• Zindagi With Richa
  • 29 September, 2026
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World Heart Day: एओर्टिक एन्यूरिज़्म, हार्ट अटैक जैसा ‘साइलेंट किलर’

Ashlesha Thakur

आज वर्ल्ड हार्ट डे है. यह दिन सिर्फ़ अपने दिल (Heart) की धड़कनों को सुनने का नहीं, बल्कि शरीर के उस पूरे ‘हाईवे’ को समझने का है, जिस पर हमारी ज़िंदगी की गाड़ी दौड़ रही है. हम अक्सर हार्ट अटैक के बारे में सुनते हैं, लेकिन एओर्टिक एन्यूरिज़्म एक ऐसी गंभीर और जानलेवा बीमारी है जो बिना कोई संकेत दिए अचानक हमला कर सकती है.

इस गंभीर विषय पर हमने एओर्टिक (aortic) मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ, प्रो. डॉ. निरंजन हीरेमठ जो बेंगलुरु के अपोलो अस्पताल में एओर्टिक सर्जन और कार्डियोलॉजी के सीनियर कंसलटेंट हैं से बातचीत की. उन्होंने शरीर की महाधमनी (Aorta) से जुड़े ख़तरे, लक्षण और बचाव के बारे में विस्तार से बताया.

एओर्टा (Aorta): हमारे शरीर का ‘हाईवे’

डॉ. निरंजन हीरेमठ के मुताबिक़, बहुत कम लोगों को पता है कि हमारे शरीर की मुख्य ख़ून की धमनी, जिसे एओर्टा या हिंदी में महाधमनी कहते हैं, हमारे कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम का हाईवे है. यह महाधमनी हार्ट से निकलती है और पूरे शरीर में ख़ून की आपूर्ति करती है. हमारा दिल दिन में लगभग एक लाख बार पंप करता है, और हर बार ख़ून को एओर्टा के ज़रिए, पूरे शरीर में तेज़ रफ़्तार के साथ भेजता है.

डॉ. निरंजन यह भी बताते हैं कि इस महाधमनी पर स्मोकिंग, हाई ब्लड प्रेशर और हाई ब्लड शुगर जैसे रिस्क फ़ैक्टर सीधा असर कर सकते हैं.

एओर्टिक एन्यूरिज़्म: यह कैसे बनता है ‘साइलेंट किलर’?

एओर्टा एक पाइप की तरह होता है, जिसका डायमीटर आमतौर पर 2.5 से 3 सेंटीमीटर होता है. डॉ. हीरेमठ के अनुसार, अगर यह फूलकर दोगुना (4.5 से 5 सेंटीमीटर) हो जाए, तो इस मेडिकल कंडीशन को एओर्टिक एन्यूरिज़्म कहते हैं.

इसे साइलेंट किलर कहते हैं क्योंकि 75% लोगों में जब तक यह बढ़कर 5-5.5 सेंटीमीटर तक नहीं हो जाता, तब तक इसके कोई लक्षण नहीं दिखते. लेकिन 5 सेंटीमीटर का हो जाने पर इसके अंदर की परतें अपने आप फट सकती हैं. इसे ‘एओर्टिक डिसेक्शन’ (Aortic Dissection) कहते हैं, जो किसी भी उम्र के व्यक्ति के लिए एक मेडिकल इमरजेंसी है.

अचानक बहुत ज़्यादा इंटेंसिटी वाली एक्सरसाइज़ करते समय (जैसे जिम में भारी वज़न उठाते समय) शरीर में प्रेशर बढ़ने से यह धमनी अचानक फट सकती है. डॉ. हीरेमठ इसे समझाते हुए कहते हैं, “अगर एओर्टा की स्थिति पहले से ही ख़राब है, तो यह आसानी से फट सकता है, ठीक वैसे ही, जैसे कोई कमज़ोर डैम टूट जाता है.” यह अचानक होने वाली मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण है.

इसके लक्षण क्या हैं?

अचानक डिसेक्शन होने (धमनी के फटने) पर इसके लक्षण हार्ट अटैक जैसे ही लगते हैं:

  • अचानक सीने में तेज़ दर्द होना.
  • पीठ में बहुत तेज़ दर्द होना.
  • चक्कर आना या स्ट्रोक महसूस होना.
  • पेट में तेज़ दर्द होना.

बाकी 25% लोगों में हल्के लक्षण भी दिख सकते हैं, जैसे बाईं तरफ़ सीने में दर्द, अचानक पसीना आना, लगातार पीठ में दर्द होना, या आवाज़ का अचानक भारी हो जाना.

