दशहरा पर्व: बुराई पर अच्छाई की विजय, शमी के पत्ते और भारतीय संस्कृति
Sunita Thatte
भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि हमारी परंपरा में सभी व्रत-त्योहार, ऋतुओं, पर्वों और फ़सलों से गहराई से जुड़े हैं. इनका महत्व तब और भी बढ़ जाता है, जब ये हमारी पौराणिक कथाओं से जुड़कर समाज में उच्च संस्कारों को स्थापित करने का माध्यम बन जाते हैं.
दशहरा पर्व ऐसा ही एक महान उत्सव है, जो हमें सीधे मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु रामचंद्र से जोड़ता है. इससे ठीक पहले के नौ दिन हमें नौ देवियों की शक्ति-उपासना से जोड़ते हैं. आइए, इस पावन पर्व के पौराणिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक पहलुओं को विस्तार से समझते हैं.
नवरात्र और ऋतुओं का अद्भुत संगम
प्रमुख रूप से हम दो नवरात्र मनाते हैं और दोनों ही ऋतुओं के संधिकाल (बदलाव के समय) से जुड़े हैं:
- वसंत नवरात्र (चैत्र): यह वर्ष के आरंभ में आता है और वसंत ऋतु से ग्रीष्म ऋतु के आगमन की सूचना देता है. यह नवरात्र प्रभु राम के जन्म (रामनवमी) से जुड़ा है.
- शारदीय नवरात्र (आश्विन): यह दशहरे से जुड़ा है. यह वर्षा ऋतु की समाप्ति और शीतकाल के स्वागत का प्रतीक है.
आश्विन महीने के प्रारंभ में ही मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है. घर-घर में अखंड दीप जलते हैं, घट-स्थापना की जाती है और रोज़ सुबह-शाम आरती होती है. यह पर्व नकारात्मकता पर सद्गुणों की विजय का संदेश देता है.
महाराष्ट्र में दशहरा पर्व की अनूठी छटा
भारत के हर राज्य में दशहरे का रंग अलग होता है. महाराष्ट्र में यह पर्व बहुत धूमधाम से मनाया जाता है. नवमी तक पुरणपोली का प्रसाद और पूजा-अर्चना चलती है.
दशहरा पर्व वाले दिन यहां एक बहुत ही सुंदर सामाजिक परंपरा निभाई जाती है. इस दिन लोग नए कपड़े पहनते हैं, घरों में ‘श्रीखंड’ बनता है और सबसे ख़ास बात, लोग ‘शमी के पत्ते’ देकर अपने से बड़ों के पैर छूते हैं. इसे ‘दशहरा मिलन’ कहा जाता है.
क्या है शमी के पत्तों का रहस्य?
शमी के पत्ते दिए जाने की परंपरा का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व है. शमी के पत्तों में जो ऊर्जा होती है, वह स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होती है. माना जाता है कि लेन-देन के समय ये पत्ते अपनी सकारात्मक ऊर्जा छोड़ जाते हैं. सूखने के बाद भी घर में इनका सकारात्मक प्रभाव बना रहता है. अतः दशहरे पर शमी के पत्तों को ‘सोने’ के समान मानकर बांटा जाता है.
साढ़े तीन शुभ मुहूर्त और दीपावली की तैयारी
हिंदू पंचांग के अनुसार, दशहरा पर्व को वर्ष के ‘साढ़े तीन शुभ मुहूर्तों’ में से एक माना जाता है. यह दिन इतना शुभ होता है कि किसी भी नए कार्य की शुरुआत के लिए पंचांग देखने की ज़रूरत नहीं पड़ती.
दशहरे के दिन से ही दीपावली की तैयारियां शुरू हो जाती हैं. महाराष्ट्र में इस दौरान कई तरह के नमकीन और मीठे खाद्य पदार्थ जैसे गुजिया, लड्डू, शकरपारे, अनरसे, चकली, चूड़ा और सेव बनाए जाने लगते हैं.
राम-रावण युद्ध: एक ईश्वरीय योजना
यदि हम पौराणिक दृष्टि से देखें, तो राम-जन्म और वनवास एक सुनियोजित ईश्वरीय योजना थी. देवताओं को पता था कि महाज्ञानी और महापराक्रमी रावण का अहंकार खंडित करने के लिए भगवान विष्णु का अवतार लेना आवश्यक है. माता सरस्वती से कैकेयी की बुद्धि फेरने की प्रार्थना से लेकर सीता-हरण तक, सब इसी योजना का हिस्सा था.
जब अज्ञान का अंधकार छाता है, तो इंसान का विवेक सबसे पहले ख़त्म होता है. रावण के साथ भी यही हुआ. प्रभु राम ने सागर तट पर महादेव का आशीर्वाद लिया और नौ दिन तक मां पार्वती (शक्ति) की उपासना की. इसके बाद दसवें दिन उन्होंने रावण पर विजय प्राप्त की.
दशहरा पर्व का वास्तविक संदेश: 10 बुराइयों का अंत
दस शीश (सिर) वाले परम ज्ञानी असुर रावण पर विजय प्राप्त करने के कारण ही इस पर्व का नाम ‘दशहरा’ (दस+हरा) पड़ा. लेकिन आधुनिक समाज में इसका अर्थ और भी गहरा है.
रावण के दस सिर हमारे भीतर छिपे दस प्रकार के दोषों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी) के प्रतीक हैं. दशहरा पर्व हमें इन्हीं दस बुराइयों पर अपने मानसिक बल से विजय प्राप्त करने का संदेश देता है. इसे केवल राम-रावण के युद्ध के रूप में न देखकर, अपने समाज और स्वयं के भीतर स्थित नकारात्मकता को दूर करने के अवसर के रूप में देखना चाहिए.
हमारी संस्कृति, हमारे असली उत्सव
भारतीय परंपरा में त्योहारों की ऐसी योजना बनी है कि वे समाज के हर वर्ग (उच्च, मध्यम, निम्न, कृषक या शहरी) को एक साथ जोड़ते हैं. हर उत्सव किसी न किसी ऋतु और उस मौसम की फ़सल पर आधारित होता है.
आजकल विज्ञापनों में विदेशी चॉकलेट दिखाकर कहा जाता है ‘कुछ मीठा हो जाए’. लेकिन यह हमें अपनी जड़ों से दूर करता है. हमारे यहां हर उत्सव के लिए अलग और बेहद स्वादिष्ट पारंपरिक मिठाइयों की व्यवस्था है. इस दशहरा पर्व पर अपनी संस्कृति से जुड़ें, अपनों से मिलें और अपने भीतर की बुराइयों पर विजय प्राप्त करने का संकल्प लें.