्ध) माना गया है, क्योंकि एक पौराणिक कथा के अनुसार दोनों के बीच विवाह के प्रस्ताव को लेकर विवाद हुआ था.
मूषक राज और चंचल मन पर नियंत्रण
गणेश जी का वाहन मूषक (चूहा) है. इसके पीछे कथा है कि एक गंधर्व को ऋषि के श्राप से विशाल चूहा बनना पड़ा था, जो आश्रमों को नष्ट करने लगा. गणेश जी ने उसे छोटा कर अपना वाहन बना लिया.
आधुनिक दृष्टिकोण से देखें तो चूहा बहुत चंचल होता है और लगातार कुछ न कुछ कुतरकर हानि पहुंचाता है. ठीक इसी तरह हमारा मन भी चंचल होता है. गणेश जी द्वारा चूहे को अपने वश में करके वाहन बनाने का अर्थ है, अपनी चंचल और भटकी हुई बुद्धि को वश में कर स्थिर करना.
जीवन का सबसे बड़ा संदेश
गणपति उत्सव हमें जीवन का एक बहुत बड़ा सबक सिखाता है. जब तक ‘गणपति’ हमारे घर में विराजते हैं, चारों ओर प्रसन्नता, ऊर्जा और उल्लास रहता है. और जब वे विसर्जित होते हैं, तो हम उन्हें अगले वर्ष फिर आने का आग्रह करते हुए ख़ुशी-ख़ुशी विदा करते हैं.
यही हमारे जीवन का भी अर्थ है. जब तक यह जीवन है, घर-बाहर सकारात्मक ऊर्जा और आनंद होना चाहिए. और जब इस दुनिया से विदा लेने का समय आए, तो बिना किसी मोह के, प्रसन्नता से उसी मिट्टी में विसर्जित हो जाना चाहिए, जहां से हमारा जन्म हुआ है.