इसका ख़तरा सबसे ज़्यादा किसे है?

डॉ. निरंजन हीरेमठ ने साफ़ तौर पर कहा है कि यह बीमारी किसी को भी हो सकती है, यहाँ तक कि बच्चों को भी. इसके मुख्य कारणों में शामिल हैं:

  1. लाइफ़स्टाइल फ़ैक्टर: स्मोकिंग, हाइपरटेंशन (हाई बीपी), और डायबिटीज़.
  2. आनुवंशिक (Genetic) कारण: परिवार में हार्ट की बीमारी का इतिहास होना.
  3. मारफ़न सिंड्रोम (Marfan syndrome): यह एक आनुवंशिक बीमारी है जिसके लक्षणों में अत्यधिक लंबे हाथ-पैर और कमज़ोर आँखें शामिल हैं. जिन लोगों को यह बीमारी होती है, उनमें एओर्टिक एन्यूरिज़्म भी बहुत आम है.
  4. जिम और सप्लीमेंट्स: जिम जाने वाले युवाओं में स्टेरॉयड (Steroids) या ह्यूमन ग्रोथ हार्मोन के अधिक इस्तेमाल से इस बीमारी का जोखिम बहुत बढ़ जाता है.

प्रिवेंटिव स्क्रीनिंग (Preventive Screening) का सही समय क्या है?

डॉ. हीरेमठ ने स्क्रीनिंग को लेकर बहुत ही स्पष्ट गाइडलाइंस दी हैं:

  • पारिवारिक इतिहास होने पर: 5 साल की उम्र से पहले एक पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजिस्ट द्वारा इकोकार्डियोग्राम करवाएं.
  • 18 साल की उम्र में: एक फ़ुल कार्डियक चेकअप करवाएं.
  • 18 से 40 की उम्र तक: हर 10 साल में कार्डियक स्क्रीनिंग करवाएं (हार्ट का इकोकार्डियोग्राम और पेट का अल्ट्रासाउंड). अगर किसी समस्या का संकेत हो, तो सीटी (CT) स्कैन करवाएं.
  • 40 साल की उम्र के बाद: हर 5 साल में जांच करवाएं. यदि पारिवारिक इतिहास है तो हर 2 साल में जांच ज़रूरी है.

क्या हर मामले में बड़ी सर्जरी ज़रूरी है?

“बिलकुल नहीं,” डॉ. हीरेमठ आश्वस्त करते हैं. हर एओर्टिक एन्यूरिज़्म के लिए तुरंत सर्जरी की ज़रूरत नहीं होती. 4 से 5 सेंटीमीटर के एन्यूरिज़्म को ब्लड प्रेशर कंट्रोल और रेगुलर इको स्क्रीनिंग के ज़रिए मॉनिटर किया जा सकता है.

40-50 साल से ऊपर के मरीज़ों में मॉडर्न टेक्नोलॉजी (Endovascular aortic stent) के ज़रिए, बिना चीर-फाड़ वाली सर्जरी के, एक स्टेंट डालकर इसका सफल इलाज किया जा सकता है. इसके लिए सबसे ज़रूरी है एक एओर्टिक स्पेशलिस्ट से संपर्क करना.

महिलाओं के लिए विशेष सलाह

मेनोपॉज़ (Menopause) यानी 40-45 साल की उम्र तक एस्ट्रोजन (Estrogen) हार्मोन महिलाओं के हार्ट को सुरक्षित रखता है. लेकिन इसके बाद महिलाओं में हार्ट अटैक का जोखिम पुरुषों के मुक़ाबले तीन गुना बढ़ जाता है.

हालांकि, दिल की बीमारियां 70% पुरुषों और 30% महिलाओं में पाई जाती हैं, लेकिन महिलाओं में यह अधिक आक्रामक (Aggressive) होती है. 40 के बाद हार्मोनल बदलावों के कारण मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज़ का जोखिम तेज़ी से बढ़ता है, इसलिए महिलाओं के लिए वज़न कंट्रोल करना और रेगुलर कार्डियक स्क्रीनिंग करवाना बेहद ज़रूरी है.

इस वर्ल्ड हार्ट डे, अपने शरीर के संकेतों को नज़रअंदाज़ न करें. सही जानकारी और समय पर जांच ही आपके दिल के इस ‘हाईवे’ को सुरक्षित रख सकती है.

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