• Zindagi With Richa
  • 29 June, 2026
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आषाढ़ का महीना: कालिदास के ‘मेघदूत’ से लेकर पंढरपुर के विट्ठल तक

Sunita Thatte

भारतीय पंचांग में ‘आषाढ़’ केवल एक महीना नहीं, बल्कि आस्था, साहित्य और प्रकृति के अद्भुत मिलन का प्रतीक है.

“आषाढ़स्य प्रथम दिवसे” (आषाढ़ का पहला दिन) यह दिन महाकवि कालिदास को समर्पित है. उन्होंने अपनी कालजयी रचना ‘मेघदूत’ में इसी दिन पहाड़ों पर उमड़ते बादलों (मेघों) को देखकर, उनके माध्यम से यक्ष द्वारा अपनी प्रेयसी को प्रेम संदेश भेजने की एक बेहद सुंदर और मार्मिक कल्पना की थी. कालिदास ने वर्षा ऋतु के इस पहले पड़ाव को एक जीवंत काव्य का रूप दे दिया.

इसके अलावा, ज्येष्ठ महीने की झुलसाने वाली गर्मी को कम करने का संदेश लेकर आने वाला यह आषाढ़ का महीना, धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. जगन्नाथ पुरी में यह महीना भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा को समर्पित है. इसी महीने भगवान को रथ में बैठाकर विश्व प्रसिद्ध ‘रथयात्रा’ का उत्सव मनाया जाता है. जगन्नाथ पुरी एकमात्र ऐसा स्थान है जहां श्रीकृष्ण अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं.

महाराष्ट्र में आषाढ़: पंढरपुर के राजा ‘श्री हरि विट्ठल’

अगर हम महाराष्ट्र की बात करें, तो यहां आषाढ़ का महीना पूरी तरह से पंढरपुर के राजा ‘श्री हरि विट्ठल’ (भगवान विष्णु/कृष्ण के अवतार) और उनके अनन्य भक्त पुण्डलिक को समर्पित है. मान्यता है कि भक्त पुण्डलिक ने ही भगवान को पिछले 28 युगों से एक ईंट पर खड़ा कर रखा है.

आख़िर भगवान विट्ठल ईंट पर क्यों खड़े हैं?

उनकी कथा भक्त पुण्डलिक से शुरू होती है. शुरुआत में पुण्डलिक एक बिलकुल बिगड़ा हुआ व्यक्ति था, जो अपने माता-पिता की घोर अवहेलना करता था. एक बार उसकी इच्छा काशी यात्रा करने की हुई. रास्ते में उसे एक ऋषि की कुटिया दिखाई दी. उसने ऋषि से काशी जाने का मार्ग पूछा, तो ऋषि ने कहा कि वह कभी काशी नहीं गए, इसलिए उन्हें मार्ग नहीं मालूम.

पुण्डलिक उन्हें मूर्ख समझते हुए बोला, “आप कैसे ऋषि हैं जो कभी काशी नहीं गए?” ऋषि ने कोई उत्तर नहीं दिया.

थोड़ी दूर जाने पर पुण्डलिक को स्त्रियों के हंसने की आवाज़ आई. वह वापस लौटा तो देखा कि तीन सुंदर स्त्रियां ऋषि के आश्रम में साफ़-सफ़ाई कर रही थीं. पूछने पर उन्होंने बताया कि वे गंगा, यमुना और सरस्वती हैं, जो रोज़ आश्रम की सफ़ाई करने आती हैं. पुण्डलिक हैरान रह गया कि बिना काशी गए ऋषि के पास तीनों पवित्र नदियां स्वयं आती हैं!

नदियों ने बताया कि ऋषि ने बिना काशी गए, केवल अपने माता-पिता की नि:स्वार्थ सेवा करके यह महान पुण्य प्राप्त कर लिया है. यह सुनते ही पुण्डलिक को गहरा पश्चाताप हुआ. उसे याद आया कि उसके बूढ़े माता-पिता ने कई बार उससे काशी ले जाने की विनती की थी, पर उसने ध्यान नहीं दिया. वह उल्टे पांव पंढरपुर लौटा और अपने माता-पिता से क्षमा मांगकर दिन-रात उनकी सेवा में लग गया.

भगवान श्रीकृष्ण का आगमन: माता-पिता की सेवा करते हुए पुण्डलिक श्रीहरि का स्मरण किया करता था. उसकी सेवा से ईश्वर भी प्रसन्न हो गए. संयोग से, उसी वन में माता रुक्मिणी श्रीकृष्ण से रूठकर आ गई थीं. उन्हें ढूंढ़ते हुए जब श्रीकृष्ण वहां पहुंचे, तो उन्हें अपने भक्त पुण्डलिक का ध्यान आया. भगवान स्वयं पुण्डलिक के घर पहुंचे और उसे आवाज़ दी.

