बच्चों के दिमाग़ पर स्क्रीन टाइम का असर: न्यूरोलॉजिस्ट की सलाह
Ashlesha Thakur
क्या आपका बच्चा भी घंटों तक मोबाइल में रील्स (Reels) स्क्रोल करता है या AR/VR गेमिंग में डूबा रहता है? 2026 के इस हाई-टेक डिजिटल युग में बच्चों का स्क्रीन टाइम और दिमाग पर पड़ने वाला इसका प्रभाव माता-पिता के लिए सबसे बड़ी चिंता बन चुका है. गैजेट बच्चों की ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन स्क्रीन से निकलने वाली रोशनी और फ़ास्ट-पेस्ड कंटेंट का उनके कोमल दिमाग पर क्या असर हो रहा है?
इस गंभीर विषय पर हमने बात की डॉ. प्रवीण गुप्ता (चेयरमैन-MAIINS, मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स, गुरुग्राम) से. एक वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट के नज़रिए से उन्होंने बच्चों के मस्तिष्क विकास (Brain Development), नींद और स्क्रीन टाइम से जुड़े अहम सवालों के जवाब दिए.
बच्चों का स्क्रीन टाइम और दिमाग: AR/VR व एडवांस्ड गेमिंग का असर
2026 में बच्चे AR/VR और एडवांस्ड गेमिंग का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं. डॉ. गुप्ता बताते हैं कि बचपन और किशोरावस्था में दिमाग की ‘न्यूरोप्लास्टिसिटी’ (Neuroplasticity) सबसे अधिक सक्रिय होती है. इस उम्र में मिलने वाले अनुभव मस्तिष्क के विकास को गहराई से प्रभावित करते हैं.
अगर स्क्रीन का इस्तेमाल कम और कुछ नया सीखने के लिए किया जाए, तो इससे बच्चों को नई बातें समझने और उलझनें सुलझाने में मदद मिलती है लेकिन घंटों तक AR/VR और गेम खेलने की लत उनके दिमाग को हमेशा तेज़ हलचल की आदत डाल देती है. इस वजह से बच्चों का किसी भी चीज़ पर ध्यान लगाना मुश्किल हो जाता है. उनके स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ सकता है और उनका दूसरों से मिलना-जुलना कम हो सकता है. इसके अलावा आंखों पर ज़ोर पड़ना, सिरदर्द, नींद न आना और बाहर का खेल-कूद कम होने जैसी दिक्कतें भी बढ़ जाती हैं.
इसीलिए, यह बहुत ज़रूरी है कि बच्चे एक तय समय तक ही स्क्रीन देखें और अपना बाकी समय बाहर खेलने या ऑफ़लाइन (बिना स्क्रीन वाले) कामों में बिताएं.
ब्लू लाइट और अधूरी नींद: रिकवरी प्रोसेस में बाधा
क्या आपको पता है कि आजकल पढ़ाई और स्क्रीन टाइम के चक्कर में बच्चे औसतन बस 6.5 से 7 घंटे की नींद ले पा रहे हैं? जबकि डॉ. गुप्ता बताते हैं कि बच्चों और टीनएजर के लिए 8 से 10 घंटे की भरपूर नींद लेना बेहद ज़रूरी है.
देर रात स्क्रीन देखने से निकलने वाली ब्लू लाइट ‘मेलाटोनिन’ हार्मोन के स्राव को दबा देती है, जिससे नींद आने में देरी होती है और सर्कैडियन रिद्म (Circadian Rhythm) प्रभावित होती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अन्य स्वास्थ्य संस्थाओं के अनुसार भी, गहरी नींद के दौरान ही दिमाग़ यादों को व्यवस्थित करता है, सीखने की क्षमता को मज़बूती मिलती है और न्यूरल रिकवरी होती है. लगातार कम और बाधित नींद से याददाश्त, एकाग्रता, मूड, निर्णय लेने की क्षमता और उनकी पढ़ाई-लिखाई पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.
रील्स और शॉर्ट्स: घटता ‘अटेंशन स्पैन’
शॉर्ट-फ़ॉर्म कॉन्टेंट (जैसे रील्स और शॉर्ट्स) लगातार देखने की वजह से बच्चों का अटेंशन स्पैन तेज़ी से कम हो रहा है. क्या यह उनके दिमाग के ‘प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स’ (जो निर्णय लेने के लिए ज़िम्मेदार है) के विकास में कोई स्थायी बदलाव ला रहा है?
डॉ. गुप्ता स्पष्ट करते हैं कि शॉर्ट-फ़ॉर्म कॉन्टेंट लगातार तेज़ और बार-बार मिलने वाले ‘डोपामिन रिवार्ड’ की आदत पैदा कर सकता है, जिससे बच्चों के लिए लंबे समय तक किसी एक काम पर ध्यान बनाए रखना मुश्किल हो जाता है. वही प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स, जो निर्णय लेने, आत्म-नियंत्रण और योजना बनाने के लिए ज़िम्मेदार होता है, किशोरावस्था तक विकसित होता रहता है.
अभी तक की रिसर्च यह तो नहीं कहती कि इससे दिमाग में हमेशा के लिए कोई पक्का बदलाव आ जाता है, लेकिन हां, बहुत ज़्यादा स्क्रीन टाइम की वजह से कुछ समय के लिए बच्चों का फ़ोकस बिगड़ना, खुद पर कंट्रोल न रहना और सोचने-समझने की क्षमता पर असर ज़रूर पड़ सकता है. राहत की बात यह है कि अगर सही समय पर बच्चों की स्क्रीन देखने की आदतें सुधार ली जाएं, तो इन दिक्कतों को बहुत हद तक ठीक किया जा सकता है.
माता-पिता के लिए चेतावनी के संकेत (Red Flags)
माता-पिता के लिए यह जानना बहुत ज़रूरी है कि डिजिटल गैजेट का अधिक इस्तेमाल कब बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर नुक़सान पहुंचाने लगता है. डॉ. प्रवीण गुप्ता के अनुसार, इन शुरुआती न्यूरोलॉजिकल संकेतों पर तुरंत ध्यान देना चाहिए:
- स्क्रीन से दूर होने पर अत्यधिक चिड़चिड़ापन, बेचैनी या गुस्सा दिखाना
- पढ़ाई या रोज़मर्रा की गतिविधियों में ध्यान न लगा पाना
- नींद की गुणवत्ता ख़राब होना
- बार-बार सिरदर्द या आंखों में दर्द की शिकायत करना
- दोस्तों और परिवार से दूर-दूर रहना, या पढ़ाई और स्वभाव में अचानक से बदलाव आ जाना
यदि ये समस्याएं लगातार बनी रहें और बच्चे के दैनिक जीवन को प्रभावित करने लगें, तो माता-पिता को स्वयं निर्णय लेने के बजाय बाल रोग विशेषज्ञ या न्यूरोलॉजिस्ट से समय पर परामर्श लेना चाहिए.