पुण्डलिक ने देखा कि उसके आराध्य द्वार पर खड़े हैं, परंतु उस समय वह अपने पिता के चरण दबा रहा था. पिता की सेवा बीच में छोड़ना उसे उचित नहीं लगा. इसलिए उसने एक ईंट (मराठी में जिसे ‘वीट’ कहते हैं) भगवान की ओर सरका दी और कहा, “प्रभु! आप कृपया इस पर खड़े हो जाएं, मैं पिता की सेवा से निवृत्त होकर आता हूं.”

भगवान उसकी मातृ-पितृ भक्ति से इतने प्रसन्न हुए कि वे उसी ईंट पर कमर पर हाथ रखकर खड़े हो गए. ईंट (वीट) पर खड़े होने के कारण ही उनका नाम ‘विट्ठल’ पड़ा. पुण्डलिक ने भगवान से वरदान मांगा कि वे युगों-युगों तक इसी रूप में भक्तों को दर्शन देते रहें. भगवान ने तथास्तु कहा और चंद्रभागा नदी का वह तट पावन कर दिया. आज भी पंढरपुर में भगवान विट्ठल उसी ईंट पर खड़े हैं. कहा जाता है कि यह मूर्ति स्वयंभू है, किसी मूर्तिकार द्वारा गढ़ी नहीं गई है.

देवशयनी एकादशी और वारकरी संप्रदाय की वारी

आषाढ़ में पंढरपुर का महत्व और भी बढ़ जाता है. आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवशयनी एकादशी) के दिन वारकरी संप्रदाय के लोग ‘वारी’ (पैदल यात्रा) करके श्री हरि विट्ठल से मिलने आते हैं.

इस यात्रा में पुणे के आलंदी से संत ज्ञानेश्वर की पालकी और देहू से संत तुकाराम की पालकी लाई जाती है. लाखों भक्त (वारकरी) एक कतार में अनुशासित ढंग से ‘अभंग’ गाते हुए पैदल चलते हैं. रास्ते के सभी गांवों में उनका भव्य स्वागत होता है. एकादशी के दिन पंढरपुर में ज्ञानेश्वर और विट्ठल की महान भेंट होती है, और फिर द्वादशी को पारणा करके सब वापस लौट जाते हैं.

महाराष्ट्र में संत ज्ञानेश्वर का बहुत महत्व है. उन्होंने उस समय की आम ग्रामीण भाषा में समाज के सभी वर्गों के लिए ‘गीता’ समझाई थी, जिसे ‘ज्ञानेश्वरी’ कहते हैं. यह ‘ओवी’ नामक छंदों में लिखी गई है. महाराष्ट्र के अधिकतर घरों में इसे पढ़ा जाता है और कई लोगों को तो पूरी ज्ञानेश्वरी कंठस्थ याद है.

चातुर्मास का आरंभ और गुरु पूर्णिमा

देवशयनी एकादशी के बाद गुरु पूर्णिमा आती है, जो गुरुओं को समर्पित है. मान्यता है कि देवशयनी एकादशी के दिन भगवान श्री विष्णु क्षीरसागर में चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं. इसी के साथ ‘चातुर्मास’ (चौमासा) प्रारंभ हो जाता है.

इन चार महीनों में विवाह, मुंडन या गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं, क्योंकि सूर्य भी दक्षिणायन हो जाते हैं. हालांकि, यह समय आध्यात्मिक उन्नति, व्रत, नियम, पूजा-पाठ और स्वयं को भीतर से शुद्ध (परिष्कृत) करने का सबसे उत्तम अवसर माना जाता है.

आषाढ़ का समापन: दीप अमावस्या का प्रकाश

आषाढ़ महीने का समापन अमावस्या के दिन होता है, जिसे महाराष्ट्र में ‘दीप अमावस्या’ (Deep Amavasya) के रूप में एक बड़े उत्सव की तरह मनाया जाता है.

माना जाता है कि इस दिन माता लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करने आती हैं. इसलिए उनके स्वागत में, और आगामी पवित्र श्रावण मास (सावन) की तैयारी के रूप में, घरों के सभी पुराने दीपों, पीतल और तांबे के दीयों को अच्छी तरह मांज-धोकर चमकाया जाता है. शाम के समय इन सभी दीपों को प्रज्वलित कर उनकी विशेष पूजा की जाती है.

दीपक अज्ञान, अंधकार और नकारात्मकता को दूर कर ज्ञान और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है. इस दिन माता लक्ष्मी को मीठे पकवानों का भोग अर्पित किया जाता है. इस प्रकार, यह पवित्र आषाढ़ मास भक्ति, साहित्य, प्रकृति और दीपों के प्रकाश के साथ पूर्ण रूप से संपन्न होता है.

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